Edited by: Thakur Pawan Singh | tajnews.in | 27 Feb 2026, 06:51 pm IST

Taj News Opinion Desk
विशेष संपादकीय लेख

गौरी शंकर सिंह
स्वतंत्र विचारक एवं लेखक
गौरी शंकर सिंह ने अपने इस वैचारिक लेख में समकालीन लोकतंत्र की कड़वी सच्चाई, लोक की बढ़ती अनास्था और सत्ता के व्यवसायीकरण पर गहरा कटाक्ष किया है। यह लेख लोकतंत्र के आदर्शों और उसके मौजूदा यथार्थ के बीच की खाई को उजागर करता है। प्रस्तुत है उनका यह विचारोत्तेजक लेख:
लोकतंत्र के विषय में आदर्श कथन बहुत हैं—लोक द्वारा, लोक के लिए, लोक से। पर समकालीन यथार्थ में यह कथन व्यंग्य में बदल चुका है—“by the fool, to the fool, from the fool”। यह व्यंग्य लोक का नहीं, उस व्यवस्था का है जो लोक को केवल वैधता का साधन मानती है, सहभागी नहीं। आज लोकतंत्र के चारों खम्भे संरचनात्मक रूप से खड़े हैं, पर नैतिक रूप से चरमराते हुए। सदाचार, सेवा, परहित और नैतिकता—ये शब्द संविधान में तो हैं, पर व्यवहार से धीरे-धीरे विस्थापित हो चुके हैं।
लोक : आधार है, कर्ता नहीं
लोकतंत्र का आधार लोक है—यह निर्विवाद है। पर लोक के हाथ में वास्तविक निर्णय-शक्ति नहीं। वह मतदान करता है, पर नीति नहीं बनाता। वह सहमति देता है, पर दिशा नहीं तय करता। यहीं से लोक की अनास्था जन्म लेती है। यह अनास्था विद्रोह नहीं, बल्कि उस थकान का नाम है जो बार-बार ठगे जाने से पैदा होती है।
तंत्र और नेतृत्व : सेवा नहीं, व्यवसाय
आज का नेतृत्व किसी सामाजिक तपस्या या आध्यात्मिक साधना से नहीं निकलता। वह संगठन, पूँजी, प्रचार और सत्ता-प्रबंधन से निकलता है। यह स्थिति किसी एक देश या समाज तक सीमित नहीं— यह वैश्विक है। इसलिए यह अपेक्षा करना कि सत्ता नैतिक आग्रह से सुधर जाएगी, यथार्थ से मुँह मोड़ना होगा।
सुधार : आदर्श नहीं, यथार्थ का समायोजन
सुधार अब नैतिक उपदेश नहीं हो सकता। वह केवल व्यवस्था के भीतर रहकर, उसी के औज़ारों से संभव है। इतिहास साक्षी है— व्यवस्थाएँ बाहर से नहीं बदलीं, वे भीतर से संतुलित की गईं। जब लाभ को पूर्ण निरंकुश नहीं रहने दिया गया, जब भय का केंद्र बदला गया, जब सत्ता ने सत्ता को ही सीमित किया— तभी कुछ सुधार संभव हुआ। यह ऊँचा आदर्श नहीं, पर यही व्यावहारिक नैतिकता है。
अनास्था : दोष नहीं, संकेत
लोक की अनास्था को अपराध कहना आसान है, पर वह वास्तव में एक संकेत है— कि लोकतंत्र सहभागिता से फिसलकर प्रबंधन में बदल चुका है। लोक तब दोषी होता है, जब उसके पास वास्तविक विकल्प हों। पर जहाँ विकल्प नियंत्रित हों, सूचना निर्देशित हो, और विमर्श पूर्व-निर्धारित हो— वहाँ चुप्पी आत्मरक्षा है。
करना बाध्यता है, कहना विकल्प
आज “करना” विकल्प नहीं रहा। व्यवस्था जैसी है, वैसी ही रहेगी— जब तक उसका चक्र पूरा नहीं होता। पर “कहना” अब भी विकल्प है। और कहना—यदि ईमानदार हो— तो वह आने वाले समय के लिए स्मृति बनता है। लेखन परिवर्तन का तात्कालिक औज़ार नहीं, पर वह भविष्य की ज़मीन तैयार करता है。
निष्कर्ष
यह समय सुधार का नहीं, सुधार की संभावना को जीवित रखने का समय है। जब-जब जो होना है, वह होगा— पर तब यह पूछा जाएगा कि इस अँधेरे दौर में किसने सच को दर्ज किया था। कविता, लेख, विमर्श— ये क्रांति नहीं हैं, पर ये विवेक के दीपक हैं। और कई बार, इतिहास में दीपक ही सबसे बड़ा प्रतिरोध होता है।

Thakur Pawan Singh
Chief Editor, Taj News
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