Brij Khandelwal article on verbal abuse and disrespect of women in society

औरतों का सम्मान करना है तो गालियों में उनका जिक्र न कीजिए! ताज नगरी की ज़बानी गंदगी

आर्टिकल

Edited by: Thakur Pawan Singh | tajnews.in | Agra | 09 Mar 2026, 02:19 am IST

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Taj News Opinion Desk

विशेष संपादकीय लेख

Brij Khandelwal Writer

बृज खंडेलवाल

वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक

वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक बृज खंडेलवाल ने अपने इस विचारोत्तेजक आलेख में समाज की एक बड़ी विडंबना पर गहरी चोट की है। उन्होंने बताया है कि कैसे हमारे समाज में आम बोलचाल और गालियों में हमेशा माँ, बहन और बेटी को ही निशाना बनाया जाता है। पढ़िए आगरा की गलियों की यह ‘ज़बानी गंदगी’ और इसका कड़वा सच:

मुख्य बिंदु

  • मोहब्बत के शहर आगरा की गलियों में तैरता भाषाई प्रदूषण और गालियों का बढ़ता चलन।
  • हर छोटे-बड़े झगड़े में अपना गुस्सा निकालने के लिए महिलाओं (माँ-बहन) को ही निशाना बनाने की मानसिकता।
  • समाज में घटता सब्र, खत्म होती तहज़ीब और पश्चिमी संस्कृति के प्रभाव से बदलती गालियों की भाषा।
  • औरतों का सच्चा सम्मान करने के लिए अपनी आम बोलचाल से इस ‘ज़बानी गंदगी’ को दूर करने की अपील।

आगरा शहर पूरी दुनिया में ताजमहल के लिए मशहूर है। यह एक बेहद खूबसूरत मोहब्बत की निशानी है। लेकिन आप ज़रा इस शहर की पुरानी गलियों में घूमिए। आपको यहाँ एक और नया “स्मारक” नज़र आएगा। यह स्मारक आगरा की गालियों का स्मारक है। यहाँ लोगों की तालीम बिल्कुल मायने नहीं रखती है। यहाँ किसी की तहज़ीब भी नहीं देखी जाती है। इसके अलावा किसी की दौलत भी यहाँ कोई फर्क नहीं डालती है। दरअसल आगरा में एक बिल्कुल अलग लोकतांत्रिक ज़बान चलती है। यह अजीब ज़बान सिर्फ गालियों की ज़बान है। सड़क पर एक सब्ज़ी बेचने वाला लगातार गालियां बकता है। गली के नुक्कड़ पर एक स्कूटर मिस्त्री भी यही भाषा बोलता है। एक पढ़ा-लिखा कॉलेज का छात्र भी पीछे नहीं रहता है। पान की दुकान पर बैठे बुज़ुर्ग भी धड़ल्ले से गालियां देते हैं। वे गुटके की पीक की बौछार के साथ गालियों का मधुर रस घोलते हैं!

लेकिन इस पूरी कहानी में एक बहुत ही अजीब मोड़ मौजूद है। दरअसल ज़्यादातर गालियाँ हमेशा औरतों के नाम पर ही टिकती हैं। लोग बात-बात पर माँ की गाली देते हैं। वे बहन और बेटी को भी अपना निशाना बनाते हैं। दो लोगों का झगड़ा चाहे गाड़ी की पार्किंग का हो। या फिर उनका विवाद बिजली के बिल का हो। लेकिन इज़्ज़त हमेशा किसी की माँ या बहन की ही उछलती है। आगरा की हवा में यह भाषाई प्रदूषण लगातार तैरता रहता है। फिर भी किसी को इस गंदगी से कोई तकलीफ़ नहीं होती है। आम लोगों को अब इसकी पूरी तरह आदत पड़ चुकी है। यह उनके लिए सड़क के सामान्य शोर जैसा बन गया है। इस मामले में औरतें भी अब बिल्कुल पीछे नहीं हैं। वे भी इस गाली-गलौज की कला में कम उस्ताद नहीं हैं। यहाँ गालियां देने में उम्र की कोई पाबंदी नहीं है। आजकल दादी-नानी भी ऐसी भयानक शब्दावली आसानी से चला सकती हैं। उनकी गालियां सुनकर शायद एक ट्रक ड्राइवर भी शर्म से पानी-पानी हो जाए。

एक पुराना ज़माना था जब लोगों की बातों में नज़ाकत होती थी। तब मुहावरों से बात सजती थी। लोग कहावतों से अपने तर्क बहुत मजबूत करते थे। शेर-ओ-शायरी से आम बातचीत में एक अलग ही नूर आ जाता था। लेकिन आजकल लोगों का ग़ुस्सा बहुत ज्यादा बढ़ गया है। लोगों के अंदर सब्र पूरी तरह घट चुका है। इसलिए हमारी ज़बान अब बहुत ज्यादा गरीब हो गई है। जब लोगों के पास अच्छे लफ़्ज़ कम पड़ते हैं। तब अचानक उनके मुंह पर गाली हाज़िर हो जाती है। वे अपने हर वाक्य में भद्दे जिस्मानी इशारे करते हैं। वे हर छोटे झगड़े में माँ-बहन का जिक्र जरूर करते हैं। असल में उनका ग़ुस्सा खराब ट्रैफिक या व्यवस्था पर होता है। लेकिन निशाना हमेशा घर की औरत ही बनती है। यह गंभीर सवाल शायद ही किसी को परेशान करता है। ग्रामीण आगरा हो या मुख्य शहर हो। गाली कई लोगों के लिए अपना ग़ुस्सा निकालने का सबसे आसान ज़रिया बन चुकी है。

आज के समय में ज़िंदगी बहुत मुश्किल हो गई है। समाज में नाइंसाफ़ी बहुत ज्यादा फैली हुई है। आम आदमी के दिल में भड़ास भरी रहती है। इसलिए लोग अपना मानसिक दबाव कम करने के लिए गाली देते हैं। इसमें न कोई खून-खराबा होता है। और न ही कोई पुलिस केस बनता है। यह बस एक तरह की ज़बानी आतिशबाज़ी होती है। कुछ लोग तो इसे एक मजबूत सामाजिक हथियार भी बताते हैं। वे कहते हैं कि गाली एक तरह का अहिंसक विरोध है। इसमें कोई गोली नहीं चलती है। इसमें बस आदमी की ज़बान चलती है। यह एक बहुत ही अजीब ख्याल है। लेकिन यह बात पूरी तरह बेबुनियाद भी नहीं है। गालियाँ अक्सर उस दबे हुए ग़ुस्से की आवाज़ होती हैं। यह ग़ुस्सा व्यवस्था से निराश आम आदमी के भीतर लगातार जमा होता रहता है। फिर भी एक अहम सवाल बार-बार हमारे सामने उठता है। आखिर हर गाली औरत के इर्द-गिर्द ही क्यों घूमती है? क्यों लोग हमेशा माँ, बहन और बेटी को बीच में लाते हैं?

यह आखिर कैसी बीमार मानसिकता है? इस मानसिकता ने औरत को सिर्फ इज़्ज़त का बर्तन बना दिया है। हमारे समाज के कुछ सामाजिक विश्लेषक तो इस मामले में और आगे जाते हैं। उनका साफ कहना है कि समाज में बदलाव गोलियों से नहीं आता है। बल्कि यह बदलाव गालियों से आता है। भारत जैसे अहिंसा-प्रिय समाज में गाली ग़ुस्से का एक वैध इज़हार है। वे तो यहाँ तक कहते हैं कि गालियों का दायरा अब बढ़ना चाहिए। उनके अनुसार नई तरह की एलजीबीटी-दोस्त गालियाँ भी बननी चाहिए। यह बात सुनकर हर कोई चौंकाने वाला महसूस करता है। लेकिन हमारी पुरानी परंपरा भी कम अजीब नहीं है। उत्तर भारत की शादियों में दूल्हे की बारात का स्वागत अलग तरीके से होता है। वहाँ औरतें मीठी और लयबद्ध गालियों से बारातियों का स्वागत करती हैं। इस दौरान सब लोग ज़ोर-ज़ोर से हँसते हैं। वे सभी इस रस्म का पूरा मज़ा लेते हैं। यह हमारे समाज की एक अजीब सांस्कृतिक रस्म है。

गली-मुहल्लों की इस मिली-जुली संस्कृति में भी गाली का अपना एक मुकाम है। चाय की दुकान पर आपको यही भाषा मिलेगी। व्यस्त बाज़ार में भी यही शोर गूंजता है। शहर के बस अड्डे पर भी यही खुरदुरी भाषा सुनाई देती है। हर सार्वजनिक जगह पर लोग इसी भाषा में बात करते हैं। अगर आपको पुलिस की नौकरी करनी हो। तो शायद गाली-शास्त्र में पारंगत होना भी आपके लिए बहुत ज़रूरी है। मशहूर कवि खुसकेट अकबराबादी ने बरसों पहले एक बहुत गहरी बात लिखी थी। उन्होंने लिखा था कि जिसे गाली देना नहीं आता, उसकी ज़िंदगी अधूरी है। आगरा शहर इस बात को पूरी शिद्दत से साबित करता है। यहाँ लोग लड़ाई में अपने हथियार कम निकालते हैं। इसके बजाय वे गालियाँ ज़्यादा निकालते हैं। जानकार कहते हैं कि जहाँ समाज बहुत बीमार होता है। वहाँ बात-बात पर पिस्तौल चलती है। लेकिन जहाँ लोग थोड़े सभ्य होते हैं। वहाँ सिर्फ गाली से काम चल जाता है। यह एक अजीब सामाजिक संतुलन बन गया है。

लेकिन आगरा की इस पुरानी गाली संस्कृति पर अब एक नया खतरा मंडरा रहा है। यह खतरा पश्चिमी सभ्यता का असर है। शहर की संस्कृति के एक जानकार पंडित इस बात से बहुत दुखी हैं। उनका कहना है कि आज के नौजवानों ने गालियों की पूरी पुरानी विरासत बरबाद कर दी है। आज की युवा पीढ़ी की पूरी शब्दावली बस दो अंग्रेज़ी लफ़्ज़ों में सिमट गई है। वे दिन भर बस “ओह शिट” या “एफ-वर्ड” कहते रहते हैं। बस इतनी ही उनकी भाषा रह गई है। इस नई भाषा में न कोई तर्ज़ है। इसमें न कोई पुराना रंग बचा है। आगरा की पुरानी गालियों में एक अजीब रचनात्मकता थी। उनमें एक लय हुआ करती थी। बोलने की एक खास अदायगी थी। अब यह सब कुछ ग्लोबलाइजेशन की अंधी भेंट चढ़ रहा है। नौजवान अपनी जड़ों से कटते जा रहे हैं। फिर भी यह शहर अपनी उसी पुरानी रफ्तार से चलता जा रहा है। यहाँ का मिज़ाज बिल्कुल नहीं बदला है。

एक तरफ ताजमहल में पूरी दुनिया मोहब्बत देखने आती है। और दूसरी तरफ बाहर गलियों में लोग अपना रोज़मर्रा का ग़ुस्सा निकालते रहते हैं। शायद हमारे बुज़ुर्ग बिल्कुल ठीक ही कहते हैं। गालियां कभी-कभी भाषा का श्रृंगार बन जाती हैं। गालियाँ इंसान की ज़बान में एक अजीब करंट भर देती हैं। ये बातें इंसान की भाषा में बेबाकी लाती हैं। लेकिन इसके बावजूद हमारी समाज से बस एक छोटी-सी गुज़ारिश है। आपको जब भी अगली बार ग़ुस्सा आए। तो आप कृपया करके किसी की माँ या बहन को बख्श दीजिए। आप औरतों को अपनी इस ज़बानी गंदगी का निशाना मत बनाइए। बेचारी औरत इस हिंसक भाषा में बहुत पहले ही शहीद हो चुकी है। अगर आप सच में औरतों का सम्मान करना चाहते हैं। तो आपको अपनी गालियों में उनका जिक्र तुरंत बंद करना होगा। यही महिलाओं के प्रति सबसे सच्चा और अच्छा सम्मान होगा। हमें अपनी भाषा सुधारनी होगी। तभी हमारा समाज सही मायने में सभ्य कहलाएगा।

Thakur Pawan Singh

Thakur Pawan Singh

Chief Editor, Taj News

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