
Opinion Desk, Taj News Written by: Brij Khandelwal | Published: Wed, 11 Feb 2026
आगरा/नई दिल्ली: “लोकतांत्रिक व्यवस्था सत्ता और विपक्ष, दोनों की समझ, संयम और संवाद से ही चलती है।” यह कहना है देश के जाने-माने वरिष्ठ पत्रकार और चिंतक बृज खंडेलवाल (Brij Khandelwal) का। अपने इस विशेष लेख में उन्होंने संसद के शोर (Sansad ke Shor) और गिरती भाषाई मर्यादा पर तीखा प्रहार किया है। उनका मानना है कि जब सदन की कार्यवाही ठप होती है, तो सिर्फ समय नहीं, बल्कि लोकतंत्र का मीटर भी गिरता है।

बृज खंडेलवाल
वरिष्ठ पत्रकार एवं सामाजिक चिंतक
संसदीय गरिमा पर भाषण देना हमारे जनप्रतिनिधियों का पसंदीदा शगल बन चुका है, लेकिन उसी गरिमा को रोज़मर्रा की राजनीति में रौंद देना उससे भी ज़्यादा सहज हो चुका है। भारतीय संसद (Indian Parliament), विधानसभाओं और पंचायतों तक में मर्यादा की दुहाई जितनी ऊँची आवाज़ में दी जाती है, व्यवहार में उसकी अनदेखी उतनी ही बेशर्मी से हो रही है।
एक समय था जब सदन विचारों की टकराहट का सभ्य मंच हुआ करते थे। आज वही मंच शोर, नारेबाज़ी और अवरोध का अखाड़ा बनते जा रहे हैं। जिन विधायी संस्थाओं का दायित्व लोकतंत्र की मर्यादा को पोषित करना था, वही आज उसकी छवि में छेद करने की वजह बन रही हैं।
संसद के शोर और हंगामे की राजनीति
अगर सदन के “माननीय” सदस्य ही असंयमित भाषा को राजनीतिक रणनीति का हिस्सा बना लें, तो जनता से शिष्टाचार की अपेक्षा करना पाखंड है। बीते कुछ वर्षों में लोकतांत्रिक संस्थाओं का सामाजिक रुतबा गिरा है। यह कोई संयोग नहीं, बल्कि लगातार बिगड़ते आचरण का स्वाभाविक नतीजा है।
“चुनावी हार अब आत्ममंथन का अवसर नहीं रही। वह सदन की कार्यवाही को बंधक बनाने का लाइसेंस बन चुकी है… नतीजा यह कि लोकतंत्र की आत्मा **संसद के शोर** के नीचे दम तोड़ती जा रही है।”
विपक्ष का ‘सशक्त’ दावा और सत्ता का ‘घमंड’
पब्लिक कॉमेंटेटर प्रोफेसर पारस नाथ चौधरी के मुताबिक, चर्चा रोकना और सत्र को बाधित करना आज “सशक्त विपक्ष” होने का नया दावा बन गया है। वहीं सत्ता पक्ष भी संवाद के बजाय संख्या-बल के घमंड में विपक्ष की बात सुनने से बचता है। हाल ही में कर्नाटक विधान परिषद की घटना इसका ताज़ा उदाहरण है।
हंगामे की कीमत: 9 करोड़ रुपये प्रतिदिन
इस अव्यवस्था की कीमत केवल लोकतांत्रिक मूल्यों को नहीं, देश की जेब को भी चुकानी पड़ती है। आकलनों के अनुसार, छह घंटे के एक कार्यदिवस की लागत करीब नौ करोड़ रुपये तक पहुँच जाती है। जब पूरा दिन हंगामे की भेंट चढ़ जाता है, तो यह राशि ज़ाया हो जाती है। 2026 के बजट सत्र में भी हमने यही देखा।
निष्कर्ष: ताली दोनों हाथों से बजेगी
भारत की विधायिकाएँ महज़ क़ानून बनाने की फैक्टरी नहीं हैं। अगर इन्हें संसद के शोर के हवाले कर दिया गया, तो नुकसान पूरे लोकतंत्र का होगा। ताली तभी बजेगी, जब दोनों हाथ, सत्ता और विपक्ष, जिम्मेदारी से आगे बढ़ेंगे।
यह भी पढ़ें: ताज न्यूज़ की अन्य ओपिनियन (Opinion) और ख़बरें पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।
(डिस्क्लेमर: इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं। ताज न्यूज़ नेटवर्क का इससे सहमत होना अनिवार्य नहीं है।)
#BrijKhandelwal #Opinion #IndianDemocracy #Parliament #TajNews












