
City Desk, Taj News | Published by: ठाकुर पवन सिंह | Updated: Sat, 07 Feb 2026 01:35 AM IST
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने एक तलाक केस में फैमिली कोर्ट द्वारा नाबालिग बच्ची का डीएनए टेस्ट करवाने के आदेश को सही ठहराते हुए स्पष्ट किया कि यह टेस्ट बच्चे की वैधता पर सवाल उठाने के लिए नहीं, बल्कि पत्नी पर लगाए गए व्यभिचार के आरोपों की जांच के लिए आवश्यक है। कोर्ट ने कहा कि इसका उद्देश्य बच्चे को अवैध घोषित करना नहीं है, बल्कि विवादित समय में पत्नी के आचरण की सच्चाई सामने लाना है। पत्नी की ओर से दायर याचिका को कोर्ट ने खारिज करते हुए कहा कि यदि वह डीएनए नमूना देने से इनकार करती है, तो कानून के तहत उसके विरुद्ध प्रतिकूल अनुमान लगाए जा सकते हैं। कोर्ट ने यह भी माना कि पति द्वारा पुख्ता तथ्य और परिस्थितियाँ प्रस्तुत की गई थीं, जिनकी जांच डीएनए से ही संभव है।

पत्नी डीएनए नमूना देने से इनकार करेगी तो क्या होगा?
कोर्ट ने कहा कि यदि पत्नी डीएनए सैंपल देने से मना करती है, तो संबंधों व परिस्थितियों के आधार पर अदालत उसके विरुद्ध अनुमान लगा सकती है। यह अनुमान इस बात पर आधारित होगा कि पति जिस कथन को सत्य बता रहा है, उसे पत्नी के इनकार ने और मजबूत कर दिया। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि डीएनए टेस्ट बच्चे को ‘नाजायज’ साबित करने के उद्देश्य से नहीं, बल्कि विवादित समय में पत्नी के संबंधों की जांच के लिए है।
चार दिन बाद ही पत्नी गर्भवती होने का दावा
पति का कहना है कि वह भारतीय सेना में तैनात है और लंबे अंतराल में ही घर आ पाता है। उसका आरोप है कि पत्नी ने उसे अक्टूबर 2015 में घर बुलाया और सिर्फ चार दिन बाद ही प्रेग्नेंसी का दावा कर दिया, जबकि इतनी जल्दी गर्भधारण का पता चल पाना मेडिकल रूप से संभव नहीं। पति के अनुसार बच्चा भी ऐसे समय पैदा हुआ जब वह घर पर मौजूद नहीं था, इसलिए उसने पितृत्व साबित कराने के लिए नहीं, बल्कि पत्नी के संभावित संबंधों की जांच के लिए डीएनए टेस्ट की मांग की।
इससे पहले दो बार कोर्ट जा चुके दंपत्ति
यह दंपत्ति पहले भी दो बार तलाक की कार्यवाही करा चुका है। पहली याचिका 2019 में आपसी सहमति से दायर हुई थी लेकिन बाद में वापस ले ली गई। दूसरी याचिका भी उसी वर्ष दायर हुई, पर पत्नी दूसरी मोशन में उपस्थित नहीं हुई, जिससे केस बंद हो गया। मौजूदा तीसरी याचिका 2021 में दाखिल की गई, जिसमें पत्नी पर धोखेबाज़ी का आरोप लगाया गया है। इसी याचिका में फैमिली कोर्ट ने डीएनए टेस्ट का आदेश दिया था।
पत्नी और पति पक्ष के तर्क
पत्नी के वकील का कहना था कि डीएनए टेस्ट बच्चे की निजता, पहचान और वैधता को प्रभावित करेगा, जिसे अदालतों को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी चाहिए। उनका तर्क था कि विवाह के दौरान जन्मे बच्चे की वैधता पर अनावश्यक संदेह नहीं पैदा किया जा सकता। दूसरी ओर पति के वकील ने कहा कि यह याचिका सिर्फ कार्यवाही में देरी और महत्वपूर्ण तथ्यों को छिपाने के लिए दायर की गई है। पति के वकील के मुताबिक गर्भधारण की अवधि और समय‑रेखा स्पष्ट तौर पर संदेह उत्पन्न करती है, इसलिए सच सामने लाने के लिए डीएनए टेस्ट ही उचित उपाय है।
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