"Sanchaar Saathi App controversy news image"

Tuesday, 02 December 2025, 2:46:03 PM. New Delhi, India

केंद्र सरकार द्वारा नए मोबाइल फ़ोनों में “संचार साथी” ऐप को प्री-इंस्टॉल करने के निर्देश के बाद शुरू हुए भारी राजनीतिक विवाद के बीच, केंद्रीय संचार मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने आज बड़ा बयान देते हुए स्पष्ट किया कि यह ऐप अनिवार्य नहीं है और उपयोगकर्ता चाहें तो इसे अपने मोबाइल से हटा सकते हैं
विपक्ष ने इसे “सरकारी जासूसी” का प्रयास बताते हुए संसद से लेकर सोशल मीडिया तक कड़ा विरोध दर्ज कराया था।

नीचे पढ़िए — विवाद की पूरी टाइमलाइन, दोनों पक्षों के तर्क, और सरकार ने आखिर क्यों जारी किया था यह आदेश।

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सिंधिया का बयान: “ऐप रखना या न रखना — पूरी तरह यूज़र की मर्ज़ी”

संसद परिसर के बाहर मीडिया से बात करते हुए केंद्रीय मंत्री ने कहा:

“अगर आप संचार साथी ऐप नहीं रखना चाहते, तो आप इसे डिलीट कर सकते हैं। यह अनिवार्य नहीं है। हमारा कर्तव्य है कि हम इसे उपलब्ध कराएँ, लेकिन इसे रखना या नहीं रखना—यही यूज़र तय करेगा।”

यह बयान सरकार द्वारा जारी उस अधिसूचना के ठीक बाद आया है जिसमें मोबाइल निर्माताओं व इंपोर्टर्स को निर्देश दिया गया था कि अगले 90 दिनों में बनने या आयात होने वाले सभी नए मोबाइल हैंडसेट में संचार साथी ऐप प्री-इंस्टॉल होना चाहिए।


सरकारी निर्देश क्या था — और विवाद क्यों भड़का?

28 नवंबर 2025 को दूरसंचार विभाग (DoT) ने आदेश जारी किया था कि:

  • भारत में बनने/आयात होने वाले मोबाइल हैंडसेट में
  • 90 दिनों बाद से
  • “संचार साथी ऐप प्री-इंस्टॉल” होना अनिवार्य होगा।

सरकार की दलील थी कि इससे नकली और क्लोन IMEI नंबरों पर रोक लगेगी, और चोरी के मोबाइल फ़ोनों को ट्रैक करना आसान होगा।

यहीं से विपक्ष ने सवाल उठाया कि केंद्र “सर्विलांस सिस्टम” लागू कर रहा है।


सुरक्षा एजेंसियों का तर्क: “राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए आवश्यक”

सरकारी अधिकारियों का कहना था कि:

  • सेकेंड-हैंड मोबाइल बाज़ार तेज़ी से बढ़ा है
  • चोरी/क्लोन IMEI वाले फ़ोन आसानी से बिक रहे हैं
  • ऐसे फ़ोन कई लोकेशन पर एक साथ दिखते हैं
  • इससे आतंकवादियों और साइबर अपराधियों को ट्रैक करना मुश्किल हो जाता है
  • बेख़बर खरीदार भी कानूनी मुसीबत में फँस जाते हैं

“संचार साथी” ऐप IMEI वेरिफिकेशन, चोरी फ़ोन ब्लॉकिंग और साइबर दुरुपयोग रोकने में मदद करता है।

सरकार कहती है—
“यह ऐप राष्ट्रीय सुरक्षा का साधन है, जासूसी का नहीं।”


विपक्ष का आरोप: “जासूसी ऐप”, “तानाशाही की ओर कदम”

शिवसेना (UBT) सांसद प्रियंका चतुर्वेदी ने इसे “Big Boss Surveillance” जैसा बताया और कहा:

  • सरकार लोगों के निजी फोनों में सेंध लगाने की कोशिश कर रही है
  • यह निजता के अधिकार का उल्लंघन है
  • जनता ऐसे कदमों का विरोध करेगी

कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाद्रा ने कहा:

“यह एक जासूसी ऐप है। सरकार चाहती है कि देश तानाशाही की ओर बढ़े। नागरिकों को निजता का अधिकार है। सरकार को यह दिखावा बंद करना चाहिए कि यह सुरक्षा के नाम पर हो रहा है।”

प्रियंका गांधी ने यह भी आरोप लगाया कि सरकार संसद में चर्चा से भाग रही है।


क्या यह ऐप सच में जासूसी कर सकता है? — टेक विशेषज्ञों की राय

साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों के अनुसार:

  • ऐप में चोरी/क्लोन मोबाइल की रिपोर्टिंग और IMEI चेक जैसी सुविधाएँ हैं
  • ऐप मोबाइल डेटा या चैट पढ़ने की अनुमति नहीं मांगता
  • कोई “स्पाईवेयर-स्ट्रक्चर” नहीं दिखता
  • विवाद प्री-इंस्टॉल किए जाने पर अधिक है, उसके फीचर्स पर नहीं

हालाँकि विशेषज्ञ मानते हैं कि सरकार को ऐप का ओपन-सोर्स ऑडिट करवाकर सार्वजनिक करना चाहिए ताकि संदेह पूरी तरह खत्म हो।


यूज़र्स क्या करें? — अंतिम निर्णय सिंधिया के बयान के बाद

अब स्थिति स्पष्ट है—

  • ऐप इंस्टॉल रहेगा, लेकिन डिलीट किया जा सकता है
  • कोई अनिवार्यता नहीं
  • यूज़र उसकी सुविधाएँ इस्तेमाल करे या हटाए — यह उसकी पसंद है

सरकार ऐप को सुरक्षा उपाय मानती है, जबकि विपक्ष इसे निगरानी का खतरा बता रहा है।

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✍️ संपादन: ठाकुर पवन सिंह

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