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भारतीय ज्ञान परम्परा को यदि केवल वेद, उपनिषद और दर्शनों तक सीमित किया जाए, तो वह अधूरी रह जाती है। यह विचारोत्तेजक आलेख बताता है कि बौद्ध दर्शन कैसे करुणा, तर्क, नैतिकता और मानव-मूल्यों के माध्यम से भारतीय बौद्धिक परम्परा की आत्मा के रूप में विकसित हुआ और क्यों उसके बिना यह परम्परा एकांगी बन जाती

बौद्ध दर्शन: भारतीय ज्ञान परम्परा की आत्मा
लेखक: डॉ. प्रमोद कुमार
(शैक्षणिक-वैचारिक आलेख)
भारतीय ज्ञान परम्परा को यदि एक जीवंत, प्रवहमान और बहुस्तरीय चेतना के रूप में देखा जाए, तो यह स्पष्ट होता है कि इसका निर्माण केवल वेदों, उपनिषदों, पुराणों या दर्शनों तक सीमित नहीं है। भारतीय बौद्धिक इतिहास की आत्मा उस समग्र दृष्टि में निहित है, जिसमें तर्क, अनुभव, करुणा, नैतिकता और मानव-मूल्यों का संतुलित समन्वय दिखाई देता है। इसी संदर्भ में बौद्ध दर्शन भारतीय ज्ञान परम्परा का केवल एक अंग नहीं, बल्कि उसकी आत्मा के रूप में उपस्थित है।
बौद्ध दर्शन ने भारतीय चिंतन को न केवल नई दिशा दी, बल्कि उसे आत्मालोचन, वैज्ञानिकता, सामाजिक नैतिकता और करुणा की कसौटी पर कसने का साहस भी प्रदान किया। यदि भारतीय ज्ञान परम्परा से बौद्ध दर्शन को अलग कर दिया जाए, तो यह परम्परा आधी-अधूरी, एकांगी और अभिजात्य बनकर रह जाएगी।

बौद्ध दर्शन का उद्भव उस ऐतिहासिक क्षण में हुआ, जब वैदिक कर्मकांड, यज्ञ-बलि, वर्ण-व्यवस्था और ब्राह्मणवादी वर्चस्व अपने चरम पर था। समाज में ज्ञान कुछ विशिष्ट वर्गों तक सीमित था और आम जनमानस के दुःख, शोषण और असमानता को धार्मिक वैधता प्रदान की जा रही थी। ऐसे समय में तथागत गौतम बुद्ध ने न किसी ईश्वर की सत्ता को केंद्र में रखा, न आत्मा या ब्रह्म जैसे अमूर्त प्रश्नों को प्राथमिकता दी। उन्होंने प्रत्यक्ष मानव-दुःख को अपने दर्शन का केंद्र बनाया।
दुःख, उसका कारण, उसका निरोध और निरोध का मार्ग—ये चार आर्य सत्य भारतीय ज्ञान परम्परा को पहली बार जीवन-केंद्रित, मानव-केंद्रित और व्यवहारिक दृष्टि प्रदान करते हैं। यही बौद्ध दर्शन की सबसे बड़ी विशेषता है कि वह अमूर्त आध्यात्मिकता के बजाय जीवन की यथार्थ स्थितियों से संवाद करता है।
बुद्ध ने तर्क और अनुभव को सर्वोच्च स्थान दिया। कालाम सूत्र में उनका आग्रह—कि किसी बात को केवल शास्त्र, परम्परा या प्रतिष्ठित व्यक्ति के कारण सत्य न मानो—भारतीय बौद्धिक इतिहास में विवेक और बौद्धिक स्वतंत्रता की घोषणा है। इसी दृष्टि ने आगे चलकर न्याय, वैशेषिक और वेदान्त जैसे दर्शनों को भी प्रभावित किया।
नैतिक दृष्टि से बौद्ध दर्शन ने शील, प्रज्ञा और करुणा को भारतीय ज्ञान परम्परा के केंद्र में स्थापित किया। अहिंसा, मैत्री, करुणा, मुदिता और उपेक्षा केवल व्यक्तिगत साधना नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता के आधार बने। जहाँ अन्य दर्शन मुक्ति को व्यक्तिगत लक्ष्य मानते हैं, वहीं बौद्ध दर्शन निर्वाण को समस्त प्राणियों के दुःख-निरोध से जोड़ता है। महायान परम्परा में बोधिसत्व की अवधारणा इसी सामूहिक मुक्ति का सर्वोच्च रूप है।
ज्ञान की लोकतांत्रिकता बौद्ध दर्शन का एक और ऐतिहासिक योगदान है। बुद्ध ने ज्ञान को जाति, वर्ण, लिंग या वर्ग की सीमाओं से मुक्त किया। संघ के द्वार शूद्रों, स्त्रियों और समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के लिए खुले थे। मनुष्य का मूल्य जन्म से नहीं, कर्म और चेतना से निर्धारित होता है—यह विचार आगे चलकर भक्ति आंदोलन, संत परम्परा और आधुनिक सामाजिक न्याय की प्रेरणा बना।
दार्शनिक स्तर पर अनात्मवाद, क्षणिकवाद और प्रतीत्यसमुत्पाद जैसी अवधारणाओं ने भारतीय ज्ञान परम्परा को गहरी वैज्ञानिकता प्रदान की। प्रतीत्यसमुत्पाद का सिद्धांत—कि हर वस्तु कारणों और परिस्थितियों पर निर्भर है—आज के विज्ञान, समाजशास्त्र और पर्यावरण अध्ययन से भी संवाद करता है।
नागार्जुन का शून्यवाद भारतीय दर्शन की बौद्धिक ऊँचाइयों में से एक है। शून्यता का अर्थ अभाव नहीं, बल्कि स्वभावगत सत्ता का अभाव है। यह दृष्टि द्वैत और अद्वैत के पार एक मध्य मार्ग प्रस्तुत करती है। शंकराचार्य का अद्वैत वेदान्त भी इससे अप्रत्यक्ष संवाद करता है, जिससे स्पष्ट होता है कि बौद्ध दर्शन भारतीय दर्शन का आलोचक ही नहीं, सह-निर्माता भी है।
कला, स्थापत्य और लोकसंस्कृति में भी बौद्ध दर्शन की गहरी छाप है—स्तूप, विहार, अजंता-एलोरा, सांची और भरहुत की शिल्पकला, जातक कथाएँ—सब करुणा और नैतिकता के सजीव उदाहरण हैं।
आधुनिक भारत में डॉ. भीमराव आंबेडकर ने बौद्ध धम्म को सामाजिक न्याय, समानता और मानव गरिमा के दर्शन के रूप में पुनर्स्थापित किया। उनके लिए बौद्ध दर्शन एक वैज्ञानिक और मानवतावादी जीवन-दृष्टि था, जिसने लोकतंत्र और संवैधानिक मूल्यों को नैतिक आधार दिया।
अंततः बौद्ध दर्शन भारतीय ज्ञान परम्परा की आत्मा इसलिए है, क्योंकि उसने उसे आत्मालोचन का साहस, करुणा की संवेदना, तर्क की दृढ़ता और मानव-मूल्यों की सार्वभौमिकता प्रदान की। बौद्ध दर्शन ने भारतीय ज्ञान परम्परा को शास्त्रों के संग्रह से उठाकर जीवन-दर्शन बनाया। दुःख से मुक्ति का मार्ग दिखाते हुए बुद्ध ने सिखाया कि ज्ञान का अंतिम उद्देश्य प्रभुत्व या प्रदर्शन नहीं, बल्कि मानव और मानवता का कल्याण है।
लेखक परिचय
डॉ. प्रमोद कुमार
डिप्टी नोडल अधिकारी, MyGov
डॉ. भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय, आगरा
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