वेनेजुएला: महाशक्ति की ताकत से भयाक्रांत

Wednesday, 04 December 2025, 7:56:36 AM. International Desk

विधि के प्रोफेसर और वरिष्ठ विश्लेषक डॉ. अनिल दीक्षित के अनुसार, अंतर्राष्ट्रीय राजनीति के मौजूदा दौर में वेनेजुएला से जुड़ा घटनाक्रम केवल एक देश या क्षेत्र तक सीमित नहीं रह गया है। अमेरिका द्वारा वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी सिलिया फ्लोरेस को अपने नियंत्रण में लेने के दावे ने वैश्विक राजनीति में गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यह मामला केवल सत्ता परिवर्तन का नहीं, बल्कि अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था, संप्रभुता और नियम-आधारित विश्व व्यवस्था की विश्वसनीयता से जुड़ा हुआ है, जिसका प्रभाव भारत सहित पूरी दुनिया पर पड़ सकता है।

VenezuelaCrisis

अंतर्राष्ट्रीय राजनीति, संप्रभुता और महाशक्ति हस्तक्षेप

डॉ. अनिल दीक्षित


अंतर्राष्ट्रीय जगत में शायद ही कभी कोई ऐसी घटना सामने आती है, जो एक साथ हैरानी, चिंता और असहजता पैदा करे। अमेरिका का कथित रूप से हमला कर वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी सिलिया फ्लोरेस को अपने नियंत्रण में लेने का दावा ऐसी ही घटना है। यह केवल एक सैन्य या राजनीतिक कार्रवाई नहीं है, बल्कि उस अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था के लिए एक कठोर प्रश्न है, जिसे नियमों, सहमति और संप्रभुता के सिद्धांतों पर आधारित बताया जाता रहा है। भारत की बात करें तो ये कूटनीतिक इम्तिहान की घड़ी है

यह घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आया है जब वैश्विक राजनीति पहले से ही अविश्वास, टकराव और अनिश्चितता के दौर से गुजर रही है। यूक्रेन, पश्चिम एशिया और एशिया-प्रशांत क्षेत्र में चल रहे तनावों के बीच किसी संप्रभु राष्ट्र के शीर्ष नेतृत्व को बलपूर्वक हटाने का दावा उस विश्व व्यवस्था को चुनौती देता है, जिसे द्वितीय विश्व युद्ध के बाद स्थिरता और शांति के उद्देश्य से गढ़ा गया था। यदि यह दावा सही ठहराया जाता है, तो इसका अर्थ होगा कि अब सत्ता परिवर्तन की सीमाएं भी ताक़त तय करेगी।

डॉ. अनिल दीक्षित

अमेरिका का तर्क यह है कि यह कदम लोकतंत्र, जवाबदेही और कानून के शासन की रक्षा के लिए उठाया गया। किंतु यह प्रश्न टाला नहीं जा सकता कि क्या लोकतंत्र की रक्षा सैन्य हस्तक्षेप और बाहरी दबाव के जरिये की जा सकती है। किसी देश के आंतरिक राजनीतिक संकट का समाधान यदि बाहरी शक्ति तय करने लगे, तो संप्रभुता एक जीवंत सिद्धांत नहीं, बल्कि एक औपचारिक अवधारणा बनकर रह जाती है। यही वह बिंदु है जहाँ यह मामला वेनेजुएला से आगे बढ़कर पूरी अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था को प्रभावित करता है।

यह भी महज संयोग नहीं है कि यह कार्रवाई डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में सामने आई है। ट्रंप की विदेश नीति सदैव निर्णायक, आक्रामक और शक्ति-प्रदर्शन पर आधारित रही है। उनके लिए कूटनीति अक्सर धैर्य और संवाद की नहीं, बल्कि दबाव और परिणाम की भाषा रही है। वेनेजुएला का यह घटनाक्रम उसी सोच का विस्तार प्रतीत होता है, जहां संदेश स्पष्ट है कि अमेरिका अब केवल चेतावनी देकर संतोष नहीं करेगा, बल्कि परिस्थितियों को अपने अनुसार मोड़ने का प्रयास करेगा।

इस पूरे घटनाक्रम के केंद्र में सत्ता का प्रश्न है। आखिर अमेरिका वेनेजुएला में किसे शासन सौंपना चाहता है। यह सर्वविदित है कि अमेरिका लंबे समय से निकोलस मादुरो सरकार को वैध मानने से इंकार करता रहा है और विपक्षी नेतृत्व को समर्थन देता रहा है। अब राष्ट्रपति को हटाने का दावा उस रणनीति को निर्णायक रूप देने जैसा है, जिसमें शासन परिवर्तन को ही समाधान के रूप में देखा जा रहा है। इतिहास बताता है कि इस प्रकार के प्रयोग अक्सर स्थिरता लाने के बजाय लंबे समय तक अस्थिरता, गृह संघर्ष और संस्थागत कमजोरी को जन्म देते हैं।

वेनेजुएला केवल एक राजनीतिक संकटग्रस्त राष्ट्र नहीं है, बल्कि वैश्विक ऊर्जा राजनीति का भी एक महत्वपूर्ण केंद्र है। दुनिया के सबसे बड़े तेल भंडारों में से एक पर नियंत्रण रखने वाला यह देश वर्षों से आर्थिक प्रतिबंधों और अंतरराष्ट्रीय दबावों के बीच पिसता रहा है। ऐसे में सत्ता परिवर्तन की यह प्रक्रिया यह आशंका भी पैदा करती है कि कहीं लोकतंत्र और मानवाधिकारों की भाषा के पीछे संसाधनों की राजनीति निर्णायक भूमिका तो नहीं निभा रही। यह प्रश्न नया नहीं है, लेकिन वेनेजुएला के संदर्भ में यह और अधिक प्रासंगिक हो उठता है।

लैटिन अमेरिका के लिए यह घटनाक्रम विशेष रूप से चिंता का विषय है। इस क्षेत्र का इतिहास बाहरी हस्तक्षेप, सत्ता पलट और अस्थिर सरकारों से भरा रहा है। इसलिए वेनेजुएला में हुई इस कार्रवाई को केवल एक देश की घटना के रूप में नहीं देखा जा रहा। यह पूरे क्षेत्र को यह संकेत देती है कि यदि कोई शासन महाशक्ति की प्राथमिकताओं के अनुरूप नहीं है, तो उसकी संप्रभुता असुरक्षित हो सकती है।

सबसे गंभीर प्रश्न अंतर्राष्ट्रीय कानून के भविष्य को लेकर है। यदि किसी महाशक्ति को यह अधिकार मिल जाता है कि वह अपने आरोपों और आकलनों के आधार पर किसी देश के निर्वाचित राष्ट्रपति को हटाए, तो वैश्विक व्यवस्था किस दिशा में जाएगी। क्या संयुक्त राष्ट्र चार्टर केवल कमजोर देशों के लिए बाध्यकारी रहेगा और शक्तिशाली राष्ट्र उससे ऊपर माने जाएंगे। वेनेजुएला की यह घटना हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या दुनिया फिर उसी दौर की ओर लौट रही है, जहाँ नियम नहीं बल्कि ताक़त अंतिम निर्णायक हुआ करती थी। यदि ऐसा है, तो यह केवल वेनेजुएला की नहीं, बल्कि पूरी अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था की हार होगी।

वेनेजुएला में सत्ता से जुड़े ताज़ा घटनाक्रम का प्रभाव भले ही भौगोलिक रूप से दूर प्रतीत हो, लेकिन भारत के लिए इसके निहितार्थ अनदेखे नहीं किए जा सकते। भारत की विदेश नीति पारंपरिक रूप से संप्रभुता, गैर-हस्तक्षेप और बहुपक्षीय व्यवस्था के समर्थन पर आधारित रही है। ऐसे में किसी देश के राष्ट्रपति को बलपूर्वक हटाने का दावा भारत को एक कठिन कूटनीतिक स्थिति में खड़ा करता है।

भारत लंबे समय से वेनेजुएला के साथ ऊर्जा और आर्थिक संबंध बनाए हुए है। प्रतिबंधों के दौर में भी भारत ने व्यावहारिक संतुलन साधते हुए अपने हितों की रक्षा की है। यदि वहां सत्ता परिवर्तन अस्थिरता के साथ आगे बढ़ता है, तो इसका सीधा असर वैश्विक तेल आपूर्ति और कीमतों पर पड़ सकता है, जिसका भार अंततः भारत जैसे आयात-निर्भर देश पर आएगा।

इस घटनाक्रम का एक और पहलू वैश्विक व्यवस्था से जुड़ा है। यदि शक्तिशाली देश अपने हितों के अनुसार शासन बदलने की नीति को वैध ठहराने लगते हैं, तो यह सिद्धांत भविष्य में किसी भी क्षेत्र पर लागू हो सकता है। भारत, जो स्वयं रणनीतिक स्वायत्तता और नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था का समर्थक है, ऐसी प्रवृत्तियों को लेकर स्वाभाविक रूप से सतर्क रहेगा।

भारत की चुनौती यह होगी कि वह अमेरिका के साथ अपने रणनीतिक संबंधों को बनाए रखते हुए भी अंतर्राष्ट्रीय कानून और संप्रभुता के मूल सिद्धांतों से समझौता न करे। यही संतुलन भारत की विदेश नीति की पहचान रहा है और वेनेजुएला संकट इस संतुलन की एक नई परीक्षा बनकर उभरा है। यानी भारत के लिए यह केवल एक दूरस्थ लैटिन अमेरिकी संकट नहीं, बल्कि उस वैश्विक व्यवस्था का सवाल है जिसमें भारत अपनी भूमिका भविष्य में और मजबूत करना चाहता है।

(लेखक विधि के प्रोफेसर हैं।)

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✍️ संपादन: ठाकुर पवन सिंह
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