दो बैलों की जोड़ी से ट्रैक्टर तक, खेत से लैब तक: आज का किसान लिख रहा है भारतीय खेती की नई कहानी

Tuesday, 06 January 2026, 9:30:00 AM. Western Uttar Pradesh

वरिष्ठ पत्रकार और लेखक बृज खंडेलवाल अपने इस फीचर लेख में भारतीय खेती के उस ऐतिहासिक बदलाव को रेखांकित करते हैं, जिसमें परंपरा और तकनीक का संगम दिखाई देता है। बैलों और हल से शुरू हुई खेती आज ड्रोन, सेंसर, मोबाइल ऐप और प्रयोगशालाओं तक पहुँच चुकी है। यह लेख केवल कृषि तकनीक की कहानी नहीं, बल्कि भारतीय किसान की सोच, आत्मविश्वास और आत्मनिर्भरता की यात्रा का दस्तावेज़ है।

दो बैलों की जोड़ी से ट्रैक्टर तक, खेत से लैब तक: आज का किसान लिख रहा है भारतीय खेती की नई कहानी


बृज खंडेलवाल


सुबह की धूप अभी हल्की थी।
मेरठ जिले के एक गाँव में किसान रमेश अपने खेत पर खड़े थे। मोबाइल हाथ में थामे, वे स्क्रीन पर चमकते मौसम अलर्ट पर नजर गड़ाए हुए थे , “आज सिंचाई नहीं।”, उन्होंने तुरंत मोटर बंद कर दी। मुस्कराते हुए बोले, “अब खेत आसमान देखकर नहीं, ऐप देखकर चलते हैं।”
उनके दादा हरिया चौधरी के जमाने में यह कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। तब खेत का मिजाज मिट्टी की गंध से परखा जाता था, और बीज राम भरोसे बोए जाते थे। बरसात आई तो फसल, नहीं तो कर्ज़ और भूख। खेती तब अनुभव और विश्वास पर चलती थी, विज्ञान पर नहीं।
तीन पीढ़ियों में खेती ने जो छलांग लगाई है, वह केवल तकनीकी नहीं , मानसिकता की क्रांति है।
हरिया चौधरी के पास बैलों की जोड़ी थी, लकड़ी का हल, और अपने बचाए बीज; पैदावार सीमित थी, मगर मन में उम्मीद थी। वे कहते थे, “खेत को जितना दोगे, उतना लौटाएगा।”
आज वही खेत हरियाणा के चौधरी मुल्तान सिंह के लिए प्रयोगशाला बन चुका है , जहाँ मिट्टी में नमी सेंसर लगा है, ड्रिप पाइपें बिछी हैं, फसल की निगरानी ड्रोन करते हैं, और दाम व्हाट्सऐप पर तय होते हैं। खेती अब केवल मेहनत नहीं, डेटा, एल्गोरिद्म और सूचनाओं की साझेदारी है।

बृज खंडेलवाल
बृज खंडेलवाल


यह बदलाव केवल आगरा, हाथरस या मथुरा का नहीं, यह पूरे देश की कहानी है।
आजादी के बाद भारत भूखा था, अनाज कम, जनसंख्या अधिक। 1960 के दशक में जब सूखा पड़ा, तब अमेरिका से जहाजों में गेहूं मंगवाना पड़ा। दुनिया सवाल कर रही थी “क्या भारत खुद को कभी खिला सकेगा?” उत्तर मिला, हरित क्रांति के रूप में।
वैज्ञानिक आए, नए बीज आए, सिंचाई के साधन और खाद के प्रयोग शुरू हुए। किसान ने जोखिम उठाया और भरोसा किया। सरकार ने सहयोग दिया। वर्ष दर वर्ष खेतों ने जवाब दिया , हरे-भरे दानों की भाषा में।
1960 के दशक में खाद्यान्न उत्पादन कुल 50 से 60 मिलियन टन था। आज 2024-25 में भारत ने 357 मिलियन टन का रिकॉर्ड उत्पादन हासिल किया है। यही नहीं, भारत अब चावल का सबसे बड़ा निर्यातक और गेहूं में भी प्रमुख आपूर्तिकर्ता है। कृषि निर्यात का मूल्य 50 अरब डॉलर पार कर चुका है, जो विदेशी मुद्रा के साथ करोड़ों किसानों की आय भी बढ़ा रहा है।
यह यात्रा भूख से आत्मनिर्भरता और फिर आत्मविश्वास तक की है , खेतों में हुई एक शांत वैज्ञानिक क्रांति।
रमेश बताते हैं, “अब खेती अंदाज़े से नहीं, आँकड़े से होती है। पहले एक फसल में जितना कमाते थे, अब दो में दोगुना हो जाता है।”
ड्रिप सिंचाई से पानी बचा, मल्चिंग से खरपतवार रुके, मिट्टी परीक्षण से खाद का सही संतुलन मिला। ड्रोन ने मेहनत घटाई, और AI ने मौसम के बदलते तेवर का अनुमान लगाया। खेती अब तकनीक और परंपरा की साझेदारी है।
इस बदलाव की सबसे बड़ी खूबी यह है कि इससे पर्यावरण को भी राहत मिली है। कम पानी, कम कीटनाशक, और अधिक नियंत्रण , भूमिगत जल पर दबाव घट रहा है। मिट्टी की सेहत सुधर रही है। खेतों में जितना पानी बचेगा, नदियों में उतनी सांस बचेगी। अब खेती और पर्यावरण विरोधी नहीं, सहयोगी हैं।
इस क्रांति में महिलाएँ भी पीछे नहीं। “नमो ड्रोन दीदी” जैसी योजनाओं ने उन्हें तकनीकी रूप से सशक्त किया है। आज गाँव की महिलाएँ खेतों में ड्रोन उड़ा रही हैं, स्प्रे कर रही हैं, सर्वे कर रही हैं। यह केवल आय का नहीं, सम्मान का परिवर्तन है।
ब्रज और पश्चिमी उत्तर प्रदेश का यह इलाका, अब हरित संभावना का क्षेत्र बन चुका है। पॉलीहाउस में टमाटर, खीरा, शिमला मिर्च जैसी फसलें सालभर उगाई जा रही हैं। मौसम की मार से सुरक्षित, कम जमीन में अधिक उत्पादन , यही है स्मार्ट खेती का मूलमंत्र। खेती अब केवल गुज़ारा नहीं, व्यापार है।
फिर भी चुनौतियाँ बाकी हैं।
मौसम का मिजाज बिगड़ता जा रहा है कभी बाढ़, कभी सूखा, कभी कीटों का हमला। मिट्टी थकान महसूस कर रही है। किसान चिंतित हैं, पर अब वे अकेले नहीं। उनके साथ हैं कृषि वैज्ञानिक, नीति निर्माता और तकनीक।
अब उम्मीद की खेती होती है, रमेश मुस्कराते हैं। शाम को जब वे खेत से लौटते हैं, तो घर की दीवार पर टंगी दादा हरिया की पुरानी तस्वीर को देखते हैं। धीमे स्वर में कहते हैं, “दादा ने जो खेत जोते, हम उन्हें आगे बढ़ा रहे हैं, पर अब समस्याओं के हल हमारे दिमाग में नहीं, लैब में तैयार हो रहे हैं।”
हरित क्रांति की अनकही रीढ़ रहे हैं वे संस्थान, जिन्होंने खेत को दिशा दी , आगरा के बिचपुरी कृषि संस्थान जैसे केंद्रों ने प्रयोगशाला से खेत तक ज्ञान पहुँचाया। मिट्टी, बीज और पानी पर अनुसंधान हुए। नई किस्में विकसित हुईं, रोगरोधी पौधे बने। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसान वैज्ञानिक सोच की ओर बढ़े।
आगरा की लोहा ढलाई इकाइयों ने इस यात्रा को औज़ार दिए , हल, हैरो, पंप, थ्रेशर, पूरे देश के खेतों तक पहुँचने वाली मशीनरी यहीं निर्मित हुई। हरित क्रांति को सिर्फ अच्छे बीज नहीं, मजबूत औज़ार भी चाहिए थे , और आगरा की फाउंड्रियों ने यह जिम्मेदारी निभाई।
आज जब भारत खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भर है, यह समझना जरूरी है कि यह संघर्ष केवल धरती का नहीं, सोच का भी था।
1970 के दशक में जब लोग भूख से मरते थे, आज कोविड के बाद के भारत में करोड़ों गरीबों को मुफ्त अनाज मिल रहा है। यह परिवर्तन किसी फिल्मी कहानी जैसा लगता है, पर यह हर किसान के पसीने से लिखी सच्ची गाथा है।
भारतीय कृषि अब पीछे नहीं देख रही। हल से ड्रोन तक, बैलों से सेंसर तक, खेत से लैब तक , किसान ने खुद को बदला है, और इसी बदलाव ने भारत को विश्व कृषि मानचित्र पर अग्रणी बनाया है।
भविष्य की खेती स्मार्टफोन और मिट्टी, दोनों के मेल से चलेगी , जहाँ परंपरा की जड़ें विज्ञान के पंखों से जुड़ी होंगी।

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