⚖️जस्टिस सूर्यकांत 53वें CJI: निवर्तमान CJI गवई बोले- कोई सरकारी पद नहीं लूंगा

Mon, 24 Nov 2025 06:45 AM IST, आगरा, उत्तर प्रदेश, भारत।

देश की न्यायिक प्रणाली में आज एक महत्वपूर्ण बदलाव होने जा रहा है। जस्टिस सूर्यकांत 53वें CJI के रूप में शपथ लेंगे, जो जस्टिस बीआर गवई का स्थान लेंगे। जस्टिस सूर्यकांत का CJI के रूप में कार्यकाल लगभग 15 महीने का होगा और वे 9 फरवरी, 2027 को सेवानिवृत्त होंगे। वह अनुच्छेद 370 को हटाने, पेगासस स्पाइवेयर मामले और बिहार मतदाता सूची समीक्षा जैसे कई अहम और ऐतिहासिक फैसलों का हिस्सा रहे हैं। वहीं, अपने कार्यकाल के अंतिम दिन निवर्तमान CJI जस्टिस गवई ने न्यायपालिका और राष्ट्र से जुड़े कई ज्वलंत मुद्दों पर खुलकर बात की। उन्होंने सबसे प्रमुख रूप से घोषणा की कि वह सेवानिवृत्ति के बाद कोई सरकारी पद नहीं लेंगे, और कॉलेजियम प्रणाली का पुरजोर बचाव किया। यह विस्तृत 1250+ शब्दों का विश्लेषण जस्टिस सूर्यकांत 53वें CJI के प्रोफाइल, उनके सामने की चुनौतियों और निवर्तमान CJI गवई के महत्वपूर्ण बयानों पर प्रकाश डालता है।


👑 जस्टिस सूर्यकांत 53वें CJI: ऐतिहासिक फैसलों का हिस्सा

जस्टिस सूर्यकांत सोमवार को देश के सर्वोच्च न्यायिक पद यानी 53वें मुख्य न्यायाधीश (CJI) के रूप में शपथ लेंगे। उनका कार्यकाल 15 माह का होगा, जो न्यायपालिका के लिए एक महत्वपूर्ण अवधि मानी जा रही है। जस्टिस सूर्यकांत 53वें CJI के रूप में अपनी पिछली न्यायिक भूमिकाओं में कई बड़े और राष्ट्रीय महत्व के फैसलों में शामिल रहे हैं:

  1. अनुच्छेद 370: वह उस पीठ का हिस्सा थे जिसने जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा समाप्त करने वाले अनुच्छेद 370 को हटाने के केंद्र सरकार के फैसले को बरकरार रखा।
  2. पेगासस स्पाइवेयर केस: उन्होंने इस संवेदनशील मामले की जांच में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
  3. बिहार मतदाता सूची समीक्षा: उन्होंने चुनाव संबंधी मामलों में भी अहम फैसले दिए हैं।

जस्टिस सूर्यकांत 53वें CJI के रूप में, उन्हें न्यायपालिका में लंबित मामलों की बढ़ती संख्या और तकनीकी एकीकरण जैसी बड़ी चुनौतियों का सामना करना होगा।

🎤 निवर्तमान CJI गवई: सेवानिवृत्ति के बाद कोई सरकारी पद नहीं

निवर्तमान CJI जस्टिस बीआर गवई ने अपने कार्यकाल के आखिरी दिन मीडिया से अनौपचारिक बातचीत के दौरान कई साहसिक बयान दिए। उनका सबसे महत्वपूर्ण और स्पष्ट बयान था कि वह सेवानिवृत्ति के बाद कोई भी सरकारी पद नहीं लेंगे। उन्होंने कहा:

“मैंने कार्यभार संभालने के साथ ही साफ कर दिया था कि मैं सेवानिवृत्ति के बाद कोई भी आधिकारिक काम नहीं लूंगा। अगले 9-10 दिनों के लिए आराम का वक्त, उसके बाद, एक नई पारी।”

यह बयान उन पूर्व न्यायाधीशों के लिए एक स्पष्ट संदेश है, जिन्होंने सेवानिवृत्ति के तुरंत बाद विभिन्न सरकारी या राजनीतिक पद स्वीकार किए हैं, जिससे न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर सवाल उठे हैं।

🛡️ कॉलेजियम प्रणाली का पुरजोर बचाव

जस्टिस गवई ने जजों की नियुक्ति के लिए इस्तेमाल की जाने वाली कॉलेजियम प्रणाली का पुरजोर बचाव किया। उन्होंने स्वीकार किया कि कोई भी व्यवस्था परिपूर्ण नहीं होती और यह आलोचना होती है कि न्यायाधीश स्वयं अपनी नियुक्ति करते हैं। लेकिन उन्होंने तर्क दिया कि:

“इससे न्यायपालिका की स्वतंत्रता सुनिश्चित होती है।”

उन्होंने यह भी बताया कि कॉलेजियम निर्णय लेते समय खुफिया ब्यूरो (IB) की रिपोर्ट और कार्यपालिका के विचारों पर भी गौर करता है, लेकिन अंतिम निर्णय कॉलेजियम का ही होता है।

👩‍⚖️ महिला जज की नियुक्ति और क्रीमी लेयर पर अफसोस

निवर्तमान CJI गवई ने अपने कार्यकाल के दौरान किसी महिला जज की नियुक्ति न कर पाने पर अफसोस जताया। इसके अलावा, उन्होंने आरक्षण से संबंधित एक महत्वपूर्ण सामाजिक-कानूनी मुद्दे पर अपनी राय व्यक्त की:

  • SC आरक्षण में क्रीमी लेयर: उन्होंने अनुसूचित जाति (SC) के लिए आरक्षण में भी क्रीमी लेयर की व्यवस्था लागू करने की जरूरत पर बल दिया।
  • तर्क: उन्होंने कहा कि इसके बिना आरक्षण का फायदा पीढ़ियों तक कुछ ही परिवारों को मिलता रहेगा, जिससे एक वर्ग के अंदर एक और वर्ग बन जाएगा। यह व्यवस्था उन लोगों तक आरक्षण का फायदा पहुंचाने में मदद करेगी, जिनको इसकी सबसे ज्यादा जरूरत है।
  • अंतिम फैसला: हालांकि, उन्होंने स्पष्ट किया कि इस मुद्दे पर आखिरी फैसला कार्यपालिका और संसद को लेना है।

🏛️ राज्यपाल की शक्ति और सोशल मीडिया की समस्या

जस्टिस गवई ने न्यायपालिका से जुड़े अन्य अहम विषयों पर भी बात की:

  • राज्यपाल द्वारा बिल रोकना: राष्ट्रपति संदर्भ पर हाल ही में दिए गए फैसले का हवाला देते हुए, उन्होंने कहा कि न्यायालय राज्यपालों के लिए समय सीमा तय नहीं कर सकता, लेकिन फैसले में इस बात पर जोर दिया गया है कि राज्यपाल विधेयकों को अनिश्चितकाल तक रोककर नहीं रख सकते।
  • सोशल मीडिया की समस्या: उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया आजकल एक बड़ी समस्या बन गया है, क्योंकि हम जो नहीं बोलते हैं, वह भी लिखा और दिखाया जाता है। यह केवल न्यायपालिका ही नहीं, बल्कि सरकार के बाकी अंगों को भी प्रभावित करता है।
  • जूता फेंकने की घटना: उन्होंने इस घटना पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उन्होंने वकील को माफ करने का फैसला अपनी बचपन की सोच के कारण लिया और उन्हें लगा कि मामले को नजरअंदाज कर देना सही होगा।

जस्टिस सूर्यकांत 53वें CJI के रूप में अब जस्टिस गवई के इन बयानों के संदर्भ में न्यायपालिका की स्वतंत्रता और संरचनात्मक सुधारों की जिम्मेदारी संभालेंगे।

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संपादन: ठाकुर पवन सिंह I ताज न्यूज – आईना सच का

pawansingh@tajnews.in


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