Edited by: Thakur Pawan Singh | Written by: Brij Khandelwal | tajnews.in | 25 Feb 2026, 09:15 am IST
Taj News Opinion Desk
विशेष संपादकीय लेख
बृज खंडेलवाल
वरिष्ठ पर्यावरणविद्
दुनिया भर में बढ़ते जलवायु संकट और पर्यावरण विनाश पर वरिष्ठ पर्यावरणविद् एवं लेखक बृज खंडेलवाल ने गहरी चिंता व्यक्त की है। उनका मानना है कि पर्यावरण का यह संकट केवल थर्मामीटर के बढ़ते पारे या सरकारी नीतियों का नहीं, बल्कि हमारी अंतरात्मा और नैतिक मूल्यों का प्रश्न है। प्रस्तुत है उनका यह विचारोत्तेजक लेख, उन्हीं के शब्दों में:
जलवायु परिवर्तन थर्मामीटर का नहीं, अंतरात्मा का प्रश्न है
दुनिया में जलवायु सम्मेलनों की धूम मची हुई है। स्टूडेंट्स निबंध लिख रहे हैं। कतार लगी है। मंच सजे हैं। संकल्प पढ़े जा रहे हैं। तालियां बज रही हैं। लेकिन धरती तप रही है। हवा में जहर घुल रहा है। मौसम का मिज़ाज बिगड़ चुका है।
2025 दुनिया का तीसरा सबसे गरम साल रहा। औसत तापमान प्री-इंडस्ट्रियल स्तर से 1.34°C ऊपर पहुंच गया। महासागर अतिरिक्त गर्मी का 90 प्रतिशत अपने भीतर समेटे हुए हैं। वायुमंडल में CO₂ का स्तर 422 ppm पार कर चुका है, जो औद्योगिक युग से पहले की तुलना में लगभग 50 प्रतिशत अधिक है। उत्सर्जन घटने के बजाय बढ़ रहा है।
सवाल सीधा है, क्या यह केवल नीतियों की विफलता है? या हमारी नीयत की?
भारत की सभ्यता हमें एक अलग रास्ता दिखाती है। वसुधैव कुटुम्बकम, पूरी पृथ्वी एक परिवार। यह सिर्फ कूटनीतिक नारा नहीं, एक नैतिक आदेश है। महाउपनिषद कहता है: “अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम।” जो “मेरा-तेरा” में उलझे, वह छोटा हृदय है।
आज का कार्बन राष्ट्रवाद इसी संकीर्णता का नया चेहरा है। विकसित देश ऐतिहासिक उत्सर्जन की जिम्मेदारी से बचना चाहते हैं। विकासशील देश विकास का अधिकार मांगते हैं। लेकिन इस बहस में डूबते द्वीपों की चीख दब जाती है। वैज्ञानिक चेतावनी दे रहे हैं कि आने वाले दशकों में समुद्र स्तर और बढ़ेगा। तुवालु और किरिबाती जैसे देश अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं।
भारतीय दृष्टि में प्रकृति कोई संसाधन नहीं, संबंध है। “माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः”, धरती मां है, हम उसके पुत्र। लेकिन यह पुत्र आज अपनी ही मां का गला घोंट रहा है।
गंगा, जिसे हम मोक्षदायिनी कहते हैं, स्वयं मुक्ति मांग रही है। गंगा बेसिन में रोज़ हजारों मिलियन लीटर सीवेज बहता है, जिसका बड़ा हिस्सा बिना शोधन के नदी में गिरता है। वाराणसी में फीकल कोलीफॉर्म का स्तर सुरक्षित सीमा से कई गुना अधिक पाया गया। आस्था की आरती और प्रदूषण की धार साथ-साथ बह रही हैं।
रामायण में भगवान राम समुद्र से सेतु निर्माण की अनुमति मांगते हैं। युद्ध में भी प्रकृति के प्रति आदर। आज विकास के नाम पर पहाड़ काटे जाते हैं, नदियां मोड़ी जाती हैं, जंगल उजाड़े जाते हैं। 2024 में भारत ने लगभग 1.5 लाख हेक्टेयर प्राकृतिक वन गंवाए। यह सिर्फ पेड़ों की कटाई नहीं, कार्बन संतुलन का टूटना है。
धर्म का अर्थ पूजा-पाठ नहीं, संतुलन है। सृष्टि का क्रम है। जब यह संतुलन टूटता है, तो संकट जन्म लेता है। जलवायु परिवर्तन उसी अधर्म का परिणाम है।
रवींद्रनाथ टैगोर ने लिखा था, “जीवन की वही धारा जो मेरी नसों में बहती है, वही जगत में बहती है।” हमने उस धारा को बाँध दिया। नदियों को नालों में बदला। हवा को धुएं में। मिट्टी को जहर में।
महात्मा गांधी ने ट्रस्टीशिप का सिद्धांत दिया। संसाधन निजी लूट नहीं, समाज की अमानत हैं। उन्होंने चेताया: “पृथ्वी हर व्यक्ति की जरूरत पूरी कर सकती है, लेकिन लालच नहीं।” आज यह कथन जलवायु नीति का घोषणापत्र लगता है।
उनका स्वराज आत्मनिर्भर गांवों की बात करता था। स्थानीय ऊर्जा। संतुलित उत्पादन। सीमित उपभोग। आज की अंधी उपभोक्तावादी दौड़ इसके उलट खड़ी है।
संयुक्त राष्ट्र की हालिया आकलन रिपोर्टें चेतावनी देती हैं कि वर्तमान नीतियों के साथ सदी के अंत तक तापमान 2.5°C या उससे अधिक बढ़ सकता है। 1.5°C की सीमा लगभग हाथ से निकल रही है। इसका अर्थ है : और भी भीषण गर्मी, बाढ़, सूखा, चक्रवात।
स्वामी विवेकानंद ने कहा था, “हर आत्मा दिव्य है।” यदि हर आत्मा दिव्य है तो हर जीव, हर वन, हर नदी भी सम्मान के योग्य है। फिर विलुप्त होती प्रजातियों पर हमारी खामोशी क्यों?
महाभारत में जब लोभ ने बुद्धि पर विजय पाई, तो कुरुक्षेत्र में विनाश हुआ। आज की जलवायु लड़ाई भी एक आधुनिक कुरुक्षेत्र है। एक ओर असीम उपभोग। दूसरी ओर अंतरात्मा की पुकार।
जलवायु राजनीति अक्सर सौदेबाज़ी में सिमट जाती है: कौन कितना कटौती करेगा, किसे कितना वित्त मिलेगा। भारतीय चिंतन एक अलग प्रश्न उठाता है: क्या यह न्यायसंगत है? क्या यह धर्मसम्मत है?
नेतृत्व का अर्थ केवल लक्ष्य तय करना नहीं, चरित्र गढ़ना है। GDP से आगे बढ़कर आने वाली पीढ़ियों की सांसों के बारे में सोचना है।
संकट वैश्विक है। समाधान भी नैतिक होना चाहिए। तकनीक जरूरी है, लेकिन पर्याप्त नहीं। कानून जरूरी हैं, लेकिन अकेले काफी नहीं।
आख़िरकार जलवायु परिवर्तन थर्मामीटर का नहीं, अंतरात्मा का प्रश्न है।
क्या इंसानियत सचमुच परिवार की तरह व्यवहार करेगी?
या जलते हुए घर में खड़े होकर भी बहस करती रहेगी?
Thakur Pawan Singh
Chief Editor, Taj News
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