आगरा डेस्क, Taj News | Published by: ठाकुर पवन सिंह | Updated: Thursday, 15 January 2026 09:30 AM IST
कानूनी मामलों के विश्लेषक बृज खंडेलवाल लिखते हैं कि धारा 498ए, जो कभी दहेज उत्पीड़न से महिलाओं की रक्षा के लिए बनाई गई थी, आज कई मामलों में वैवाहिक नाराज़गी और टूटते रिश्तों का प्रतिशोधात्मक औज़ार बनती जा रही है। हालिया कर्नाटक हाईकोर्ट का फैसला इस बढ़ते दुरुपयोग पर न्यायपालिका की स्पष्ट चेतावनी है।
धारा 498ए का दुरुपयोग: छोटे झगड़ों को अपराध बनाने की बढ़ती प्रवृत्ति
धारा 498ए: वैवाहिक कलह का हथियार बनता कानून
बृज खंडेलवाल
8 जनवरी 2026 को कर्नाटक हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में अबूजर अहमद और अन्य बनाम कर्नाटक राज्य मामले की एफआईआर रद्द कर दी। पति और उसके परिवार के खिलाफ दर्ज धारा 498ए की यह शिकायत छोटे-मोटे वैवाहिक झगड़ों पर आधारित थी। अदालत ने साफ कहा कि यह कानून अब न्याय के बजाय प्रतिशोध का माध्यम बन रहा है।
यह मामला किसी गंभीर हिंसा का नहीं था। पत्नी ने शिकायत में खाने-पीने की पसंद, कपड़ों, टीवी देखने और आपसी नाराजगी जैसे सामान्य मुद्दों का जिक्र किया। वह अमेरिका से भारत लौटने के बाद केस दर्ज कराया। जस्टिस एम. नागप्रसन्ना ने टिप्पणी की कि धारा 498ए हर वैवाहिक समस्या की दवा नहीं है। यह केवल उन मामलों के लिए है जहां पत्नी की जान, स्वास्थ्य या मानसिक स्थिति को गंभीर खतरा हो, खासकर दहेज से जुड़ी क्रूरता में।
अदालत ने सीआरपीसी की धारा 482 के तहत पूरा केस खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि ससुराल वालों को बिना सोचे फंसाना गलत है, विशेषकर जब दंपति विदेश में रहते हों और परिवार भारत में। ऐसे केस हिरासत, बदनामी, मानसिक यंत्रणा और अदालतों पर अनावश्यक बोझ बन जाते हैं।
1983 में आईपीसी में जोड़ी गई धारा 498ए का उद्देश्य महिलाओं को दहेज उत्पीड़न से बचाना था। लेकिन आज यह टूटे रिश्तों में बदला लेने का औजार बन गई है। एनसीआरबी के आंकड़ों के अनुसार, हर साल 1.4 लाख से अधिक नए केस दर्ज होते हैं। इनमें 96 प्रतिशत से ज्यादा लंबित रहते हैं। सजा सिर्फ 12-17 प्रतिशत मामलों में होती है, जबकि 76 प्रतिशत में आरोपी बरी हो जाते हैं।

यह साफ दर्शाता है कि कई आरोप बेबुनियाद या बढ़ा-चढ़ाकर लगाए जाते हैं। खामियाजा सिर्फ आरोपी ही नहीं भुगतते, बल्कि बुजुर्ग माता-पिता, भाई-बहन और पूरा परिवार सालों तक त्रस्त रहता है, धन, सम्मान और शांति सब गंवाकर।
सुप्रीम कोर्ट ने 2005 के सुशील कुमार शर्मा बनाम भारत संघ मामले में इसे “कानूनी आतंकवाद” करार दिया। 2014 के अर्नेश कुमार बनाम बिहार राज्य फैसले में निर्देश दिया कि गिरफ्तारी सोच-समझकर हो, पहले जांच हो और मजिस्ट्रेट की निगरानी रहे, ताकि निर्दोषों की जिंदगी न बर्बाद हो। हाल ही 2026 में एक पुराने मामले का निपटारा करते हुए कोर्ट ने तलाक के दौरान दर्ज अस्पष्ट और सामान्य एफआईआर पर नाराजगी जताई।
आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने झूठे 498ए केस को मानसिक क्रूरता माना, जो तलाक का आधार बन सकता है। तेलंगाना में 50 हजार से ज्यादा केस लंबित हैं; सुप्रीम कोर्ट ने दारा लक्ष्मी नारायण मामले में बिना सबूत वाली एफआईआर की निंदा की। दिल्ली हाईकोर्ट ने भाभी जैसे रिश्तेदारों पर झूठे आरोपों को दुरुपयोग बताया। बॉम्बे हाईकोर्ट ने दो दिनों के सहवास पर दर्ज केस और पुलिस के “कॉपी-पेस्ट” बयानों पर तंज कसा। राजस्थान व हरियाणा हाईकोर्ट ने भी घरेलू छोटे मसलों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने पर फटकार लगाई।
अक्सर शादी टूटने पर हर रिश्तेदार का नाम जोड़ दिया जाता है, ताकि गुजारा भत्ता या कस्टडी में दबाव बने। सबूत की शुरुआती जरूरत न होने से यह आसानी से हथियार बन जाता है। नतीजा: सच्ची पीड़िताओं को न्याय में देरी, न्याय व्यवस्था पर बोझ और उसकी साख पर चोट।
इसके समाधान के लिए:
- एफआईआर से पहले मध्यस्थता और काउंसलिंग अनिवार्य हो।
- झूठे आरोपों पर सख्त सजा का प्रावधान।
- न्यूनतम ठोस सबूतों की शर्त लगे।
धारा 498ए आज भी प्रासंगिक है, क्योंकि दहेज हत्या और घरेलू हिंसा कड़वी हकीकत हैं। मुद्दा कानून का नहीं, उसके दुरुपयोग का है। कर्नाटक हाईकोर्ट का फैसला स्पष्ट करता है कि रोजमर्रा की नोकझोंक या रिश्तों की थकान अपराध नहीं। कानून ढाल बने, तलवार नहीं।
2026 के बदलते कानूनी परिदृश्य में अदालतें बार-बार याद दिला रही हैं कि न्याय बदले का साधन नहीं। अबूजर अहमद मामला चेतावनी है, दुरुपयोग रुका नहीं, तो निर्दोष त्रस्त होंगे और न्याय पर भरोसा कमजोर पड़ेगा। असली सुधार तब होगा, जब पीड़ित और प्रतिशोध में फर्क सीखा जाएगा, और झगड़े अदालत नहीं, संवाद से सुलझेंगे।
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