विश्वविद्यालयों में पाठ्यक्रम बदलाव और अकादमिक स्वतंत्रता पर संकट

Political Desk, Taj News | Updated: Friday, 23 January 2026, 06:55 PM IST

दिल्ली विश्वविद्यालय सहित देश के सार्वजनिक विश्वविद्यालयों में पाठ्यक्रमों को लेकर बढ़ते वैचारिक हस्तक्षेप और अकादमिक स्वतंत्रता पर मंडराते संकट को लेखक अपूर्वानंद अपने इस तीखे आलेख में सामने रखते हैं, जहाँ जेंडर, भेदभाव, समाज, विश्व इतिहास और आधुनिक सामाजिक विज्ञान जैसे विषयों को “अभारतीय” बताकर हटाने की कोशिशें ज्ञान की स्वायत्तता पर सीधा प्रहार बनती दिखती हैं, और जहाँ विश्वविद्यालय शिक्षा का केंद्र न रहकर विचारधारात्मक अनुशासन का औज़ार बनाए जाने की आशंका गहराती जा रही है।

ज्ञान की गर्दन और हिंदुत्व की तलवार
अपूर्वानंद

दिल्ली विश्वविद्यालय की अकादमिक परिषद् की स्टैंडिंग कमेटी ने अर्थशास्त्र विभाग और इतिहास विभाग को अपने पाठ्यक्रम पर फिर से विचार करने के लिए कहा है। अर्थशास्त्र विभाग के पाठ्यक्रम की जिस इकाई पर एतराज जतलाया गया है, उसका शीर्षक है : ‘जेंडर और अर्थव्यवस्था’. उसमें भी ‘अपराध और जेंडर’ की उप इकाई से कमेटी के प्रभावशाली सदस्य खफा हैं। उनका कहना है कि पहले तो अर्थशास्त्र और अर्थव्यवस्था के अध्ययन का जेंडर से क्या लेना देना! दूसरे इसमें जेंडर से जुड़े अपराधों का ज़िक्र क्यों? यह अर्थशास्त्र से बाहर का मामला है।

उन्हें अर्थशास्त्र विभाग की अध्यक्ष ने समझाया कि औरतों के साथ घर में या बाहर होने वाली हिंसा का अर्थव्यवस्था से सीधा रिश्ता है। यह हिंसा आर्थिक कार्यों में उनकी हिस्सेदारी को प्रभावित करती है, अक्सर प्रतिकूल तरीक़े से। लेकिन समिति के सदस्य अड़े रहे और पाठ्यक्रम का प्रारूप वापस विभाग को भेज दिया गया। अब देखना है कि अगर विभाग बिना बदले पाठ्यक्रम वापस भेजे, तो समिति क्या करेगी।

अपूर्वानंद
अपूर्वानंद

मुझे इस ख़बर को पढ़ते हुए कुछ पहले अर्थशास्त्र विभाग के एक सहकर्मी से हुई बात याद आई। पाठ्यक्रम में एक पर्चा था, ‘भेदभाव का अर्थशास्त्र’ (इकोनॉमिक्स ऑफ डिस्क्रिमिनेशन)। स्टैंडिंग कमेटी ने इसे निकाल देने को कहा। जब विभाग के अध्यापक समिति के अध्यक्ष से मिलने गए, तो उन्होंने कहा कि डिस्क्रिमिनेशन शब्द तो कानों को ही अखरता है, इसे पाठ्यक्रम में कैसे शामिल किया जा सकता है।

इतिहास विभाग से कहा गया कि उनके पाठ्यक्रम में ‘विश्व इतिहास’ के बारे में इतना पढ़ाने की क्या ज़रूरत है। राष्ट्र का इतिहास ही इतना गहन और विस्तृत है कि बाहर जाने की क्या ज़रूरत? समझाया गया कि पाठ्यक्रम का 70% देश के इतिहास से संबंधित ही है, सिर्फ़ 30% विश्व इतिहास का हिस्सा है। इतिहास के छात्र अगर दुनिया के बारे में नहीं जानेंगे, तो कूपमंडूक न बन जाएंगे? आख़िरी फ़ैसला नहीं हुआ है। ‘प्राचीन भारतीय अर्थव्यवस्था और समाज’ नामक पर्चे से समाज शब्द को हटाने के लिए कहा गया।

यह मालूम हुआ कि कुछ लेखकों की किताबों या लेखों को हटाने के लिए कहा गया है, उनमें शीरीन मूसवी, इंद्राणी चटर्जी और रिचर्ड ईटन शामिल हैं। इसी साल मनोविज्ञान विभाग, भूगोल और राजनीति शास्त्र विभाग के पाठ्यक्रमों में भी इसी तरह की तब्दीली के सुझावों पर बहस हुई। मसलन, राजनीति शास्त्र विभाग को कहा गया कि वह पाकिस्तान और चीन, ‘धार्मिक राष्ट्रवाद’, ‘संघ की राजनीति’, ‘अंतरराष्ट्रीय संबंधों में इस्लाम’ और श्रीलंका में गृह युद्ध से जुड़ी इकाइयों को हटा दे। समाज शास्त्र विभाग से पूछा गया कि वे वेबर, दुर्ख़ीम और मार्क्स जैसे विदेशी विचारकों पर इतना बल क्यों दे रहे हैं। सलाह दी गई कि भारतीय विचारकों और भारतीय पारिवारिक मूल्यों पर ज़्यादा बल दिया जाए।

भूगोल विभाग से आंतरिक द्वंद्व और राष्ट्र निर्माण जैसे विषय से परहेज़ करने को कहा गया। उसी प्रकार, सामाजिक भूगोल को भी हटा देने के लिए कहा गया, जिसमें इसका अध्ययन किया जाता है कि अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लोग सामाजिक स्थान में कहां हैं। जाति, ‘चर्च’, ‘कल्ट’, ‘सेक्ट’ जैसे ‘विदेशी’ शब्दों को हटाकर ऋषि-मुनि जैसे भारतीय शब्दों को शामिल करने को कहा गया। पॉल ब्रास और नंदिनी सुंदर जैसे लेखकों की किताबों और लेखों को हटा दिया गया।

अगर आपको याद हो, दिल्ली पुलिस ने शरजील इमाम पर इल्ज़ाम लगाया है कि उसने पॉल ब्रास की किताबें पढ़ रखी हैं, जिससे उसका दिमाग़ ख़राब हो गया था। अब दिल्ली विश्वविद्यालय के अधिकारियों के प्रतिनिधि विद्यार्थियों को पॉल ब्रास से बचाना चाहते हैं।

पिछले 11 साल से पाठ्यक्रम निर्माण एक तरह की रस्साकशी में बदल गया है। बेचारे अध्यक्षों को तरह-तरह के राष्ट्रवादी और भारतीयतावादी कुतर्कों के बाणों से अपने-अपने पाठ्यक्रमों की रक्षा करनी पड़ती है। कोई भी विषय हो, ख़ासकर मानविकी और समाज विज्ञान में, जाति, जेंडर, भेदभाव, यौनिकता, एलजीबीटीक्यूआर जैसे शब्दों को देखते ही प्रशासन के प्रतिनिधि भड़क उठते हैं।

उसी प्रकार विदेशी लेखकों, विचारकों से भी उन्हें ख़ासा परहेज़ है। ज्ञान के भारतीयकरण की जल्दबाजी में समिति के सदस्य विशेषज्ञ अध्यापकों को दुत्कारने में तनिक संकोच नहीं करते।

कुछ विभागाध्यक्ष ज्ञान के अपने क्षेत्र, अपने अनुशासन की ज़रूरत से प्रतिबद्ध महसूस करते हैं, इसलिए समिति में बहस करते हैं। कई बार उन्हें चतुराई बरतनी पड़ती है। कुछ को इस संघर्ष में अपनी ऊर्जा लगाना व्यर्थ लगता है और वे पहले से ही पाठ्यक्रम का भारतीयकरण और हिंदूकरण कर लेते हैं। जैसे मेरे विषय हिंदी साहित्य में भारतीयता बोध का एक पर्चा शुरू कर दिया गया है। उसी प्रकार सुना, हिंदू नवोत्थान भी किसी पर्चे का हिस्सा बनाया गया है। प्रेमचन्द के उपन्यास ‘गोदान’ से भी उलझन है, क्योंकि उसमें आख़िरकार एक हिंदू ही गाय की हत्या करता है। इस तरह की हिंदू विरोधी रचना को पढ़ना और पढ़ाना धर्मद्रोह ही तो है!

ऐसी रचनाओं की खोज की जा रही है, जो हिंदू राष्ट्रवाद की विचारधारा के अनुकूल हों। दुर्भाग्य से ऐसे लेखक न के बराबर हैं। अगर ठेठ ‘भारतीयतावादी’ रचनाएं न मिलें, तो राष्ट्रवादी रचनाओं से ही काम चलाया जाता है।

स्नातक स्तर पर भी मूल्यों और हुनर के नाम पर ऐसे पर्चे पढ़ाए जा रहे हैं, जिनका कोई अकादमिक मूल्य नहीं है, जैसे ‘स्वच्छता’ या ‘प्रसन्नता’ से जुड़े हुए पर्चे। इन बेकार के पर्चों में विद्यार्थियों का वक्त ज़ाया होता है। आप दिल्ली विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों से बात करेंगे, तो आपको मालूम होगा कि वे ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं। उन्हें लग रहा है कि बड़ा नाम सुनकर वे आए, लेकिन दिल्ली विश्वविद्यालय से उन्हें अकादमिक निराशा ही हाथ लगी।

अभी एक छात्रा ने कहा कि उसने 4 साल का बीए चुना, लेकिन अब वह देख रही है कि एक साल का एमए कार्यक्रम सिर्फ़ दिल्ली विश्वविद्यालय में है, और कहीं नहीं। इसका मतलब कि दिल्ली विश्वविद्यालय के अलावा उसके पास कोई विकल्प नहीं। वह एक तरह से यहां बंधक बना ली गई है।

उसी तरह पीएचडी कार्यक्रम में दाख़िले के बारे में निर्देश दिया जा रहा है कि प्राथमिकता जेआरएफ हासिल किए उम्मीदवारों को देनी है। जेआरएफ या नेट एक तरह का जुआ है। उसमें रट्टेबाजी में महारत के अलावा और कोई योग्यता नहीं चाहिए। अफ़सोस के साथ हम देखते रहे हैं कि हमारे कई प्रतिभाशाली विद्यार्थी बार-बार प्रयास के बाद भी जेआरएफ हासिल नहीं कर पाते हैं। दोष उनका नहीं, परीक्षा की पद्धति का है। फ़लां कहानी के फ़लां चरित्र ने किसी एक दृश्य में कौन से रंग की चप्पल पहन रखी थी, फ़लां चरित्र की टोपी का रंग क्या था : इस तरह के सवालों के जवाब के लिए कौन सी प्रतिभा चाहिए?

विद्यार्थियों में शोध के प्रति रुझान है या नहीं, उनकी लेखन क्षमता कैसी है, इन सबकी जांच की ज़रूरत नहीं। उस पर अधिकारी कहते हैं कि पीएचडी में दाख़िले ज़्यादा से ज़्यादा होने चाहिए। कुछ विभागों में पीएचडी कार्यक्रमों में सैकड़ों विद्यार्थी दाखिल हैं और शोधरत हैं।

पीएचडी के लिए चुने जा रहे शोध विषयों को सुनकर आप माथा पीट लेंगे। साहित्य के इलाक़े के लोगों को शायद पोखरियाल साहब की (जो निशंक उपनाम से लिखते हैं) रचनाशीलता का इल्म न हो। उनकी इस कमी को दूर करने के लिए उनके साहित्य पर शोध करवाया जा रहा है। उनकी योग्यता संभवतः राजनीतिक थी। जब शोध विषय चुना गया, तब वे मंत्री थे। बाद में नहीं रहे, लेकिन उनकी साहित्यिक महत्ता का पता करने के लिए शोध तो जारी है!

ऐसा नहीं कि सब कुछ ख़त्म हो गया है। जैसा मैंने पहले लिखा, कई अध्यक्ष और अध्यापक अपने विषय की गरिमा की रक्षा करने के लिए तरह-तरह की जुगत लगाते हैं। कुछ मामलों में वे सफल हो जाते हैं और कुछ में उन्हें समझौता करना पड़ता है। यह कहा जा सकता है कि भारत के विश्वविद्यालय एक तरह के युद्ध क्षेत्र हैं, जहां ज्ञान और हिंदुत्ववादी विचारधारा के बीच भीषण युद्ध चल रहा है। ज्ञान बेचारा ख़ुद तो लड़ नहीं सकता। उसकी तरफ़ से अध्यापक, जो बचे रह गए हैं, समितियों में इसके लिए तैयार होकर जाते है कि वे तरह-तरह के हिंदुत्ववादी कुतर्कों की काट कैसे करेंगे।

दिल्ली विश्वविद्यालय या जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय या जिन्हें सरकारी शैक्षणिक संस्थान कहा जाता है, उनके अलावा अशोका यूनिवर्सिटी या शिव नादर यूनिवर्सिटी में इतिहास या समाजशास्त्र या भूगोल या साहित्य को इस तरह के हिंदुत्ववादी आक्रमण नहीं झेलने पड़ते।

इस साल हमने भारत में विदेशी विश्वविद्यालयों के परिसरों को खुलते देखा है। क्या उनके पाठ्यक्रम भी आज के हिंदुत्ववादी राष्ट्रवाद के अनुरूप होंगे? अगर नहीं, तो क्यों? उनके विद्यार्थियों को क्यों राष्ट्रवाद के प्रसाद से वंचित रखा जा रहा है?

इसका मतलब यह है कि ज्ञान के क्षेत्र में अब एक नई प्रकार की विषमता पैदा हो रही है। एक भारतीयतावादी ज्ञान है, जो आधुनिक शोध से अपना मुंह मोड़े है, क्योंकि वह प्रायः ‘विदेशी’ है और एक वह ज्ञान है, जो हर दुनिया के किसी भी हिस्से में होनेवाले शोध से ख़ुद को समृद्ध करता रहता है। अगर आपको चुनाव करना हो, तो कैसे चुनेंगे?

इसी कारण अब कई अध्यापक भी अपने बच्चों का दाख़िला इन निजी विश्वविद्यालयों में करवा रहे हैं। ज्ञान के क्षेत्र में पैदा हो रही इस नई असमानता के गंभीर परिणाम होंगे। भारत के सार्वजनिक विश्वविद्यालयों में अब विश्वस्तरीय विदुषी या विद्वान पैदा होंगे, इसमें संदेह है। अभी के पाठ्यक्रमों में दीक्षित विद्यार्थी क्या बाहर के विश्वविद्यालयों में शोधार्थियों या अध्यापकों के रूप में स्वीकार किए जाएंगे? क्या वे ज्ञान की अंतर्राष्ट्रीय दुनिया के सदस्य हो पाएंगे?

इस मामले में वे निजी विश्वविद्यालयों के विद्यार्थियों के मुक़ाबले पिछड़ने को अभिशप्त हैं और इसमें उनका कोई दोष नहीं। अभी तो ‘राष्ट्रविरोधी’ किताबें सिर्फ़ पाठ्यक्रमों से निकाली जा रही हैं। धीरे-धीरे वे पुस्तकालयों से ग़ायब हो जाएंगी। उनका ज़िक्र भी बंद हो जाएगा। ज्ञान के देश में एक लंबी, ठंडी रात शुरू हो गई है। इसमें संदेह है कि भारत के हिंदुओं को यह अहसास भी हो पाएगा कि उनके साथ, उनके बच्चों, बच्चियों के साथ क्या अन्याय किया जा रहा है। वे ज्ञान के इस धीमे संहार से ख़ुद को दोष मुक्त नहीं कर सकते, क्योंकि ऐसा करने वालों को उन्होंने ही तलवार थमाई है कि वे ज्ञान का गला रेत दें.

(साभार : हिंदी वायर। लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाते हैं।)

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