अरावली : संतुष्ट होने की कोई गुंजाइश नहीं

Wednesday, 07 January 2026, 9:30:00 AM. India

सुप्रीम कोर्ट द्वारा अरावली पर्वत श्रृंखला से जुड़ी नई परिभाषा पर रोक लगाए जाने के बाद भी पर्यावरणविदों और स्थानीय समुदायों की चिंता खत्म नहीं हुई है। यह आलेख बताता है कि क्यों अरावली केवल एक पहाड़ी श्रृंखला नहीं, बल्कि उत्तर भारत की जीवनरेखा है—और कैसे कॉर्पोरेट लालच, अवैध खनन और नीतिगत ढील इसके अस्तित्व पर गंभीर खतरा बन चुके हैं।

अरावली : संतुष्ट होने की कोई गुंजाइश नहीं
(आलेख : इंदरजीत सिंह, अनुवाद : संजय पराते)

सुप्रीम कोर्ट ने 20 नवंबर, 2025 को अरावली पर्वत श्रृंखला पर अपने ही फैसले को रोक दिया है। इस फैसले के खिलाफ किसानों, महिलाओं, ग्रामीण मजदूरों, आदिवासियों, पर्यावरण समूहों और अन्य संबंधित नागरिकों द्वारा व्यापक गुस्सा प्रदर्शित किया गया था। इस मामले में विवाद की आग सुप्रीम कोर्ट द्वारा वन और पर्यावरण मंत्रालय द्वारा प्रस्तुत एक नई परिभाषा को स्वीकार करने से भड़की, जिसके अनुसार, 100 मीटर से कम ऊंची पहाड़ियों को पहाड़ी नहीं माना जाएगा और इस तरह वे खनन से सुरक्षा खो देंगी।

इंदरजीत सिंह

लोगों का गुस्सा इतना ज़्यादा था कि केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान द्वारा बार-बार दी गई सफाई और नुकसान को नियंत्रित करने (डैमेज कंट्रोल) के लिए की गई कोशिशें भी लोगों को समझाने में नाकाम रहीं। सुप्रीम कोर्ट को खुद ही इस मामले का संज्ञान लेना पड़ा, 29 दिसंबर को तत्काल सुनवाई के लिए मामला सूचीबद्ध करना पड़ा, और अहम मुद्दों की जांच के लिए एक नया पैनल बनाने के साथ-साथ अपने फैसले पर रोक लगानी पड़ी। हालांकि यह एक अच्छी बात है, लेकिन संतुष्ट होने की कोई गुंजाइश नहीं है, क्योंकि मूल परिभाषा के तहत भी अरावली में बेरहमी से अवैध खनन होता रहा है। इसलिए, लोगों के मन में डर का बने रहना बिना वजह नहीं है, क्योंकि कॉर्पोरेट लालच अरावली पर कब्ज़ा करना चाहता है और सरकार कॉर्पोरेट के हितों की सेवा करती है।

अरावली का महत्व

यहाँ अरावली के आर्थिक, सामाजिक, भौगोलिक, पारिस्थितिक और राजनीतिक पहलुओं को बताना ज़रूरी है। यह दुनिया की सबसे पुरानी पर्वत श्रृंखलाओं में से एक है, जो लगभग 1.5 से 2.5 अरब साल पुरानी है। अरावली श्रृंखला को अक्सर उत्तर-पश्चिमी भारत की जीवन रेखा कहा जाता है। गुजरात, राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली के राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के 37 जिलों में फैली अरावली सिर्फ़ पहाड़ियों की एक श्रृंखला भर नहीं है, बल्कि एक महत्वपूर्ण पारिस्थितिक तंत्र है, जो एक हरे फेफड़े की तरह काम करता है, समृद्ध जैव विविधता को सहारा देता है और हज़ारों सालों से मानव जीवन को बनाए रखता है।

लगभग 1.44 लाख वर्ग किलोमीटर में फैली अरावली पर्वतमाला दिल्ली, उत्तर प्रदेश और हरियाणा की ओर रेगिस्तान के फैलने के खिलाफ एक प्राकृतिक बाधा का काम करती है। दक्षिण-पश्चिमी हवाओं को रोककर और इस क्षेत्र में मानसून के पैटर्न को आकार देकर, इस पर्वत श्रृंखला ने पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने में अहम भूमिका निभाई है। इस बाधा के बिना, थार रेगिस्तान और भी पूर्व की ओर फैल जाता, जिसके खेती, खाद्य सुरक्षा और इंसानी बस्तियों के लिए गंभीर परिणाम होते। जलवायु परिवर्तन, बढ़ते तापमान, लू और धूल भरी आंधी के इस दौर में, अरावली पर्वतमाला का विनाश पहले से ही चल रहे पर्यावरणीय संकट को और भी बदतर बना सकता है।

लगातार आने वाली सरकारों और यहाँ तक कि सुप्रीम कोर्ट ने भी अक्सर दिल्ली की बिगड़ती हवा की गुणवत्ता के लिए किसानों को दोषी ठहराया है, जबकि पराली जलाने से कुल प्रदूषण में सिर्फ़ एक छोटा-सा हिस्सा ही जुड़ता है, और अरावली में बड़े पैमाने पर हो रहे अवैध खनन को नज़रअंदाज़ किया जाता है। कई ज़िलों में खेती-बाड़ी पानी और भूजल पुनर्भरण के लिए इस पर्वत श्रृंखला पर बहुत ज़्यादा निर्भर करती है, इसके अलावा यह खनिजों और औषधीय पौधों का भंडार भी है। हरियाणा में अरावली की तलहटी में स्थित सोहना के सल्फर वाले गर्म पानी के झरने, जो लंबे समय से त्वचा के इलाज के लिए जाने जाते हैं, ऐसे कई नाज़ुक पारिस्थितिक जगहों में से एक हैं, जो अब खतरे में हैं।

नॉर्थ और साउथ ब्लॉक में बैठे मौजूदा लोगों और रायसीना हिल के एहसानफरामोश किराएदारों को यह याद दिलाना जरूरी है कि लोग अरावली का 90 प्रतिशत हिस्सा अपने लालची कॉर्पोरेट मालिकों को सौंपने के इस माफी न देने लायक काम को बर्दाश्त नहीं करेंगे। वे यह जान लें कि पूरी राष्ट्रीय राजधानी नई दिल्ली, गुरुग्राम, फरीदाबाद आदि शहर उसी अरावली की बिना सोचे-समझे किए गए खनन से निकाली गई सामग्री पर खड़े हैं।

क्रूर विध्वंस

पिछले कई दशकों से, सत्ता में बैठे लोगों के संरक्षण वाले संगठित माफिया समूहों द्वारा बेरहम खनन और पेड़ काटने से अरावली को भारी और बेरहमी से नुकसान पहुंचाया गया है। संशोधित परिभाषा से स्वाभाविक रूप से पूरे देश में, खासकर अरावली श्रृंखला के लोगों में सदमे की लहर दौड़ गई, जहाँ कई स्वयंसेवी संगठन दशकों से इस श्रृंखला को बचाने और स्थानीय लोगों को जागरूक करने के लिए सक्रिय थे, जिनका जीवन और आजीविका सदियों से इन पहाड़ियों पर निर्भर है। बहरहाल, अरावली में जो हो रहा है, वह सिर्फ खनन तक ही सीमित नहीं है। इस क्षेत्र में कॉर्पोरेट की दिलचस्पी अब रियल एस्टेट डेवलपमेंट तक फैल गई है, जिसमें राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के तेजी से बढ़ते बाहरी इलाकों में बहुमंजिला आवास, आलीशान फार्महाउस और रिसॉर्ट के लिए बड़े इलाकों को खोलने की कोशिशें की जा रही हैं।

विडंबना यह है कि आज यह जीवनरेखा खुद अपने अस्तित्व के लिए रो रही है। पहाड़ों की चोटियों, तलहटी और अनदेखी गहराईयों से आ रही मुसीबतों के संकेत सत्ता में बैठे लोगों को सुनाई नहीं दे रहे हैं। असल में, अवैध खनन कई दशकों से चल रहा था। शुरू में, स्थानीय लोग छोटे पैमाने पर पत्थर निकालने के लिए छोटे गड्ढे खोदते थे और उन्हें स्टोन क्रशर्स को बेच देते थे। लेकिन समय के साथ, बड़े ठेकेदारों और कंपनियों ने भ्रष्ट अधिकारियों और सत्ताधारी प्रतिष्ठानों के साथ मिलकर बुलडोजर और अर्थमूवर जैसी भारी मशीनें लाईं, और सभी नियमों का खुलेआम उल्लंघन करते हुए, तलहटी के नीचे भी बड़े पैमाने पर खनन का काम फैला दिया। स्थानीय समुदायों ने खनन पर इस एकाधिकार का विरोध किया, लेकिन उनके विरोध को नज़रअंदाज़ कर दिया गया।

आजकल, पहाड़ों के अंदर गहरे में उच्च विस्फोटक उपकरण लगाए जाते हैं और रिमोट कंट्रोल से धमाके किए जाते हैं। तेज़ डेसिबल वाली गड़गड़ाहट से आस-पास के गांवों में भूकंप जैसे झटके आते हैं, जिससे घरों और दूसरी इमारतों में चौड़ी दरारें पड़ जाती हैं। हाल ही में, दक्षिण हरियाणा के महेंद्रगढ़ ज़िले के उस्मापुर और कुछ दूसरे आस-पास के गांवों के लोगों ने पिछले साल 28 दिसंबर को एक पंचायत बुलाई और अपने इलाके में खनन को पूरी तरह से बंद करने की मांग करने का फैसला किया। इसी तरह, हरियाणा के चरखी दादरी ज़िले के कुछ गांवों को एक कंपनी द्वारा की जा रही गहरे भूगर्भीय खनन को रुकवाने के लिए कई महीनों तक धरना देना पड़ा, क्योंकि भूगर्भ से निकाला गया पानी किसानों की फसलों को नुकसान पहुंचा रहा था।

पूंजीवाद का अभिशाप

भले ही सुप्रीम कोर्ट संशोधित परिभाषा पर रोक लगा दे, लेकिन अरावली की सुरक्षा और मिट्टी के खराब होने की बड़ी चिंता अभी भी बनी हुई है। फरवरी 2025 में, संसद को बताया गया कि भारत के मरुस्थलीकरण और भूमि एटलस 2021 के अनुसार, रेगिस्तान तेज़ी से फैल रहे हैं। हरियाणा में 3.64 लाख हेक्टेयर से ज़्यादा, पंजाब में 1.68 लाख और यूपी में 1.54 लाख हेक्टेयर ज़मीन पहले ही भू क्षरण और मरुस्थलीकरण से प्रभावित है। अगर कॉर्पोरेट के बड़े मुनाफ़े के लिए अरावली का दोहन होने दिया गया, तो यह प्रक्रिया निश्चित रूप से और तेज़ होगी।

मार्क्स और एंगेल्स के अनुसार, प्रकृति के लिए पूंजीवाद स्वाभाविक रूप से विनाशकारी होती है। मुनाफे की हवस से प्रेरित होकर, यह मिट्टी की चोरी, जंगल की कटाई और प्रदूषण के ज़रिए प्राकृतिक चक्रों (जिसे “मेटाबोलिक दरार” कहा जाता है) को बाधित करती है, और संसाधनों को सिर्फ़ माल मानकर इंसानियत को प्राकृतिक दुनिया से अलग कर देती है। उन्होंने भूमि और मज़दूरों के इस शोषण को पूंजीवाद के अंतर्विरोधों का मुख्य कारण माना। जैसा कि एंगेल्स के वुप्पर्टल शहर के बारे में टिप्पणियों और मार्क्स के कृषि के विश्लेषण में दिखाया गया है, इससे मिट्टी की कमी और शहरी प्रदूषण जैसे पारिस्थितिक संकट पैदा होती है। इससे निपटने के लिए एक तर्कसंगत और नियोजित दृष्टिकोण की जरूरत है।

(लेखक अखिल भारतीय किसान सभा के उपाध्यक्ष हैं। अनुवादक छत्तीसगढ़ किसान सभा के उपाध्यक्ष हैं। संपर्क : 94242-31650)

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