ताज की छाया में बदलती प्रेम कथाएँ Taj Mahal

Sunday, 11 January 2026. Agra, Uttar Pradesh

ताजमहल केवल इतिहास की एक इमारत नहीं, बल्कि प्रेम की बदलती परिभाषाओं का मूक साक्षी है। जहाँ कभी शाहजहाँ ने मोहब्बत को संगमरमर में अमर किया, वहीं आज उसी ताज की छाया में मोबाइल स्क्रीन, मिस्ड कॉल और डेटिंग ऐप्स नए रिश्तों की भाषा गढ़ रहे हैं। यह कॉलम परंपरा और तकनीक के बीच बदलते भारतीय प्रेम को समझने की एक संवेदनशील कोशिश ह

संगमरमर में बसी मोहब्बत, मोबाइल पर पनपता इश्क़: ताज की छाया में बदलती प्रेम कथाएँ


कॉलम लेखक: बृज खंडेलवाल
(विशेष कॉलम)


सुबह की धुंध में ताजमहल जब धीरे-धीरे उभरता है, तो लगता है कोई राज़ खोलने वाला है। संगमरमर की खामोशी पूछती है, क्या इश्क़ अब भी इतना ही गहरा है, या वह मोबाइल की स्क्रीन पर सिमट गया है? जहाँ कभी शाहजहाँ ने मोहब्बत को पत्थर में कैद किया, वहीं आज उसी साये में व्हाट्सऐप, मिस्ड कॉल और डेटिंग ऐप्स नए रिश्ते गढ़ रहे हैं। सवाल बस इतना है, क्या यह नया इश्क़ भी सदियों टिक पाएगा?
जब आप ताज को देखते हैं, तो सिर्फ़ सफ़ेद संगमरमर नहीं दिखता। वहाँ सदियों की आहें, वादे, टूटे-फूटे ख़्वाब और निभाई गई कसमें भी चमकती नज़र आती हैं। मुमताज़ महल के लिए शाहजहाँ द्वारा बनवाया गया यह मक़बरा, जिसने उन्हें चौदह बच्चों की सौगात दी, आज भी दुनिया को यही बताता है कि अगर मोहब्बत जुनून बन जाए, तो वह पत्थर में भी अमर हो सकती है।
“कमाल है,” ऑस्ट्रेलिया से आए जेम्स ने हँसते हुए कहा, “एक औरत, चौदह बच्चे और बदले में ताजमहल! पश्चिमी दुनिया में इतनी औलाद के लिए दस शादियाँ और एक फ़र्टिलिटी क्लिनिक चाहिए।” ताजमहल सिर्फ़ प्रेम का प्रतीक नहीं, संस्कृतियों की तुलना का आईना भी है।

बृज खंडेलवाल

भारत में प्रेम हमेशा से अलग रंगों में ढला रहा है। यहाँ इश्क़ सिर्फ़ जिस्मानी आकर्षण नहीं रहा, बल्कि सब्र, समझदारी और सामाजिक तालमेल का नाम भी रहा है। अरेंज्ड मैरिज की परंपरा इसी सोच से निकली। फ्रांस से आई मैरी को यह बात दिलचस्प लगी। “तोहफ़ों का लेन-देन और ज़ोर-शोर से मोहब्बत जताना यहाँ अटपटा लगता है,” वह बोलीं। “कामसूत्र की धरती पर इश्क़ कभी सेल या इवेंट नहीं था, बल्कि दर्शन था।”
विदेशी अक्सर हैरान रहते हैं कि जहाँ पश्चिम में शादियाँ टूट रही हैं, वहीं भारत में अरेंज्ड मैरिज आज भी टिकाऊ क्यों मानी जाती है। आँकड़े भी यही इशारा करते हैं। भारत में तलाक़ की दर क़रीब एक फ़ीसदी है, दुनिया में सबसे कम। कहा जाता है कि अरेंज्ड मैरिज में यह दर और भी कम है, जबकि लव मैरिज में टूटन ज़्यादा दिखती है।
हालाँकि, हर रिसर्च एक जैसी बात नहीं कहती। कुछ अध्ययनों के मुताबिक़ अरेंज्ड और लव मैरिज की सफलता में बहुत ज़्यादा फ़र्क़ नहीं है। मतलब साफ़ है, शादी कैसे शुरू हुई, यह कम अहम है; ज़्यादा अहम है कि उसे निभाया कैसे गया।
शायद इसी भरोसे ने कई विदेशियों को आगरा, वृंदावन और गोवर्धन में पूरे हिंदू रीति-रिवाज़ से शादी करने के लिए खींचा है। उन्हें लगता है कि भारतीय शादी सिर्फ़ रस्म नहीं, एक लंबा सफ़र है।
कॉलेजों में इस पर ज़ोरदार बहस चलती है। युवा पीढ़ी प्यार को लेकर उत्साहित भी है और डरी हुई भी। पवन, एक छात्र, कहते हैं, “लव मैरिज रोमांटिक लगती है, लेकिन रिस्की भी।” फिर भी, कामकाजी युवाओं में लंबी दोस्ती और समझ के बाद शादी का चलन बढ़ रहा है।
भारत में प्रेम सिर्फ़ देह तक सीमित नहीं रहा। गोकुल के आचार्य गोपी याद दिलाते हैं, “राधा जी, श्री कृष्ण से उम्र में बड़ी थीं और शादीशुदा थीं, फिर भी उनका प्रेम भक्ति आंदोलन की बुनियाद बना। मीरा ने कभी कृष्ण को देखा तक नहीं, फिर भी उनके प्रेम भक्ति में सब कुछ छोड़ दिया।” यानी हमारी संस्कृति में मोहब्बत रूहानी भी है, सिर्फ़ शारीरिक नहीं।
फिर भी समाज जल्दी जज करता है। लव मैरिज नाकाम हो जाए तो शोर मच जाता है। अनीता, एक छात्रा, कहती हैं, “जाति और परंपरा से जकड़ा समाज जानबूझकर नाकामियों को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाता है, ताकि लोग बग़ावत न करें।” उनकी दोस्त वेदिता बताती हैं कि आजकल “अरेंज्ड लव मैरिज” का ज़माना है, पहले प्यार, फिर माता-पिता से शादी की अरेंजमेंट।
बाज़ार भी पीछे नहीं है। संजय प्लेस के दुकानदार राकेश हँसते हुए कहते हैं। “मोहब्बत साल में एक दिन की चीज़ नहीं। कंपनियों ने जज़्बात को त्योहार बना दिया है।”
इश्क़ कभी-कभी अजीब रास्तों से भी आता है। रोहित, एक स्कूल टीचर, बताते हैं कि उनकी शादी एक ग़लत मोबाइल कॉल से शुरू हुई, वे बनारस में थे, होने वाली बीवी पुणे में। एक मिस्ड कॉल से छोटी-सी बात ने ज़िंदगी बदल दी।
समाजशास्त्री प्रोफेसर पारस नाथ चौधरी मानते हैं कि बदलाव तय है। “पहले लोग दिल की बात दबा लेते थे,” वे कहते हैं। “अब युवा खुलकर जीना चाहते हैं। जैसे-जैसे लड़कियाँ पढ़ाई और नौकरी के लिए बाहर निकलेंगी, जाति और बंदिशें टूटेंगी। “इश्क़ की केमिस्ट्री और फ़िज़िक्स अपना असर दिखाएगी।”
इन तमाम बहसों के बीच ताजमहल अब भी अडिग खड़ा है। रोज़ हज़ारों जोड़े, शादीशुदा, प्रेमी, आशिक, लिव-इन में रहने वाले, यहाँ आते हैं, शायद इस उम्मीद में कि संगमरमर की यह इमारत उनके रिश्ते में भी मज़बूती भर दे।
आख़िरकार, भारत में प्रेम अब काला-सफ़ेद नहीं रहा। यह परंपरा और पसंद, सब्र और जुनून का मिला-जुला रंग है। चाहे रिश्ता घरवालों ने जोड़ा हो या दिल ने चुना हो, मोहब्बत का सफ़र जारी है। ताजमहल बस यही याद दिलाता है कि ज़माना बदल जाए, इंसान का इश्क़ कभी पुराना नहीं होता।

✍️ संपादन: ठाकुर पवन सिंह
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By Thakur Pawan Singh

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