मंदिरों में प्लास्टिक पर प्रहार: अब आस्था भी होगी ‘ग्रीन’! बृज खंडेलवाल का पर्यावरण पर प्रखर आलेख

आर्टिकल Desk | tajnews.in | Thursday, April 02, 2026, 08:15:00 AM IST

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विशेष पर्यावरण और वैचारिक आलेख
Brij Khandelwal Writer
बृज खंडेलवाल
वरिष्ठ पत्रकार एवं पर्यावरणविद्
वरिष्ठ पत्रकार और पर्यावरणविद् बृज खंडेलवाल ने अपने इस बेहद शानदार आलेख में मंदिरों के भीतर बढ़ते प्लास्टिक प्रदूषण पर गहरा प्रहार किया है। दरअसल, उन्होंने बताया है कि कैसे आस्था के नाम पर हम पवित्र परिसरों को कूड़ाघर बना रहे हैं। इसके अलावा, उन्होंने ‘टेंपल कनेक्ट’ और ‘ब्लूप्रिंट वाटर’ की नई ‘ग्रीन’ पहल का भी सटीक विश्लेषण किया है। इसलिए, पढ़िए यह विचारोत्तेजक आलेख:

मुख्य बिंदु

  • भारत के मंदिर सिर्फ पूजा के स्थल नहीं हैं, बल्कि वे रोज़ाना लाखों लोगों की भीड़ के महासागर हैं।
  • ‘टेंपल कनेक्ट’ ने मंदिरों से सिंगल-यूज़ प्लास्टिक बोतलों को हमेशा के लिए हटाने का एक बड़ा मिशन शुरू किया है।
  • अब प्लास्टिक की जगह हल्की, सुविधाजनक और पूरी तरह रिसाइकिल होने वाली इको-फ्रेंडली पैकेजिंग का इस्तेमाल होगा।
  • इस ‘ग्रीन वाटर’ पहल के साथ ‘इको-हीरो’ अभियान भी चलेगा, जो लोगों को अपनी पानी की बोतल साथ लाने के लिए प्रेरित करेगा।

घंटी बजती है। भीड़ उमड़ती है। प्रसाद मिलता है। और पीछे छूट जाता है… प्लास्टिक का पहाड़।

क्या यही हमारी आस्था की पहचान है?

अब तस्वीर बदलने की कोशिश शुरू हो गई है।

Temple Connect ने Blueprint Water के साथ हाथ मिलाया है। मिशन साफ है; मंदिरों और तीर्थस्थलों से एकल-उपयोग प्लास्टिक बोतलों को धीरे-धीरे बाहर का रास्ता दिखाना।

आसान नहीं है। लेकिन जरूरी है。

भारत के मंदिर सिर्फ पूजा के स्थल नहीं, भीड़ के महासागर हैं। रोज़ लाखों लोग आते हैं। पानी पीते हैं। बोतल फेंकते हैं। और देखते ही देखते पवित्र परिसर कूड़ाघर में बदलने लगता है।

आस्था पवित्र… लेकिन आसपास गंदगी। यह विरोधाभास अब चुभने लगा है。

यहीं से इस पहल की शुरुआत होती है।

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अब प्लास्टिक की जगह आएगी कागज आधारित, रिसाइकिल होने वाली पैकेजिंग। हल्की। सुविधाजनक। और सबसे बड़ी बात, धरती पर बोझ कम डालने वाली।

Blueprint Water का दावा है कि यह व्यवस्था मंदिरों की रोजमर्रा की जरूरतों से लेकर बड़े मेलों की भारी भीड़ तक आसानी से लागू हो सकती है। मतलब, न श्रद्धालु परेशान होंगे, न व्यवस्था चरमराएगी।

पर असली लड़ाई सिर्फ बोतल बदलने की नहीं है। आदत बदलने की है।

इसीलिए ‘इको-हीरो’ अभियान भी साथ चलाया जाएगा। संदेश सीधा है, अपनी बोतल साथ लाओ, जिम्मेदारी निभाओ।

सवाल उठता है, क्या श्रद्धालु सुनेंगे?

शायद हाँ। क्योंकि जब बात धर्म की हो, तो असर गहरा होता है।

गिरीश वासुदेव कुलकर्णी कहते हैं, धर्म सिर्फ पूजा नहीं सिखाता, जिम्मेदारी भी सिखाता है। और अगर मंदिर खुद उदाहरण बन जाएं, तो समाज को बदलने में देर नहीं लगती।

दूसरी तरफ, अनुज शाह इसे एक बड़े अवसर के रूप में देखते हैं। उनके शब्दों में, मंदिर देश के सबसे बड़े उपभोग केंद्र हैं। यहां छोटा बदलाव भी बड़ा असर पैदा कर सकता है।

बात में दम है।

अगर हर श्रद्धालु एक प्लास्टिक बोतल कम इस्तेमाल करे, तो सोचिए… हर दिन कितना कचरा कम होगा।

यह पहल धीरे-धीरे लागू होगी। पहले चुनिंदा मंदिर। फिर बड़े आयोजन। और फिर शायद पूरा देश।

लक्ष्य बड़ा है, धार्मिक स्थलों पर ‘ग्रीन वाटर’ को नया सामान्य बनाना।

आस्था अब सिर्फ सिर झुकाने तक सीमित नहीं रहेगी।

आस्था अब जिम्मेदारी भी निभाएगी。

और शायद पहली बार…

मंदिरों में पूजा के साथ-साथ प्रकृति भी मुस्कुराएगी।

Pawan Singh

Pawan Singh

Chief Editor, Taj News
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