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भारत की महिलाओं को सशक्त बनाने का समय:
हर महिला को ₹5,000 मासिक “यूनिवर्सल बेसिक सैलरी” मिले
बृज खंडेलवाल
27 नवंबर 2025
भारत की हर वयस्क, गैर-पेंशनभोगी और गैर-आयकरदाता महिला को ₹5,000 मासिक “यूनिवर्सल बेसिक सैलरी” देना न केवल आर्थिक रूप से पूरी तरह संभव है, बल्कि यह सामाजिक न्याय, लैंगिक समानता और जमीनी विकास के लिए आवश्यक है। यह एक सीधी, सम्मानजनक और भ्रष्टाचार-मुक्त व्यवस्था बनकर उन अनगिनत भारतीय महिलाओं को औपचारिक रूप से “कमाने वाली” की पहचान दे सकती है, जिनके श्रम ने दशकों से परिवार और समाज की रीढ़ तो संभाली, पर उन्हें कभी आर्थिक स्वतंत्रता नहीं मिली।

उदयपुर ज़िले के खेतवाड़ा गाँव की 62 वर्षीय लक्ष्मी की कहानी इसी अदृश्य संघर्ष का प्रतीक है। उसकी ज़िंदगी वही थी जो करोड़ों भारतीय गृहिणियों की है—सुबह से रात तक खटते रहना, लेकिन जेब में मुश्किल से ₹20। घर, मवेशी, बच्चे, बुज़ुर्ग—सबकी देखभाल उसकी जिम्मेदारी, फिर भी परिवार की आर्थिक लिखत-पढ़त में उसका नाम कभी नहीं आया। कई बार भूख मिटाने के लिए अपनी थाली से रोटियाँ कम करनी पड़ीं, दवाइयाँ सिर्फ तब लीं जब दर्द असहनीय हो जाए, और हर सीजन इस डर में जिया कि अगर बेटे की फसल बिगड़ गई, तो सबसे पहले उसी का खर्च कटेगा।
अब तस्वीर की दूसरी तरफ देखिए—एक सुबह उसके खाते में सीधे ₹5,000 आते हैं। न किसी की मेहरबानी, न कोई अपमानजनक सवाल, न कोई शर्त। उस दिन वह पहली बार पर्स लेकर अकेली बाज़ार जाती है, मधुमेह की दवाइयाँ खरीदती है, पोती की स्कूल वैन की फ़ीस जमा करती है, और ₹200 “बिना दस्तक आने वाली मुसीबतों” के लिए अलग रख देती है। पड़ोसी कहते हैं कि वह अब ज़्यादा मुस्कुराती है; लक्ष्मी बस इतना कहती है—“पहली बार लगा कि मेरे देश ने मेरे काम को देखा है।”
यह सवाल कि बेसिक सैलरी क्यों ज़रूरी है, भारत की वास्तविकता से उठता है। देश में लगभग 68–70 करोड़ महिलाएँ हैं, जिनमें से भारी संख्या घरेलू और देखभाल के काम में लगी है, जो GDP में दर्ज ही नहीं होता। जबकि 2025–26 के केंद्रीय बजट में महिला एवं बाल विकास मंत्रालय को लगभग ₹26,889 करोड़ और समूचे जेंडर बजट को करीब ₹4.49 लाख करोड़ मिले हैं, पर यह राशि 273 से अधिक योजनाओं में इस कदर विभाजित है कि एक आम गृहिणी तक इसका वास्तविक लाभ अक्सर पहुँच ही नहीं पाता। घरेलू श्रम करने वाली भारतीय महिला आज भी अपनी आर्थिक सुरक्षा के लिए पति या घर के ‘कमाने वाले’ पर निर्भर रहती है। उसकी अपनी, स्वतंत्र और भरोसेमंद आय आज भी सपना है।
यूनिवर्सल बेसिक सैलरी का विचार इसी ऐतिहासिक अन्याय को सुधारने का व्यावहारिक और सम्मानजनक रास्ता है। भारत में लगभग 55 करोड़ वयस्क महिलाएँ हैं। पेंशनभोगी और आयकरदाता महिलाओं को हटाकर भी लगभग 51–52 करोड़ महिलाएँ ऐसी हैं जिन्हें यह स्वतंत्र आय दी जा सकती है। यदि शुरुआती चरण में 40 करोड़ महिलाओं को शामिल किया जाए, तो ₹5,000 मासिक के हिसाब से कुल वार्षिक खर्च लगभग ₹2.4 लाख करोड़ बैठेगा—जो भारत के अनुमानित GDP का एक प्रतिशत से भी कम और संघीय बजट का छोटा-सा अंश है। हैरानी की बात यह है कि भारत पहले ही सामाजिक क्षेत्र पर 20–25 लाख करोड़ रुपये सालाना खर्च कर रहा है। ऐसे में महिला-संबंधी बिखरी हुई 200 से अधिक योजनाओं और 4.49 लाख करोड़ वाले जेंडर बजट का एक हिस्सा समेकित करके इस सरल, सीधे और पारदर्शी नकद-आधारित कार्यक्रम को आसानी से टिकाऊ बनाया जा सकता है।
₹5,000 की मासिक आमदनी सिर्फ एक नकद हस्तांतरण नहीं, बल्कि महिलाओं के लिए आर्थिक और सामाजिक स्वतंत्रता का द्वार है। यह पहला अवसर होगा जब घरेलू श्रम को संस्थागत मान्यता मिलेगी—खाना पकाना, सफ़ाई, बच्चों-बुज़ुर्गों की देखभाल जैसी गतिविधियों को “काम” मानकर सम्मानजनक आय प्राप्त होगी। यह राशि महिलाओं को पहली बार वह बुनियादी सुरक्षा देगी जिससे वे बीमारी, भूख, उपेक्षा या घरेलू हिंसा जैसी स्थितियों में तुरंत और स्वतंत्र निर्णय ले सकें। सालाना ₹60,000 की गारंटीड आमदनी किसी भी महिला के लिए जीवन बदल देने वाली स्थिरता है, जैसा कई राज्यों की नकद अंतरण योजनाओं से पहले ही स्पष्ट हो चुका है। सबसे महत्वपूर्ण यह कि सीधा DBT इस प्रोग्राम को सबसे कम-भ्रष्ट और सबसे पारदर्शी योजनाओं में बदल देगा।
इसका असर केवल महिलाओं तक सीमित नहीं रहेगा। ग्रामीण और कस्बाई बाज़ार सीधे इस धन का लाभ उठाएँगे—दूध, दाल, सब्ज़ी, दवा, स्कूल फ़ीस, कपड़े, मरम्मत—सब पर यह पैसा तुरंत खर्च होता है, जिससे स्थानीय अर्थव्यवस्था में नई ऊर्जा आती है। विभिन्न अध्ययनों के अनुसार इस तरह की नकद सहायता का आर्थिक गुणक 2.5 से 3 तक हो सकता है, यानी हर एक रुपये के बदले अर्थव्यवस्था में 2 से 3 रुपये की नई गतिविधि जन्म लेती है। राजनीति पर भी इसका असर पड़ेगा, क्योंकि महिलाएँ पारदर्शी नकद सहायता को गंभीरता से याद रखती हैं, और इससे उनकी लोकतांत्रिक आवाज़ और सौदेबाज़ी की शक्ति बढ़ेगी।
इस योजना को लागू करना चरणबद्ध तरीके से बिल्कुल संभव है। 2026–28 के बीच सबसे पिछड़े ज़िलों और ग्रामीण महिलाओं को लक्ष्य बनाकर पहला चरण शुरू हो सकता है। इसके बाद 2029 तक पूरे देश में विस्तार करते हुए पुरुषों का भी स्वैच्छिक पंजीकरण शुरू किया जा सकता है, ताकि धीरे-धीरे भारत एक पूर्ण यूनिवर्सल बेसिक इनकम की दिशा में बढ़ सके। इसके लिए 0.5–1 प्रतिशत का “केयर इकॉनमी सेस” लक्ज़री सामान, बड़े उत्तराधिकार और हाई-वैल्यू डिजिटल ट्रांज़ैक्शनों पर लगाया जा सकता है, जिसे जेंडर बजट और सामाजिक व्यय के साथ मिलाकर इस योजना का स्थायी वित्तीय आधार बनाया जा सकता है।
हाल ही में बिहार में हुए चुनावों की सफलता से प्रेरित होकर रणनीतिकार अब इस बढ़त को व्यापक राजनीतिक लाभ में बदलने की संभावनाएँ तलाश रहे हैं। असली सबक केवल गठबंधन की गणित में नहीं, बल्कि मतदाता संवाद की केमिस्ट्री में छिपा है: दस हजार रुपए से आर्थिक चिंताओं को सीधे संबोधित किया गया और भरोसा दिलाया गया कि महिलाओं की आर्थिक स्वाधीनता के लिए सरकार प्रतिबद्ध है। अगर मोदी सरकार हिम्मत जुटा कर पूरे देश में महिलाओं को मासिक न्यूनतम वेतन दे, तो आर्थिक स्वराज का सपना साकार हो सकता है ।
, जमीनी उपस्थिति को स्पष्ट रूप से दिखाना और दिखावे से ज्यादा स्थिरता का नैरेटिव पेश करना।
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