अमरावती में जजों और कोर्ट कर्मचारियों के घर सनसनीखेज चोरी, बॉम्बे हाईकोर्ट ने लिया स्वतः संज्ञान, पुलिस महकमे में भारी हड़कंप

Maharashtra Desk, tajnews.in | Wednesday, April 08, 2026, 12:45:30 PM IST

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अमरावती: एक सभ्य और सुरक्षित समाज की सबसे बड़ी पहचान यह होती है कि वहां कानून का राज हो और न्याय की कुर्सी पर बैठने वाले लोग खुद को पूरी तरह महफूज महसूस करें। लेकिन महाराष्ट्र के अमरावती शहर से एक ऐसी दुस्साहसिक और चौंकाने वाली वारदात सामने आई है, जिसने पूरे पुलिस महकमे और कानून व्यवस्था की धज्जियां उड़ा कर रख दी हैं। शहर के अति-सुरक्षित माने जाने वाले इलाकों में अज्ञात चोरों ने एक या दो नहीं, बल्कि एक साथ पांच जजों और चार कोर्ट कर्मचारियों के घरों को अपना निशाना बनाया। 15 फरवरी को अंजाम दी गई इस दुस्साहसिक वारदात ने स्थानीय प्रशासन की गहरी नींद को झकझोर दिया था, लेकिन मामले ने असल तूल तब पकड़ा जब बॉम्बे हाईकोर्ट ने इस घटना की गंभीरता को देखते हुए 7 अप्रैल को खुद ही इसका स्वतः संज्ञान (Suo Motu Cognizance) ले लिया। न्यायपालिका की सुरक्षा में हुई इस भारी सेंधमारी ने पुलिस की कार्यप्रणाली पर कई गंभीर और तीखे सवाल खड़े कर दिए हैं।

HIGHLIGHTS
  1. अमरावती में बड़ी सेंधमारी: 15 फरवरी को पांच जजों और चार कोर्ट कर्मचारियों के घरों में एक साथ हुई चोरी से मचा हड़कंप।
  2. हाईकोर्ट का स्वतः संज्ञान: बॉम्बे हाईकोर्ट ने घटना को बेहद गंभीर मानते हुए मामले का खुद संज्ञान लिया और पुलिस को फटकार लगाई।
  3. एमिकस क्यूरी की नियुक्ति: अदालत ने इस संवेदनशील मामले की गहन निगरानी और सहायता के लिए एक एमिकस क्यूरी नियुक्त किया है।
  4. सीसीटीवी में दिखे संदिग्ध: पुलिस की जांच तेज हो गई है, सीसीटीवी फुटेज में कुछ संदिग्ध चेहरे कैद हुए हैं जिनकी तलाश जारी है।

कानून के रखवालों के घरों में ही सेंधमारी: अपराधियों के बुलंद हौसले की खौफनाक तस्वीर

अमरावती शहर में 15 फरवरी की वह मनहूस रात पुलिस गश्त और सुरक्षा व्यवस्था की तमाम खोखली दावों की असलियत बयान कर रही है। जब पूरा शहर गहरी नींद में सो रहा था, तब अपराधियों का एक बेहद शातिर गिरोह जजों की आवासीय कॉलोनी और कोर्ट कर्मचारियों के घरों की रेकी कर रहा था। यह कोई साधारण चोरी नहीं थी। चोरों ने जिस सटीकता और बेखौफ अंदाज में पांच अलग-अलग न्यायिक अधिकारियों (जजों) और चार कोर्ट कर्मचारियों के घरों के ताले चटकाए, वह दर्शाता है कि उन्हें पुलिस का जरा भी खौफ नहीं था। ये वो लोग हैं जो दिन भर अदालत के कमरों में बैठकर बड़े-बड़े अपराधियों के भविष्य का फैसला करते हैं, लेकिन रात के अंधेरे में वे खुद ही अपराध का शिकार हो गए।

चोरों ने घरों के मुख्य दरवाजों के ताले तोड़े, अलमारियों को खंगाला और कीमती सामान, नकदी तथा गहने लेकर आसानी से फरार हो गए। सुबह जब इस वारदात का खुलासा हुआ, तो पूरे पुलिस विभाग में जैसे भूकंप आ गया। जिले के आला अधिकारी मौके की तरफ दौड़ पड़े। फिंगरप्रिंट एक्सपर्ट्स और डॉग स्क्वायड को तुरंत बुलाया गया, लेकिन तब तक अपराधी अपने काम को अंजाम देकर बहुत दूर निकल चुके थे। इस घटना ने अमरावती के आम नागरिकों के बीच एक गहरा खौफ पैदा कर दिया। शहर के चौराहों और नुक्कड़ों पर लोग यही चर्चा करते सुने गए कि जब इस शहर में न्यायधीशों के घर ही सुरक्षित नहीं हैं, तो एक आम आदमी अपनी जान-माल की सुरक्षा की उम्मीद पुलिस से कैसे कर सकता है?

बॉम्बे हाईकोर्ट का सख्त रुख: घटना को बताया ‘बेहद गंभीर’, लिया स्वतः संज्ञान

पुलिस भले ही इस मामले को शुरुआत में एक आम चोरी की घटना मानकर अपनी पारंपरिक और धीमी रफ्तार से जांच कर रही थी, लेकिन बॉम्बे हाईकोर्ट की नजर से यह दुस्साहस छिप नहीं सका। 7 अप्रैल को जब यह मामला न्यायमूर्तियों के संज्ञान में आया, तो उन्होंने इस पर बेहद सख्त और कड़ा रुख अख्तियार किया। अदालत ने इसे एक आम चोरी की वारदात मानने से साफ इनकार करते हुए इसे सीधे तौर पर ‘न्यायपालिका की सुरक्षा में हुई एक बहुत बड़ी चूक’ और ‘बेहद गंभीर मामला’ करार दिया। हाईकोर्ट के इस सख्त रवैये ने महाराष्ट्र पुलिस के आलाकमान की नींद उड़ा दी है।

स्वतः संज्ञान (Suo Motu Cognizance) लेना किसी भी अदालत के पास मौजूद एक ऐसा ब्रह्मास्त्र है जिसका इस्तेमाल वो तब करती है जब मामला सीधे तौर पर जनहित, व्यवस्था की बड़ी नाकामी या न्यायपालिका की गरिमा से जुड़ा हो। अदालत ने स्पष्ट रूप से महसूस किया कि अगर जजों के आवासीय परिसरों में इस तरह से अपराधी घुसपैठ कर सकते हैं, तो यह सीधे तौर पर उनकी स्वतंत्रता और निडर होकर काम करने की क्षमता को प्रभावित कर सकता है। मामले की गंभीरता को देखते हुए, अदालत ने एक वरिष्ठ अधिवक्ता को एमिकस क्यूरी (न्याय मित्र) के रूप में नियुक्त कर दिया है। एमिकस क्यूरी का काम अदालत को इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की प्रगति, सुरक्षा खामियों और पुलिस द्वारा उठाए जा रहे कदमों के बारे में सटीक कानूनी जानकारी और सहायता प्रदान करना होगा।

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सीसीटीवी फुटेज में कैद हुए संदिग्ध चेहरे, पुलिस की कई टीमें गठित

बॉम्बे हाईकोर्ट की फटकार और स्वतः संज्ञान के बाद अमरावती पुलिस की जांच में अचानक गजब की तेजी आ गई है। जिन फाइलों पर धूल जमने की आशंका थी, वे अब दिन-रात खंगाली जा रही हैं। पुलिस जांच दल ने इलाके के दर्जनों सीसीटीवी कैमरों की फुटेज को बारीकी से खंगाला है। सूत्रों के मुताबिक, पुलिस को कुछ महत्वपूर्ण सुराग हाथ लगे हैं। सीसीटीवी कैमरों में रात के अंधेरे में कुछ संदिग्ध व्यक्तियों की गतिविधियां कैद हुई हैं। इन संदिग्धों के चेहरे की पहचान करने के लिए पुलिस साइबर सेल और मुखबिरों के नेटवर्क का भरपूर सहारा ले रही है।

पुलिस को शक है कि यह वारदात किसी स्थानीय नवसिखिया चोर की नहीं है, बल्कि यह किसी अंतरराज्यीय या पेशेवर बावरिया गैंग का काम हो सकता है, जो वारदात को अंजाम देने से पहले इलाके की पूरी और सटीक रेकी करते हैं। अमरावती पुलिस कमिश्नरेट ने इस हाई-प्रोफाइल मामले को सुलझाने के लिए क्राइम ब्रांच की कई विशेष टीमें गठित कर दी हैं। ये टीमें आसपास के जिलों और राज्यों में संदिग्धों की धरपकड़ के लिए लगातार दबिश दे रही हैं। पुलिस कमिश्नर ने सख्त निर्देश जारी किए हैं कि मामले को जल्द से जल्द सुलझाया जाए ताकि न्यायपालिका के साथ-साथ आम जनता में पुलिस के प्रति विश्वास को दोबारा बहाल किया जा सके। अदालत में पुलिस को जल्द ही अपनी जांच की विस्तृत प्रगति रिपोर्ट भी सौंपनी होगी।

सुरक्षा व्यवस्था पर उठते सवाल: क्या वीआईपी इलाके भी अब महफूज नहीं?

इस घटना ने शहरों के वीआईपी और अति-सुरक्षित माने जाने वाले इलाकों की सुरक्षा व्यवस्था की कलई पूरी तरह से खोल कर रख दी है। अमूमन जजों, बड़े नौकरशाहों और पुलिस अधिकारियों की आवासीय कॉलोनियों में सुरक्षा के कड़े इंतजाम होते हैं। वहां गश्त भी अधिक होती है और बाहरी लोगों का प्रवेश भी वर्जित होता है। इसके बावजूद, एक ही रात में नौ अलग-अलग घरों के ताले टूट जाना पुलिस गश्त (Night Patrolling) की घोर नाकामी को दर्शाता है। अगर अपराधी इतनी आसानी से इन सुरक्षित किलों में सेंध लगा सकते हैं, तो यह पुलिस के इंटेलिजेंस नेटवर्क की भी बहुत बड़ी विफलता है।

स्थानीय वकीलों और बार एसोसिएशन ने भी इस घटना पर गहरा रोष व्यक्त किया है। उनका स्पष्ट मानना है कि यह केवल एक चोरी का मामला नहीं है, बल्कि यह न्याय व्यवस्था को एक मनोवैज्ञानिक संदेश देने की कोशिश भी हो सकती है। अपराधियों का इस हद तक बेखौफ हो जाना समाज के लिए एक खतरे की घंटी है। हाईकोर्ट द्वारा मामले का संज्ञान लेना इस बात का प्रमाण है कि न्यायपालिका अपनी सुरक्षा को लेकर किसी भी तरह के समझौते के मूड में बिल्कुल नहीं है। अब पुलिस प्रशासन के सामने सबसे बड़ी चुनौती न सिर्फ इन चोरों को जल्द से जल्द सलाखों के पीछे पहुंचाना है, बल्कि शहर में सुरक्षा का एक ऐसा मजबूत ढांचा तैयार करना है ताकि भविष्य में कोई भी अपराधी ऐसी गुस्ताखी करने की जुर्रत न कर सके। आने वाली सुनवाई में हाईकोर्ट का रुख यह तय करेगा कि पुलिस महकमे के किन बड़े अधिकारियों पर इस लापरवाही की गाज गिर सकती है।

Thakur Pawan Singh Editor in Chief Taj News

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