तीर कमान की जगह ड्रोन और मिसाइल आ गईं, लेकिन इंसान में छिपा शैतान नहीं बदला! पश्चिम एशिया युद्ध पर बृज खंडेलवाल का प्रखर आलेख

आर्टिकल Desk | tajnews.in | Tuesday, April 07, 2026, 11:45:00 AM IST

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Brij Khandelwal Writer
बृज खंडेलवाल
वरिष्ठ पत्रकार एवं पर्यावरणविद्
वरिष्ठ पत्रकार बृज खंडेलवाल ने अपने इस बेहद मारक आलेख में पश्चिम एशिया के भयंकर युद्ध और दुनिया की खतरनाक खामोशी पर गहरा प्रहार किया है। दरअसल, उन्होंने बताया है कि कैसे आज ड्रोन और मिसाइलों के इस आधुनिक दौर में भी इंसान के भीतर बैठा आदिम शैतान बिल्कुल नहीं बदला है। इसके अलावा, उन्होंने पर्यावरणविदों और शांति के ठेकेदारों की चुप्पी पर भी बहुत सटीक सवाल उठाए हैं। इसलिए, पढ़िए इंसानियत को झकझोरने वाला यह विचारोत्तेजक आलेख:

मुख्य बिंदु

  • पश्चिम एशिया के सुलगते आसमान में मिसाइलों और ड्रोन ने दुनिया को तीसरे विश्व युद्ध और परमाणु कयामत के बिल्कुल करीब ला दिया है।
  • हालाँकि, हथियारों का रूप पूरी तरह बदल गया है, लेकिन सत्ता के अहंकार में इंसान के भीतर छिपा खूंखार शिकारी आज भी ज़िंदा है।
  • दुनिया भर में ‘पर्यावरण’ और ‘शांति’ का नारा बुलंद करने वाले सभी कथित सिपाही इस भयंकर विनाश पर पूरी तरह खामोश बैठे हैं।
  • इसलिए, यदि दुनिया ने समय रहते इस पागलपन को तुरंत नहीं रोका, तो शायद अगला युद्ध पूरी इंसानियत का आखिरी युद्ध होगा।

“जब तोपें गरजती हैं, तो इंसानियत खामोश हो जाती है…”

पश्चिम एशिया का आसमान इन दिनों सिर्फ धुएँ से नहीं, एक खौफनाक सन्नाटे से भी ढका है। मिसाइलों की लकीरें रात को चीरती हैं, ड्रोन मौत का पैगाम बनकर मंडरा रहे हैं, और हर विस्फोट के साथ ऐसा लगता है जैसे दुनिया एक कदम और कयामत के करीब पहुँच रही हो। हवा में बारूद ही नहीं, रेडियोएक्टिव डर भी तैर रहा है। कहीं कोई लाल बटन दबा, और पूरी इंसानियत एक न्यूक्लियर ब्लैकआउट में डूब सकती है。

यह कोई फिल्मी सीन नहीं। यह हमारे समय का स्याह सच है。

शहर राख हो रहे हैं। बच्चे मलबे में खेलना सीख रहे हैं। अस्पतालों में दवाइयाँ कम और चीखें ज़्यादा हैं। और इस सबके बीच, दुनिया के ठेकेदार सभ्यता, लोकतंत्र और धर्म के नाम पर अपनी-अपनी बाज़ियाँ खेल रहे हैं。

इतिहास गवाह है, जंग कभी हल नहीं लाती। यह सिर्फ जख्म देती है। पुराने जख्मों पर नए जख्म। नफरत की ऐसी फसल, जिसकी कटाई पीढ़ियाँ करती हैं。

ट्रॉय के मैदान से लेकर आज के गाज़ा और कीव तक, कहानी वही है। कभी एक औरत के लिए, कभी मजहब के लिए, कभी जमीन के टुकड़े के लिए। पर असल में, यह हमेशा सत्ता के अहंकार का खेल रहा है। राजा बदल गए, पोशाक बदल गई, लेकिन इंसान के भीतर बैठा आदिम शिकारी आज भी जिंदा है。

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दो विश्व युद्धों ने दुनिया को झकझोर दिया था। करोड़ों लोग मारे गए। शहर खाक में मिल गए। हिरोशिमा और नागासाकी आज भी उस पागलपन की गवाही देते हैं, जब इंसान ने खुद पर ही परमाणु कहर बरपा दिया। तब कहा गया था, अब कभी नहीं。

लेकिन “अब कभी नहीं” का वादा आज फिर धुएँ में उड़ता दिख रहा है。

पश्चिम एशिया आज एक ज्वालामुखी है। जरा सी चिंगारी, और पूरी दुनिया उसकी आग में झुलस सकती है। तेल के कुएँ जलेंगे, समुद्र जहरीले होंगे, आसमान राख से भर जाएगा। जलवायु संकट, जो पहले ही सिर पर मंडरा रहा है, युद्ध की इस आग में और भयानक हो जाएगा。

और यहीं सबसे बड़ा सवाल उठता है。

कहाँ हैं वे एंटी-वार क्रूसेडर?
कहाँ हैं वे शांति के परिंदे, जो कभी सड़कों पर उतर आते थे?
कहाँ हैं ग्रीन ब्रिगेड, जो पेड़ों के लिए, नदियों के लिए, धरती के लिए छाती ठोककर खड़े हो जाते थे?

आज जब पूरी धरती बारूद के ढेर पर बैठी है, जब हर बम के साथ हवा और पानी जहर बन रहे हैं, तब उनकी खामोशी चुभती है。

क्या पर्यावरण सिर्फ पेड़ लगाने तक सीमित है?
क्या युद्ध से उठता धुआँ, जलते तेल कुएँ, बिखरते केमिकल, ये सब प्रकृति का हिस्सा नहीं?
यह कैसी चयनात्मक संवेदनशीलता है?

सच यह है कि युद्ध सिर्फ इंसानों को नहीं मारता। यह नदियों को मारता है, जंगलों को मारता है, हवा को मारता है। यह आने वाली नस्लों के भविष्य को जला देता है। वियतनाम में एजेंट ऑरेंज के जहर ने पीढ़ियों को अपाहिज बना दिया। आज भी उसकी गूंज सुनाई देती है。

फिर भी, दुनिया खामोश है。

संयुक्त राष्ट्र एक बेबस तमाशबीन की तरह खड़ा है। बयान आते हैं, अपीलें होती हैं, लेकिन बम गिरना बंद नहीं होते। ताकतवर देश अपनी-अपनी चालें चल रहे हैं। छोटे देश मोहरे बनते जा रहे हैं。

और इस पूरे खेल में, सबसे सस्ती चीज क्या है?
इंसानी जान。

प्राचीन ग्रंथों ने हजारों साल पहले चेतावनी दी थी। “वसुधैव कुटुंबकम”; पूरी दुनिया एक परिवार है। बुद्ध ने कहा, “घृणा से घृणा खत्म नहीं होती।” महावीर ने अहिंसा को धर्म का शिखर बताया। यीशु ने दुश्मनों से प्रेम करने की बात कही。

लेकिन हमने क्या सीखा?

हमने धर्म को तलवार बना लिया। विचारधारा को बंदूक बना लिया। विज्ञान को विनाश का औजार बना लिया。

भारत की धरती ने एक अलग रास्ता दिखाया था। कलिंग के युद्ध के बाद अशोक ने हिंसा त्याग दी थी। महाभारत के विजेता भी अंत में वैराग्य की ओर मुड़ गए थे। यह हार नहीं थी। यह समझ थी。

आज दुनिया को फिर उसी समझ की जरूरत है。

क्योंकि अगर यह पागलपन नहीं रुका, तो अगला युद्ध शायद आखिरी होगा。

न कोई विजेता होगा, न कोई पराजित。
सिर्फ राख होगी। सन्नाटा होगा。
और शायद इतिहास लिखने वाला भी कोई नहीं बचेगा。

महात्मा गांधी ने कहा था, “शांति का कोई रास्ता नहीं, शांति ही रास्ता है।” मार्टिन लूथर किंग जूनियर ने कहा, “न्याय के बिना शांति अधूरी है।”

ये सिर्फ कोट्स नहीं हैं। ये इंसानियत के आखिरी सहारे हैं。

अब फैसला हमें करना है。
हम विकसित इंसान बनेंगे या आधुनिक हथियारों से लैस आदिम जीव?
क्योंकि वक्त बहुत कम है。
और कयामत… शायद अब दूर नहीं。

Pawan Singh

Pawan Singh

Chief Editor, Taj News
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