Political Desk, Taj News | Updated: Sunday, 25 January 2026, 10:40 AM IST
महंगी फीस, झूठे वादों और असहनीय मानसिक दबाव के बीच पिसते लाखों छात्रों की हक़ीक़त को लेखक बृज खंडेलवाल अपने इस विचारात्मक आलेख में सामने रखते हैं, जहाँ कोचिंग अब शिक्षा का सहारा नहीं बल्कि डर और मजबूरी का उद्योग बन चुकी है, जो छोटे कस्बों के परिवारों से कर्ज़, बच्चों से बचपन और समाज से बराबरी का सपना छीनकर सफलता के नाम पर सिर्फ़ चुनिंदा चेहरों को चमकाता है।

भारत का कोचिंग उद्योग: जहाँ सपने दिखाए जाते हैं टूटने के लिए!!
बृज खंडेलवाल
कस्बे के छोटे से घर में सन्नाटा पसरा था। टूटी खिड़की से आती धूल जैसे घर के भीतर की बेचैनी को और गहरा कर रही थी। पिता चुपचाप अख़बार ताक रहे थे, माँ बार-बार आँचल से आँखें पोंछ रही थी। जगदीश को दिल्ली भेजने का सपना, UPSC की कोचिंग का ख्वाब, पैसों की दीवार से टकराकर चकनाचूर हो गया। जमा-पूंजी नाकाफ़ी थी, कर्ज़ का रास्ता डरावना। बहन की आँखों में भी टूटा हुआ भरोसा झलक रहा था। यह सिर्फ़ एक परिवार की कहानी नहीं थी। कोचिंग की महंगी फीस ने देश भर के हज़ारों घरों को अपाहिज कर दिया है, जहाँ सपने हैं, काबिलियत है, पर साधन नहीं।
सब कुछ चुपचाप शुरू होता है। एक फ़ोन कॉल। एक चमकदार विज्ञापन। पड़ोसी की डींग। “बिना कोचिंग कुछ नहीं होता।” यहीं से जाल कसता है। इसके बाद जो होता है, वो तालीम नहीं, एक धीमी, घुटन भरी त्रासदी है। हॉस्टलों के तंग कमरों, बेचैन रातों में हर रोज़ खेली जाती है।

आज भारत का कोचिंग उद्योग सहारा नहीं, डर का धंधा बन चुका है। 2025 में 58 हज़ार करोड़ रुपये का यह बाज़ार 2028 तक 1.3 लाख करोड़ पार कर जाएगा (IBEF रिपोर्ट)। एक झूठ पर चलता है: “आपका बच्चा हमारे बिना अधूरा है।” गली के ट्यूशन से कोटा के मंदिरों तक, ऐप्स से ऑनलाइन क्लासेस तक, पढ़ाई मुनाफ़े की चीज़ हो गई। उम्मीदें बेची जाती हैं, नाकामियाँ छुपाई जाती हैं। बाज़ीगर बड़े हैं: एलन, आकाश, फ़िटजी, रेज़ोनेंस, श्री चैतन्य, फ़िज़िक्स वाला।
स्क्रीन पर टॉपर्स चमकते हैं: रैंक 1, 2, 5। रैंक 2.5 लाख? वो कभी नहीं दिखता। कोटा इसकी प्रयोगशाला है: 200+ संस्थान, हर साल 2.5 लाख छात्र (2025 डेटा)। पूरा शहर तनाव का गढ़। छोटे कमरे, 12-14 घंटे की क्लासें, खामोश मायूसी। NCRB के अनुसार, 2024 में कोटा में 26 छात्र आत्महत्याएँ हुईं, 2020 से दोगुनी। दिल्ली, हैदराबाद, चेन्नई, पुणे, बेंगलुरु, सब ‘कोचिंग कैपिटल’ बन गए। हक़ीक़त में ये दबाव के मुहल्ले हैं।
फ़ीस जानलेवा: JEE/NEET के दो साल, 1.5 से 4 लाख। UPSC—2.5 लाख से ऊपर। ड्रॉपर बैच, क्रैश कोर्स, टेस्ट सीरीज़, अलग चार्ज। हॉस्टल, खाना, किताबें जोड़ें तो मिडिल क्लास परिवार 5-7 लाख खर्च करता है (ASER 2025 सर्वे)। चुनाव नहीं, मजबूरी है। क्यों? स्कूल फेल हो गए। भीड़भाड़ कक्षाएँ, रटंत शिक्षा। टीचर सिलेबस निपटा रहे, समझ नहीं दे पा रहे। समझ मर गई, अंक ज़िंदा। इसलिए बच्चे कक्षा 6 से कोचिंग, कभी KG से ही!
समाज आग में घी डालता है। IIT, AIIMS, IAS, बस यही ‘इज़्ज़तदार’ रास्ते। बाक़ी नाकामी। कोचिंग इसे ठीक नहीं करती, बेचती है। और क़ीमत असमान: शहर के अमीर छा जाते, गाँव का टैलेंट किनारे। बिना पैसे, क़ाबिलियत बेबस। तालीम बराबरी का हक़ नहीं रही, अमीरों की लॉटरी। मानसिक क़ीमत भयानक: कोटा, कोट्टायम जैसी जगहें लाशें गिनतीं। 2024 में NEET/JEE कोचिंग छात्रों में सुसाइड रेट 15% ऊपर (Lancet स्टडी)। उम्मीदों का बोझ टूटन पैदा करता। हम इसे ‘व्यक्तिगत कमज़ोरी’ कह टालते, पर ये व्यवस्था की बेरहमी।
आंकड़े साफ़: JEE Main में सफलता 1-2%; NEET—टॉप 1 लाख में 5-7%; UPSC—0.2% से कम (2025 आंकड़े)। फिर भी हर टॉपर कोचिंग से गुज़रा। सच? कोचिंग गारंटी नहीं, फ़िल्टर है। पैसे वाले मुकाबले में उतरते, बाक़ी तमाशबीन।
सरकारें काग़ज़ी इलाज: गाइडलाइंस, रजिस्ट्रेशन, काउंसलिंग। राजस्थान ने 2023 में बैन लगाया, लॉबी ने उड़ा दिया। चीन ने 2021 में प्राइवेट ट्यूशन पर सख़्ती की, बाज़ार सिकुड़ गया। पश्चिम में स्कूल+अप्रेंटिसशिप+विविध करियर। भारत उल्टा: इम्तिहान फ़ैक्ट्रियाँ खड़ी। क्यों? ताक़तवर लॉबी, करोड़ों विज्ञापन, फुलाए रिज़ल्ट। अपवाद नियम बन जाते। राजनीतिक पैरवी, ज़ीरो जवाबदेही। मुनाफ़ा बढ़ा, कर्ज़ बढ़ा, मायूसी फैली।
चक्र चलता: माँ-बाप भविष्य गिरवी, बच्चे बचपन खोएं। ज़्यादातर सपने दम तोड़ें। भारत को कोचिंग सेंटर नहीं, बेहतर स्कूल चाहिए। लचीला पाठ्यक्रम। हर ईमानदार करियर को इज़्ज़त। वरना ये बाज़ार डर पर पलता रहेगा, सपनों को निगलता, टूटी पीढ़ी छोड़ता, झूठी उम्मीदों के पीछे दौड़ती।
कस्बे के उस छोटे से घर में पसरा सन्नाटा सिर्फ़ गरीबी का नहीं, टूटे सपनों का था। जगदीश को दिल्ली भेजने की चाह, UPSC कोचिंग की भारी फीस के आगे दम तोड़ चुकी थी। माँ की आँखें सूनी थीं, पिता की चुप्पी बोझिल।
और दूसरी तरफ़, कोचिंग अब ज़रूरत नहीं, फैशन बन गई है। अमीर तबके के बच्चे नतीजों से बेपरवाह, इसे स्टेटस सिंबल की तरह जीते हैं, मिलना-जुलना, दोस्ती, पार्टियाँ, बेफ़िक्री। एक ही व्यवस्था, पर दो बिल्कुल अलग दुनिया।
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