
Political Desk, Taj News | Updated: Monday, 09 February 2026, 12:39 PM IST
आगरा की इमारतें सिर्फ़ ईंट और पत्थर नहीं, बल्कि सदियों की तहज़ीब, प्रकृति से तालमेल और स्थापत्य समझ की जीवित गवाही हैं। बृज खंडेलवाल अपने इस लेख में बताते हैं कि कैसे बाबर से लेकर शाहजहाँ और अंग्रेज़ों तक, आगरा ने बाग़ों, संगमरमर और संतुलित शहरी सोच को अपनाया, लेकिन आज वही शहर प्रदूषण, अव्यवस्था और उपेक्षा से जूझ रहा है। ताजमहल का संगमरमर पीला पड़ रहा है, यमुना काली हो चुकी है और हवा ज़हरीली होती जा रही है। इसके बावजूद आगरा की विरासत दुनिया को खींचती है, जो इस बात का संकेत है कि अगर नागरिक चाहें, तो यह शहर फिर से साँस ले सकता है।

आगरा: जहाँ पत्थरों ने बोलना सीखा, पर अब खांस रहे हैं!!
बृज खंडेलवाल
आगरा की इमारतें सिर्फ़ ईंट, पत्थर और गुम्बद नहीं हैं। ये सदियों से चली आ रही एक कहानी हैं: हुकूमत की, ख़ूबसूरती की, आस्था की और फ़ितरत से तालमेल की। पाँच सौ सालों में आगरा ने अलग-अलग तहज़ीबों के असर को अपने भीतर समेटा और उन्हें अपनी खास पहचान में ढाल दिया।
आगरा: हवा और पानी के प्रदूषण से जूझता शहर
एक पतनशील नगर का उज्ज्वल भविष्य नागरिकों पर निर्भर है।
आगरा को सन् 1504 में सिकंदर लोदी ने अपनी राजधानी बनाया था। इसके बाद मुग़ल सल्तनत के संस्थापक बाबर और फिर अकबर, जहाँगीर और शाहजहाँ जैसे बादशाहों ने इस शहर को सजाया-सँवारा। यमुना नदी की ख़ूबसूरती और उसके इर्द-गिर्द का प्राकृतिक माहौल इस शहर की शान और रौनक़ बढ़ाता था। यहाँ की फ़िज़ा और कुदरती आकर्षण इतने असरदार थे कि अंग्रेज़ हुक्मरानों ने भी आगरा को नज़रअंदाज़ नहीं किया और यहाँ शानदार इमारतें तामीर कीं।
मध्यकालीन इतिहासकारों और मुसाफ़िरों ने आगरा की मिश्रित तहज़ीब, इसकी सांस्कृतिक विविधता और जैविक समृद्धि की जमकर तारीफ़ की है। दूर-दराज़ के इलाक़ों, यहाँ तक कि आर्मेनिया से भी, शायर, धर्मगुरु और व्यापारी आगरा खिंचे चले आते थे। बादशाह अकबर ने यहीं दीन-ए-इलाही और सुल्ह-ए-कुल यानी आपसी भाईचारे और सहिष्णुता के प्रयोग किए। राधास्वामी परंपरा ने धर्मों के मेल-जोल की इस सोच को और आगे बढ़ाया। सिख, ईसाई और सूफ़ी संतों को भी आगरा का माहौल अपनी रचनात्मकता और साधना के लिए मुफ़ीद लगा।

एक शानदार अतीत से आज़ादी के बाद के पतन तक, आगरा की कहानी एक ऐसे ऐतिहासिक शहर की दास्तान है जो विरासत और लापरवाही के बीच फँसा हुआ है। यह शहर कहीं न कहीं अपने लोगों की जिजीविषा, संघर्ष और उस अधूरी लड़ाई को बयान करता है, जिसमें वे अपनी शानदार विरासत को बढ़ते प्रदूषण और नागरिक अव्यवस्था से बचाने की कोशिश कर रहे हैं।
जब सोलहवीं सदी की शुरुआत में बाबर आगरा आया, तो उसे यहाँ की सख़्त ज़मीन और मौसम रास नहीं आए। उसने इसका हल ढूँढा, बाग़ों के ज़रिये। फ़ारसी चारबाग़ की तर्ज़ पर पानी की नहरों और हरियाली से सजे बाग़ बनाए गए। यहीं से आगरा एक रूखे शहर से बाग़ों के शहर में बदलने लगा। निर्माण कार्य सिर्फ़ ताक़त दिखाने का ज़रिया नहीं था, बल्कि नेचर के साथ तालमेल का माध्यम भी बना।
अकबर ने इस सोच को और आगे बढ़ाया। फ़तेहपुर सीकरी में उसने लाल बलुआ पत्थर से ऐसी इमारतें खड़ी कीं, जिनमें गुजरात और राजस्थान के कारीगरों की मेहनत और हुनर झलकता है। छतरियाँ, झरोखे, जालियाँ; सब कुछ देशज परंपरा से जुड़ा था। अकबर की इमारतें उसकी सोच जैसी थीं: खुली, समावेशी और ज़मीन से जुड़ी हुई।
जहाँगीर के दौर में निर्माण गतिविधियों में संतुलन और नज़ाकत आई, लेकिन आगरा की असली शान शाहजहाँ के ज़माने में निखरी। सफ़ेद संगमरमर से उसका लगाव ताजमहल में अमर हो गया। ताज सिर्फ़ मोहब्बत की निशानी नहीं, बल्कि ज्यामिति, संतुलन और योजना की बेहतरीन मिसाल है। यमुना के किनारे, खुले बाग़ों के बीच खड़ा ताजमहल ऐसा नज़ारा पेश करता है जो दिल और दिमाग, दोनों को सुकून देता है।

शाहजहाँ के बाद आगरा की रफ़्तार धीमी पड़ गई। सियासत का रुख़ बदला और तामीरी जुनून भी कम होता गया। अंग्रेज़ों के दौर में चर्च, कॉलेज और सरकारी इमारतें बनीं। यूरोपीय अंदाज़ होते हुए भी कई इमारतों में मुग़ल छाप दिखाई देती है। सेंट जॉन्स कॉलेज और आगरा कॉलेज जैसे भवन आज भी उस दौर की याद दिलाते हैं।
आज का आगरा मिला-जुला नज़ारा पेश करता है। कुछ आधुनिक इमारतें शहर की विरासत सहेजती दिखती हैं, लेकिन ज़्यादातर नव निर्माण में न पहचान है, न नज़ाकत, और न ही तमीज। ऐसे शहर में, जिसने दुनिया को ताजमहल दिया, यह कमी ज़्यादा चुभती है।
फिर भी आगरा की कहानी ख़त्म नहीं हुई है। मुग़ल मक़बरे हों, अंग्रेज़ी दौर की इमारतें या आधुनिक तजुर्बे, आगरा आज भी प्रायोगिक निर्माण की एक ज़िंदा किताब है। संजय प्लेस की LIC बिल्डिंग जिसे मुंबई के एक प्रख्यात पारसी आर्किटेक्ट ने डिजाइन किया था, या आगा खान सम्मान से सुशोभित ITC की मुगल होटल, या ओबेरॉय ग्रुप का अमर विलास होटल, आगरा की विरासत को संरक्षित किए हुए हैं, यद्यपि सरकारी निर्माण बेहद खस्ता हाल और बेहूदे से ही लगते हैं। पुराने शहर में अभी भी काफी हवेली टाइप विशाल मकान बचे हैं, जिनके मुख्य द्वार, छज्जे, कारीगरी के बेहतरीन नमूने हैं।
वास्तव में, अतीत की इमारतें सिर्फ़ सल्तनतों का उत्थान-पतन नहीं बतातीं, बल्कि ख़ूबसूरती, आस्था और सहअस्तित्व की सोच को भी बयान करती हैं।
आगरा इसलिए ज़िंदा है क्योंकि इसकी इमारतें सिर्फ़ दिखती नहीं, बोलती भी हैं। संगमरमर और पत्थरों में, बाग़ों और दरवाज़ों में, यह शहर बताता है कि कभी इंसान मानता था कि पत्थर सोच सकते हैं, पानी बात कर सकता है, और शहर अमर हो सकते हैं।
दुर्भाग्य से या हमारी करतूतों की वजह से ताजमहल का सफ़ेद संगमरमर पीला पड़ रहा है, यमुना प्रदूषण से काली हो चुकी है, और हवा में PM2.5 का स्तर अक्सर 150-300 के बीच घूमता रहता है, यानी “अस्वस्थ” से “खतरनाक” तक। फिर भी, 2024-25 में ताजमहल ने 69 लाख से ज़्यादा पर्यटकों को अपनी ओर खींचा: 62.6 लाख भारतीय और 6.45 लाख विदेशी। आगरा की विरासत इतनी ताक़तवर है कि प्रदूषण के बावजूद दुनिया इसे देखने आती है। शहरवासी अगर अपनी विरासत और संस्कृति से प्रेम और गर्व करने लगें, तो हालात बदलने में वक्त नहीं लगेगा।
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