Brij Khandelwal article on Indian education system failure, government schools vs private schools and NEP 2020

टूटते स्कूल, उड़ते सपने: 72 बोर्ड और असमानता के भंवर में फंसा भारत ‘विश्व गुरु’ कैसे बनेगा?

आर्टिकल

Edited by: Pawan Singh | tajnews.in | Agra | 17 Mar 2026, 11:45 am IST

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Taj News Education Desk

विशेष शैक्षिक आलेख

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Brij Khandelwal Writer

बृज खंडेलवाल

वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक

वरिष्ठ पत्रकार और लेखक बृज खंडेलवाल ने अपने इस बेहद मारक आलेख में भारत की चरमराती शिक्षा व्यवस्था का कड़वा सच सामने रखा है। उन्होंने बताया है कि कैसे 72 बोर्डों की अराजकता, जर्जर सरकारी स्कूलों और अमीर-गरीब की खाई के बीच ‘विश्व गुरु’ बनने का हमारा सपना महज़ एक खोखला दावा साबित हो रहा है। पढ़िए यह विस्तृत विश्लेषण:

मुख्य बिंदु

  • आज़ादी और नई शिक्षा नीति (NEP 2020) के 5 साल बाद भी प्राथमिक शिक्षा के आधुनिकीकरण में भारी विफलता।
  • देश में 72 शिक्षा बोर्डों की अराजकता; CBSE, ICSE और राज्य बोर्डों के बीच बंटा हुआ छात्रों का भविष्य।
  • ASER रिपोर्ट का कड़वा सच: बड़ी कक्षाओं के बच्चे भी बुनियादी पढ़ाई और साधारण गणित में पूरी तरह कमजोर।
  • सरकारी बनाम निजी स्कूलों की भयानक खाई: एक तरफ बिना छत के स्कूल, दूसरी तरफ कोडिंग सीखते अमीर बच्चे।

एक पल के लिए कल्पना कीजिए एक आम सरकारी स्कूल की कक्षा की। सामने लगा ब्लैकबोर्ड आधा टूटा हुआ है। चॉक की सफेद धूल हवा में तैर रही है। ऊपर छत से पुराना प्लास्टर झर-झर कर गिर रहा है। गरीब बच्चे जमीन पर फटी हुई किताबों पर झुके बैठे हैं। और ठीक इसी देश में हम बड़े गर्व के साथ घोषणा करते हैं कि भारत बहुत जल्द विश्व गुरु बनने जा रहा है। यहाँ सवाल बहुत सीधा और तीखा है। क्या इन टूटे हुए ब्लैकबोर्ड पर देश के करोड़ों बच्चों के सुनहरे सपने लिखे जा सकते हैं? भारत का पूरा शिक्षा तंत्र आज किसी सजे-संवरे और महकते बगीचे जैसा बिल्कुल नहीं दिखता है। यह तो एक पैबंद लगी हुई पुरानी रजाई है। इसमें कहीं चमकदार रेशम का टुकड़ा लगा है, तो कहीं फटा हुआ टाट का। कहीं आलीशान और चमकदार निजी स्कूल खड़े हैं, तो कहीं जर्जर हो चुकीं सरकारी इमारतें अपना रोना रो रही हैं।

हमारे देश में आज लगभग 72 अलग-अलग शिक्षा बोर्ड हैं। हर बोर्ड अपनी अलग ढपली और अपना अलग राग बजा रहा है। CBSE करीब 27,000 स्कूलों का एक विशाल नेटवर्क लेकर छात्रों को सिर्फ प्रतियोगी परीक्षाओं की अंधी दौड़ के लिए तैयार करता है। ICSE बोर्ड हमेशा अपनी एक खास और अभिजात (एलीट) पहचान में सिमटा रहता है। वहीं राज्य बोर्ड अक्सर स्थानीय भाषा, क्षेत्रीय इतिहास और सस्ती राजनीति के रंग में पूरी तरह रंगे होते हैं। उधर NIOS उन बेबस बच्चों के लिए एक नया रास्ता खोलता है जो किसी वजह से पारंपरिक स्कूल व्यवस्था से बाहर हो गए। और फिर सबसे ऊपर आते हैं IB और Cambridge जैसे बड़े अंतरराष्ट्रीय बोर्ड। यहाँ पढ़ने वाले अमीर बच्चे सीधे वैश्विक विश्वविद्यालयों की ओर अपनी उड़ान भरते हैं। इसका सीधा नतीजा यह है कि हमारी भारतीय शिक्षा की गाड़ी एक साथ कई अलग-अलग दिशाओं में खिंच रही है। कोई बोर्ड बच्चों को सीधे JEE और NEET की अंधी दौड़ में धकेलता है। तो कोई उन्हें क्षेत्रीय इतिहास की मोटी-मोटी किताबों में उलझा कर रख देता है। हर साल देश में यह अराजकता का बड़ा मेला लगता है। और उसी मेले के बीच लाखों मासूम बच्चे अपना रास्ता खोजते रहते हैं।

अब जरा इन स्कूलों के भीतर झांक कर देखिए। एक तरफ महानगरों के चमचमाते हुए निजी स्कूल हैं। वहां काँच की बड़ी-बड़ी दीवारें हैं। सेंट्रलाइज्ड एसी वाले कमरे हैं। हर क्लास में स्मार्ट बोर्ड लगे हैं। आधुनिक रोबोटिक्स लैब मौजूद हैं। वहां पढ़ने वाले दस साल के बच्चे भी कोडिंग सीख रहे हैं। वे बचपन से ही अमेरिका की सिलिकॉन वैली और ब्रिटेन की ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के बड़े सपने देखते हैं। वहीं दूसरी तरफ हमारे आम सरकारी स्कूल हैं। बरसात आते ही उनकी छत टपकने लगती है। स्कूल का फर्श गंदे कीचड़ से भर जाता है। देश के कई सरकारी स्कूलों में आज भी लड़कियों के लिए साफ शौचालय तक मौजूद नहीं हैं। बड़े-बड़े मंचों से डिजिटल इंडिया की चर्चा बहुत खूब होती है। लेकिन आज भी कई गांवों में इंटरनेट का नाम सुनते ही बच्चे ऐसे हैरानी से देखते हैं जैसे किसी ने उन्हें परियों की कोई नई कहानी सुना दी हो। यहीं से हमारे भारत की असली तस्वीर सबके सामने आती है।

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ASER यानी ‘एनुअल स्टेटस ऑफ एजुकेशन रिपोर्ट’ (Annual Status of Education Report), भारत की स्कूली शिक्षा का सबसे सच्चा और ईमानदार आईना है। इसे हर साल मशहूर शिक्षा संस्था ‘प्रथम’ जारी करती है। इसके सर्वेक्षक गांव-गांव और घर-घर जाकर बच्चों की पढ़ने और गणित की बुनियादी क्षमता की ज़मीनी जांच करते हैं। यह रिपोर्ट सरकार को बार-बार चेतावनी देती है। रिपोर्ट बताती है कि बड़ी कक्षाओं (आठवीं-नवीं) तक पहुँचने के बाद भी लाखों बच्चे दूसरी कक्षा का एक साधारण पाठ भी ठीक से नहीं पढ़ पाते हैं। वे बच्चे साधारण घटाव और गुणा जैसे बुनियादी गणित में भी बुरी तरह अटक जाते हैं। यानी स्कूल में उनके कीमती साल तो गुजरते हैं, पर उनके सीखने की असली बुनियाद हमेशा कमजोर ही रहती है। यहीं से हमारे समाज में असमानता की असली कहानी शुरू होती है। अमीर परिवारों के सुविधा-संपन्न बच्चे अंतरराष्ट्रीय बोर्डों से पढ़कर सीधे विदेशों की उड़ान भरते हैं। जबकि गरीब और मजदूर परिवारों के बच्चे अक्सर मजबूरी में बीच रास्ते में ही अपनी पढ़ाई छोड़ देते हैं। हमारे देश में बच्चे का जन्म ही उसकी आगे की किस्मत तय कर देता है।

हम अंतरिक्ष मिशनों (चंद्रयान और गगनयान) और डिजिटल तकनीक पर गर्व से अरबों रुपये खर्च करते हैं। लेकिन आज भी हमारे हजारों स्कूलों में पढ़ाने के लिए पर्याप्त शिक्षक मौजूद नहीं हैं। कई कक्षाएँ बिना गुरु के खाली गूंजती रहती हैं। भाषा के विवाद और क्षेत्रीय राजनीति ने भी हमारी शिक्षा को एक गंदा अखाड़ा बना दिया है। इस बीच हमारी सदियों पुरानी रटने की संस्कृति ने बच्चों की रचनात्मकता का पूरी तरह गला घोंट दिया है। बचपन से ही बच्चों को एक मशीन की तरह सिखाया जाता है: बस याद करो, परीक्षा की कॉपी में उसे उगल दो और फिर अगले दिन सब कुछ भूल जाओ। ज्ञान का एक सच्चा दीपक जलाने के बजाय, आज हमारी शिक्षा कई बार टूटे हुए कंगनों की तरह जमीन पर बिखर जाती है। इस व्यवस्था में एक और बड़ी समस्या है, वह है माइग्रेशन (पलायन)। मान लीजिए किसी परिवार की नौकरी किसी दूसरे राज्य में लग गई। अब उस बेचारे बच्चे को नया राज्य, नया बोर्ड, नई किताबें और एक बिल्कुल नई परीक्षा प्रणाली झेलनी पड़ती है। उसके माता-पिता दफ्तरों के धक्के खाते और चक्कर काटते रहते हैं, सिर्फ एक ‘इक्विवेलेंस सर्टिफिकेट’ हासिल करने के लिए।

देश की बड़ी प्रतियोगी परीक्षाओं में भी यह भारी असमानता साफ दिखती है। JEE और NEET जैसी कठिन परीक्षाओं की तैयारी में CBSE बोर्ड के छात्रों को हमेशा एक बड़ी बढ़त मिलती है। क्योंकि परीक्षाओं का पूरा पैटर्न उसी के इर्द-गिर्द घूमता है। दूसरे राज्य बोर्डों के होनहार बच्चे भी कई बार खुद को इस रेस में बहुत पीछे पाते हैं। लेकिन हमारी विडंबना यहीं पर खत्म नहीं होती है। एक ओर देश भर में हजारों मदरसे सिर्फ धार्मिक शिक्षा दे रहे हैं। वहां आस्था का संसार तो खूब फल-फूल रहा है। लेकिन वहां आधुनिक विज्ञान और गणित की शिक्षा बहुत पीछे रह जाती है। वहीं दूसरी ओर क्रिश्चियन मिशनरी स्कूल आधुनिक शिक्षा तो देते हैं, मगर वे भी अक्सर धर्मांतरण और राजनीतिक बहसों के गहरे घेरे में आ जाते हैं। इन तमाम भारी समस्याओं के बीच केंद्र सरकार नई शिक्षा नीति 2020 (NEP 2020) लेकर आई। यह नीति देश के लिए उम्मीदों का एक नया सूरज लेकर आई थी। इसमें पाँच प्लस तीन प्लस तीन प्लस चार (5+3+3+4) का एक बिल्कुल नया ढांचा पेश किया गया। ‘परख’ (PARAKH) नाम की एक नई राष्ट्रीय मूल्यांकन प्रणाली की बात हुई। एक राष्ट्रीय पाठ्यचर्या का बड़ा सपना दिखाया गया।

लेकिन सरकार यह भूल गई कि कागजों पर नीति बनाना बहुत आसान है, उसे जमीन पर उतारना सबसे मुश्किल काम है। नई शिक्षा नीति को लागू हुए पूरे पाँच साल गुजर चुके हैं। लेकिन कई राज्य आज भी अपने उसी पुराने और सड़े हुए ढांचे में ही अटके हुए हैं। राज्यों की स्वायत्तता और उनकी आपसी राजनीति के कारण इस बदलाव की रफ्तार बहुत ही धीमी है। देश के शिक्षा के आंकड़े भी भारत की दोहरी कहानी कहते हैं। दक्षिण में केरल में साक्षरता लगभग 90 प्रतिशत से ऊपर चमकती है। लेकिन उत्तर में बिहार और यूपी आज भी इस आधी दूरी पर बुरी तरह हांफते हुए दिखाई देते हैं। निजी स्कूलों के बच्चों की अंग्रेजी और विज्ञान पर पकड़ बहुत मजबूत है। लेकिन सरकारी स्कूलों में कई बच्चे आज भी अपनी बुनियादी पढ़ाई के लिए रोज़ाना जूझ रहे हैं। हम दुनिया के सामने गगनचुंबी इमारतों और ट्रिलियन डॉलर इकॉनमी का सपना देख रहे हैं। लेकिन हमारी नींव बिल्कुल रेत की तरह कमजोर है। कहीं दूर-दराज के गांवों में लड़कियाँ सिर्फ दूर से पीने का पानी भरने के लिए अपना स्कूल छोड़ देती हैं। कहीं गरीब लड़के खेतों में मवेशी चराने लगते हैं। और उसी देश के बड़े शहरों में दस साल के बच्चे एडवांस मोबाइल ऐप बना रहे हैं। अमीर और गरीब के बीच का यह फासला आज गंगा नदी जितना चौड़ा हो चुका है।

हमारा पूरा शिक्षा तंत्र आज कई बार किसी बहुत जर्जर और पुरानी रेलगाड़ी जैसा लगता है। जिसके सारे डिब्बे अलग-अलग पटरी पर जबरदस्ती खिंच रहे हैं। उनका कोई एक पक्का इंजन नहीं है और उनकी कोई एक दिशा नहीं है। उस ट्रेन में बैठे गरीब यात्रियों (छात्रों) के सपने अपनी मंजिल पर पहुंचने से पहले स्टेशन पर ही गिर कर टूट जाते हैं। यह वही महान देश है जो आज दुनिया की बड़ी-बड़ी कंपनियों (Google, Microsoft) को बड़े-बड़े सीईओ (CEO) देता है। और ठीक उसी समय इसी देश के लाखों बच्चे अपनी बुनियादी पढ़ाई के लिए संघर्ष कर रहे हैं। हमारे स्कूलों की टूटती हुई दीवारें हमारे ‘विश्व गुरु’ बनने के सपनों का खुला मजाक उड़ा रही हैं। देश के बहत्तर शिक्षा बोर्ड हमारे बच्चों के भविष्य को छोटे-छोटे टुकड़ों में बांट रहे हैं। यह असमानता समाज में हर दिन नई खाइयाँ बना रही है। अब सरकार के आधे-अधूरे और दिखावटी उपाय बिल्कुल काम नहीं करेंगे। हमें अपने सरकारी स्कूलों को बुनियादी रूप से मजबूत करना ही होगा। हमारे शिक्षकों को बेहतर और आधुनिक प्रशिक्षण देना होगा। शिक्षा प्रणाली को सबके लिए सरल, सुलभ और न्यायपूर्ण बनाना होगा। वरना आने वाली पीढ़ियाँ एक दिन हम सबसे यह कड़वा सवाल जरूर पूछेंगी: “भारत ने चाँद तक अपने रॉकेट तो भेज दिए, लेकिन क्या वह अपने करोड़ों बच्चों को पढ़ने के लिए एक मजबूत और सुरक्षित स्कूल भी दे पाया?”

Pawan Singh

Pawan Singh

Chief Editor, Taj News

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