Dr Pramod Kumar article on eradicating casteism and building an egalitarian society

“सामाजिक महामारी (जाति प्रथा) से समतामूलक (समरसता) समाज की दिशा में प्रयाण: पुनर्निर्माण, पुनर्जागरण, नवचिंतन और परिवर्तन का आंदोलन”

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Edited by: Thakur Pawan Singh | tajnews.in | 01 Mar 2026, 12:28 pm IST

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Taj News Opinion Desk

विशेष संपादकीय लेख

Dr Pramod Kumar Writer

डॉ प्रमोद कुमार

डिप्टी नोडल अधिकारी, MyGov, डॉ भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय, आगरा

डॉ भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय, आगरा के डॉ प्रमोद कुमार ने अपने इस वैचारिक लेख में जाति प्रथा को एक ‘सामाजिक महामारी’ बताते हुए इसके ऐतिहासिक उद्भव, मनोवैज्ञानिक प्रभाव और समतामूलक समाज के निर्माण की अनिवार्यता पर गहन विश्लेषण प्रस्तुत किया है। पढ़िए उनका यह विचारोत्तेजक लेख:

“सामाजिक महामारी (जाति प्रथा) से समतामूलक (समरसता) समाज: पुनर्निर्माण, पुनर्जागरण, नवचिंतन और परिवर्तन का आंदोलन” विषय केवल भावनात्मक अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि भारतीय समाज की संरचना, उसके इतिहास, वर्तमान और भविष्य के गहन विश्लेषण की मांग करता है। जाति प्रथा को यदि सामाजिक महामारी कहा जाए तो यह उपमा मात्र अलंकार नहीं है, बल्कि उस दीर्घकालिक सामाजिक संक्रमण की ओर संकेत है जिसने भारतीय समाज की आत्मा, उसकी नैतिकता, उसकी मानवीय संवेदना और उसकी एकात्मता को गहरे स्तर पर प्रभावित किया है। महामारी वह होती है जो लंबे समय तक समाज के बड़े हिस्से को प्रभावित करे, पीढ़ियों तक उसकी मानसिकता और संरचनाओं में समा जाए और स्वयं को परंपरा या स्वाभाविक व्यवस्था के रूप में स्थापित कर ले। जाति प्रथा ने भी कुछ ऐसा ही किया।

ऐतिहासिक दृष्टि से देखें तो भारतीय समाज में वर्ण और जाति की अवधारणाएँ क्रमशः विकसित हुईं। प्रारंभिक वैदिक काल में वर्ण का आशय कर्म-आधारित सामाजिक विभाजन से जोड़ा जाता है, किंतु समय के साथ यह विभाजन जन्म-आधारित, कठोर और वंशानुगत हो गया। सामाजिक गतिशीलता समाप्त होने लगी और मनुष्य की पहचान उसके गुण, कर्म और व्यक्तित्व से हटकर उसके जन्म से निर्धारित की जाने लगी। यही वह मोड़ था जहाँ एक लचीली सामाजिक संरचना कठोर पदानुक्रम में बदल गई। इस पदानुक्रम ने श्रेष्ठ और हीन, शुद्ध और अशुद्ध, स्पृश्य और अस्पृश्य जैसे विभाजन निर्मित किए, जिनका मनोवैज्ञानिक और सामाजिक प्रभाव अत्यंत व्यापक रहा।

सामाजिक महामारी की एक विशेषता यह होती है कि वह केवल शारीरिक या बाह्य संरचना को प्रभावित नहीं करती, बल्कि मानसिकता में भी घर कर जाती है। जाति प्रथा ने भी सामाजिक चेतना को इस प्रकार ढाला कि असमानता को सामान्य, विभाजन को स्वाभाविक और भेदभाव को धार्मिक या सांस्कृतिक मान्यता का स्वरूप दे दिया गया। परिणामस्वरूप, असंख्य लोग सदियों तक शिक्षा, संपत्ति, सम्मान और अवसरों से वंचित रहे। यह वंचना केवल आर्थिक नहीं थी; यह आत्मसम्मान और मानवीय गरिमा से भी जुड़ी थी। किसी भी समाज की प्रगति उसके सभी सदस्यों की भागीदारी पर निर्भर करती है, परंतु जाति-आधारित विभाजन ने इस सामूहिक ऊर्जा को खंडित कर दिया।

समतामूलक समाज की अवधारणा इस ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के प्रतिपक्ष में खड़ी होती है। समरसता का अर्थ समानता के साथ-साथ पारस्परिक सम्मान और बंधुत्व से है। यह केवल विधिक समानता तक सीमित नहीं, बल्कि सामाजिक और मानसिक समानता की भी मांग करती है। समरस समाज में व्यक्ति की पहचान उसके कर्म, प्रतिभा और मानवीय गुणों से होती है, न कि उसके जन्म से। आधुनिक भारतीय संविधान ने इसी दिशा में एक ठोस आधार प्रस्तुत किया, जिसमें समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व को मूल आदर्शों के रूप में स्वीकार किया गया।

सामाजिक पुनर्निर्माण की प्रक्रिया बहुआयामी होती है। यह केवल कानून बनाने से पूरी नहीं होती, बल्कि सामाजिक चेतना के परिवर्तन से पूर्ण होती है। संविधानिक प्रावधानों ने अस्पृश्यता को अपराध घोषित किया और समान अवसर की गारंटी दी, किंतु सामाजिक व्यवहार में परिवर्तन एक दीर्घकालिक प्रक्रिया है। पुनर्निर्माण का पहला चरण है—स्वीकारोक्ति। जब समाज यह स्वीकार करता है कि जाति-आधारित भेदभाव अन्यायपूर्ण और अमानवीय है, तभी परिवर्तन की वास्तविक शुरुआत होती है। यह स्वीकारोक्ति आत्मालोचन से जुड़ी है, जिसमें व्यक्ति और समुदाय अपने ऐतिहासिक विशेषाधिकारों और पूर्वाग्रहों की समीक्षा करते हैं।

पुनर्जागरण का आशय है—नैतिक और बौद्धिक जागृति। भारतीय इतिहास में अनेक संतों, समाज सुधारकों और विचारकों ने जाति-आधारित भेदभाव का विरोध किया और समता का संदेश दिया। भक्ति आंदोलन से लेकर आधुनिक काल के सामाजिक आंदोलनों तक, समरसता की धारा निरंतर प्रवाहित होती रही। इन आंदोलनों ने यह स्पष्ट किया कि आध्यात्मिकता और मानवता का संबंध जन्म-आधारित श्रेष्ठता से नहीं, बल्कि नैतिक आचरण से है। पुनर्जागरण तभी प्रभावी होता है जब वह केवल विचार तक सीमित न रहकर व्यवहार में भी उतरता है।

नवचिंतन की आवश्यकता इसलिए है क्योंकि आधुनिक समाज नई चुनौतियों से जूझ रहा है। शहरीकरण, वैश्वीकरण और डिजिटल युग ने सामाजिक संपर्क के नए आयाम खोले हैं, किंतु साथ ही जातिगत पहचानें नए रूपों में भी उभर रही हैं। राजनीति, विवाह, सामाजिक संगठन और आर्थिक नेटवर्क में जाति का प्रभाव अभी भी दिखाई देता है। ऐसे में नवचिंतन का अर्थ है—परंपरा और आधुनिकता के बीच संतुलन स्थापित करते हुए ऐसी सामाजिक संरचना विकसित करना जो समान अवसर और सामाजिक न्याय सुनिश्चित करे। शिक्षा इस नवचिंतन का सबसे प्रभावी माध्यम है। जब शिक्षा समावेशी, संवेदनशील और आलोचनात्मक दृष्टि प्रदान करती है, तब वह पूर्वाग्रहों को तोड़ने की क्षमता रखती है।

परिवर्तन का आंदोलन केवल बाह्य संरचनाओं में बदलाव नहीं, बल्कि आंतरिक दृष्टिकोण में परिवर्तन की प्रक्रिया है। यह आंदोलन किसी एक वर्ग के विरुद्ध नहीं, बल्कि असमानता के विरुद्ध है। इसका लक्ष्य समाज को विभाजित करना नहीं, बल्कि एकजुट करना है। समतामूलक समाज की स्थापना के लिए आवश्यक है कि सभी समुदाय संवाद और सहयोग की भावना से आगे बढ़ें। आर्थिक सशक्तिकरण, शिक्षा का विस्तार, सामाजिक सुरक्षा और राजनीतिक प्रतिनिधित्व—ये सभी तत्व मिलकर समरस समाज की नींव रखते हैं।

जाति-आधारित भेदभाव के उन्मूलन में कानून और नीतियों की महत्वपूर्ण भूमिका है, परंतु सामाजिक चेतना के बिना वे अधूरे हैं। सामाजिक संगठनों, शैक्षणिक संस्थानों, मीडिया और धार्मिक मंचों को भी समानता और बंधुत्व का संदेश प्रसारित करना चाहिए। यदि धार्मिक या सांस्कृतिक व्याख्याएँ विभाजन को बढ़ावा देती हैं, तो उनका पुनर्मूल्यांकन आवश्यक है। परंपरा का अर्थ जड़ता नहीं, बल्कि निरंतरता और परिवर्तन का संतुलन है।

समरसता की स्थापना में आर्थिक आयाम भी महत्वपूर्ण है। जब तक संसाधनों और अवसरों का समान वितरण नहीं होगा, तब तक सामाजिक समानता अधूरी रहेगी। आरक्षण जैसी नीतियाँ ऐतिहासिक असमानताओं को संतुलित करने का प्रयास हैं, परंतु उनका उद्देश्य स्थायी विभाजन नहीं, बल्कि समान अवसर सुनिश्चित करना है। दीर्घकालिक लक्ष्य यह होना चाहिए कि समाज इस स्तर तक पहुँच जाए जहाँ ऐसी विशेष व्यवस्थाओं की आवश्यकता न रहे।

मानसिकता में परिवर्तन सबसे कठिन किंतु सबसे आवश्यक चरण है। यह परिवर्तन परिवार से शुरू होता है, जहाँ बच्चों को समानता, सम्मान और विविधता के मूल्य सिखाए जाते हैं। यदि अगली पीढ़ी जातिगत पूर्वाग्रहों से मुक्त होकर पलेगी, तो सामाजिक पुनर्निर्माण की प्रक्रिया तीव्र होगी। साहित्य, कला और सिनेमा भी सामाजिक चेतना को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं। जब ये माध्यम समता और मानवता के पक्ष में खड़े होते हैं, तो वे जनमानस में गहरा प्रभाव छोड़ते हैं।

समतामूलक समाज का निर्माण केवल एक सामाजिक लक्ष्य नहीं, बल्कि राष्ट्रीय एकता और विकास की भी आवश्यकता है। विभाजित समाज अपनी ऊर्जा आंतरिक संघर्षों में व्यय करता है, जबकि समरस समाज अपनी सामूहिक शक्ति को रचनात्मक दिशा में लगा सकता है। वैज्ञानिक, आर्थिक और सांस्कृतिक प्रगति तभी संभव है जब सभी वर्गों को समान अवसर और सम्मान मिले। इस आंदोलन का सार यह है कि जाति प्रथा को परंपरा के नाम पर स्वीकार करना न तो नैतिक रूप से उचित है और न ही व्यावहारिक रूप से लाभकारी। परंपराएँ तब तक मूल्यवान हैं जब तक वे मानव गरिमा और सामाजिक न्याय के अनुकूल हों। यदि कोई परंपरा असमानता और भेदभाव को पोषित करती है, तो उसका पुनर्मूल्यांकन आवश्यक है।

अंततः सामाजिक महामारी से समतामूलक समाज की यात्रा एक दिन में पूर्ण नहीं होती। यह एक सतत प्रक्रिया है, जिसमें पुनर्निर्माण, पुनर्जागरण, नवचिंतन और परिवर्तन के चरण परस्पर जुड़े हुए हैं। यह आंदोलन किसी एक विचारधारा या वर्ग का नहीं, बल्कि संपूर्ण समाज का है। इसका लक्ष्य विभाजन की दीवारों को तोड़कर समानता, बंधुत्व और मानवता की नींव पर एक नया सामाजिक ढाँचा खड़ा करना है। जब समाज अपने अतीत से सीख लेकर भविष्य की ओर बढ़ता है, तभी वास्तविक पुनर्जागरण संभव होता है। यही वह दिशा है जिसमें सामाजिक महामारी का अंत और समरस समाज का आरंभ निहित है। तभी भारतवर्ष एक अखण्ड, समृद्ध, सशक्त, और विकसित राष्ट्र के रूप में दुनिया के सामने उभरेगा और सदैव उदयीमान रहेगा। जय हिंद जय भारत। जय संविधान जय विज्ञान। जय समाज जय मानवता।

Thakur Pawan Singh

Thakur Pawan Singh

Chief Editor, Taj News

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