आंबेडकर और आरएसएस के विचारों में सामाजिक समरसता

Political Desk, Taj News | Updated: Thursday, 29 January 2026, 08:10 PM IST

“अखण्ड और विकसित भारत” की परिकल्पना केवल आर्थिक प्रगति या भौगोलिक एकता तक सीमित नहीं है, और लेखक डॉ प्रमोद कुमार इस लेख में तर्क देते हैं कि सामाजिक समरसता, समानता और न्याय के बिना राष्ट्र-निर्माण अधूरा है, क्योंकि आंबेडकर के सामाजिक लोकतंत्र और आरएसएस की सांस्कृतिक एकात्मता के बीच कुछ साझा वैचारिक बिंदु ऐसे हैं जो भारत को अंदर से मजबूत, एकजुट और टिकाऊ विकास की दिशा दे सकते हैं।

आंबेडकर और आरएसएस के विचारों में सामाजिक समरसता

“अखण्ड और विकसित भारत” की परिकल्पना केवल भौगोलिक अखंडता या आर्थिक प्रगति तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक ऐसे राष्ट्र-स्वप्न का नाम है जिसमें सामाजिक समरसता, न्याय, समानता और आत्मगौरव का संतुलित समन्वय हो। भारत की बहुलतावादी संरचना—भाषाई, धार्मिक, सांस्कृतिक और जातीय विविधताओं से परिपूर्ण—तभी एक सशक्त राष्ट्र के रूप में विकसित हो सकती है जब उसके भीतर गहरे स्तर पर सामाजिक एकात्मता और पारस्परिक सम्मान का भाव स्थापित हो। इसी संदर्भ में डॉ. भीमराव आंबेडकर और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की विचारधाराओं का तुलनात्मक अध्ययन महत्वपूर्ण हो जाता है। सामान्यतः इन दोनों धाराओं को वैचारिक रूप से विरोधी या परस्पर दूरस्थ माना जाता है, किंतु यदि गहन विश्लेषण किया जाए तो सामाजिक समरसता, राष्ट्रनिर्माण और सांस्कृतिक एकता के कुछ साझा बिंदु भी दृष्टिगोचर होते हैं, जिनके आधार पर “अखण्ड और विकसित भारत” की अवधारणा को समझा जा सकता है।

डॉ. आंबेडकर का संपूर्ण चिंतन सामाजिक न्याय और समानता पर आधारित था। उन्होंने जाति-व्यवस्था को भारतीय समाज की सबसे बड़ी बाधा माना और इसे सामाजिक विखंडन का मूल कारण बताया। उनके अनुसार, जब तक समाज में समता और बंधुता स्थापित नहीं होगी, तब तक स्वतंत्रता का कोई वास्तविक अर्थ नहीं रहेगा। आंबेडकर का यह कथन कि “राजनीतिक लोकतंत्र तभी टिकेगा जब वह सामाजिक लोकतंत्र पर आधारित होगा” भारतीय राष्ट्र-निर्माण की दिशा को स्पष्ट करता है। उनके लिए सामाजिक समरसता का अर्थ था—मानव-मानव के बीच सम्मानजनक संबंध, अवसरों की समानता और भेदभाव का पूर्ण उन्मूलन। उन्होंने संविधान के माध्यम से समान नागरिक अधिकारों, विधि के समक्ष समानता और आरक्षण जैसे प्रावधानों द्वारा ऐतिहासिक अन्याय को संतुलित करने का प्रयास किया। उनके चिंतन में “अखण्ड भारत” का तात्पर्य केवल भौगोलिक एकता नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता के माध्यम से निर्मित आंतरिक एकता था।

दूसरी ओर, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना भी राष्ट्र की एकता और सांस्कृतिक पुनरुत्थान के उद्देश्य से हुई। आरएसएस का मूल विचार “संगठन” और “समरसता” पर आधारित है। संघ का मानना है कि भारत एक सांस्कृतिक राष्ट्र है जिसकी आत्मा उसकी सनातन परंपरा और साझा सभ्यता में निहित है। संघ की शाखाओं में जाति, वर्ग, भाषा या क्षेत्र के आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया जाता; सभी स्वयंसेवक एक पंक्ति में खड़े होकर एक समान अभ्यास करते हैं, जो प्रतीकात्मक रूप से सामाजिक समानता और एकात्मता का संदेश देता है। संघ का “एकात्म मानववाद” का सिद्धांत, जिसे पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने प्रतिपादित किया, व्यक्ति और समाज के समन्वित विकास की बात करता है। इसमें आर्थिक विकास के साथ-साथ नैतिक और सांस्कृतिक उन्नयन पर भी बल दिया गया है।

Dr. Pramod Kumar
डॉ प्रमोद कुमार

यद्यपि डॉ. आंबेडकर ने हिंदू सामाजिक संरचना की तीखी आलोचना की और अंततः बौद्ध धम्म को अपनाया, उनका उद्देश्य समाज का विघटन नहीं, बल्कि उसका नैतिक पुनर्निर्माण था। वे भारतीय संस्कृति के आलोचक थे, परंतु भारत की एकता के समर्थक भी। उन्होंने संविधान सभा में राष्ट्रीय एकता की आवश्यकता पर जोर दिया और चेतावनी दी कि यदि सामाजिक असमानताएँ बनी रहीं तो राष्ट्र की अखंडता संकट में पड़ सकती है। इसी प्रकार, आरएसएस भी सामाजिक विघटन को राष्ट्र के लिए खतरा मानता है और सामाजिक समरसता अभियानों के माध्यम से दलित और वंचित वर्गों के साथ संवाद स्थापित करने का प्रयास करता रहा है। संघ के विभिन्न संगठनों द्वारा चलाए जा रहे सेवा कार्य—शिक्षा, स्वास्थ्य और ग्रामीण विकास—सामाजिक समावेशन की दिशा में कदम माने जाते हैं।

दोनों विचारधाराओं के साझा वैचारिक आधार को समझने के लिए “समरसता” और “राष्ट्रवाद” की अवधारणाओं पर विचार करना आवश्यक है। आंबेडकर का राष्ट्रवाद संवैधानिक और लोकतांत्रिक मूल्यों पर आधारित था। वे व्यक्ति की गरिमा को सर्वोच्च मानते थे और मानते थे कि राष्ट्र का निर्माण समान अधिकारों और सामाजिक न्याय से होता है। आरएसएस का राष्ट्रवाद सांस्कृतिक चेतना और ऐतिहासिक गौरव पर आधारित है। वह भारत को एक प्राचीन सांस्कृतिक राष्ट्र के रूप में देखता है जिसकी एकता उसकी परंपराओं और आध्यात्मिक विरासत में निहित है। यदि इन दोनों दृष्टिकोणों को समन्वित रूप से देखा जाए तो स्पष्ट होता है कि एक ओर संवैधानिक समानता और दूसरी ओर सांस्कृतिक एकात्मता—दोनों मिलकर अखण्ड और विकसित भारत की नींव रख सकते हैं।

सामाजिक समरसता के संदर्भ में आंबेडकर ने “बंधुता” (Fraternity) को लोकतंत्र का अनिवार्य तत्व बताया। उनके अनुसार, बिना बंधुता के न तो स्वतंत्रता सुरक्षित रह सकती है और न ही समानता। यह विचार संघ की “सर्वे भवन्तु सुखिनः” की भावना से भिन्न नहीं है, जहाँ समाज के प्रत्येक घटक के सुख और कल्याण की कामना की जाती है। दोनों ही धाराएँ समाज को विखंडित करने वाले तत्वों—जातीय विद्वेष, सामाजिक अन्याय और नैतिक पतन—को राष्ट्र की प्रगति में बाधा मानती हैं।

हालाँकि, यह भी स्वीकार करना होगा कि दोनों के बीच मतभेद भी रहे हैं। आंबेडकर ने जिस सामाजिक क्रांति की बात की, वह परंपरागत ढाँचों को चुनौती देती थी। आरएसएस की विचारधारा सांस्कृतिक निरंतरता और परंपरा के संरक्षण पर बल देती है। परंतु समकालीन भारत में इन मतभेदों को संवाद और पुनर्व्याख्या के माध्यम से संतुलित किया जा सकता है। यदि संघ सामाजिक समता के प्रश्न पर अधिक संवेदनशील और सक्रिय भूमिका निभाए तथा आंबेडकरवादी चिंतन सांस्कृतिक एकात्मता के सकारात्मक आयामों को स्वीकार करे, तो दोनों धाराएँ एक व्यापक राष्ट्रीय उद्देश्य की पूरक बन सकती हैं।

“विकसित भारत” की संकल्पना केवल आर्थिक संकेतकों—जीडीपी, औद्योगिक विकास या तकनीकी प्रगति—तक सीमित नहीं हो सकती। यह सामाजिक पूंजी, विश्वास और सामुदायिक सहयोग पर भी निर्भर करती है। जब समाज के विभिन्न वर्ग एक-दूसरे के प्रति विश्वास और सम्मान रखते हैं, तब ही स्थायी विकास संभव है। आंबेडकर का सामाजिक न्याय और संघ का सामाजिक संगठन—दोनों मिलकर ऐसी सामाजिक पूंजी का निर्माण कर सकते हैं। शिक्षा, नैतिकता और सेवा-भाव—इन तीन आधारों पर दोनों धाराएँ समान रूप से जोर देती हैं।

आज के भारत में जातीय तनाव, धार्मिक ध्रुवीकरण और क्षेत्रीय असंतुलन जैसी चुनौतियाँ मौजूद हैं। इन चुनौतियों का समाधान न तो केवल कानूनी प्रावधानों से संभव है और न ही केवल सांस्कृतिक अभियानों से। इसके लिए संवैधानिक मूल्यों और सांस्कृतिक चेतना का संतुलित समन्वय आवश्यक है। आंबेडकर का संविधान और संघ की संगठनात्मक शक्ति—यदि दोनों का उपयोग सामाजिक समरसता के लिए हो—तो भारत न केवल अखण्ड रहेगा, बल्कि विकसित और आत्मनिर्भर भी बनेगा।

अंततः, “अखण्ड और विकसित भारत” का स्वप्न तभी साकार होगा जब हम सामाजिक समरसता को राष्ट्र-निर्माण की केन्द्रीय धुरी मानें। डॉ. आंबेडकर ने जिस सामाजिक लोकतंत्र की परिकल्पना की और आरएसएस जिस सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की बात करता है, उनके बीच संवाद और समन्वय की संभावनाएँ हैं। दोनों का साझा आधार राष्ट्र की एकता, समाज का नैतिक उत्थान और व्यक्ति की गरिमा की रक्षा है। आवश्यकता इस बात की है कि वैचारिक मतभेदों के बावजूद साझा लक्ष्यों को पहचाना जाए और सामाजिक समरसता को व्यवहार में उतारा जाए। जब समानता, बंधुता और संगठन—ये तीनों तत्व एक साथ आगे बढ़ेंगे, तभी भारत वास्तविक अर्थों में अखण्ड और विकसित राष्ट्र बन सकेगा।

डॉ प्रमोद कुमार
डिप्टी नोडल अधिकारी, MyGov
डॉ भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय आगरा

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✍️ संपादन: ठाकुर पवन सिंह
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