Edited by: Pawan Singh | tajnews.in | Agra | 11 Mar 2026, 04:22 pm IST
Taj News Opinion Desk
विशेष संपादकीय लेख
बृज खंडेलवाल
वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक
वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक बृज खंडेलवाल ने अपने इस विशेष विश्लेषणात्मक आलेख में अमेरिका के ताज़ा हालात पर करारा प्रहार किया है। उन्होंने बताया है कि कैसे ईरान पर हमला डोनाल्ड ट्रम्प के लिए एक सियासी दलदल बन चुका है। अमेरिका की जनता इस जंग के खिलाफ है। पढ़िए उनका यह बेबाक आलेख:
मुख्य बिंदु
- 28 फरवरी 2026 को अमेरिका का ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ और ईरान के सुप्रीम लीडर की हत्या।
- हमले के बाद अमेरिकी जनता में भारी आक्रोश; सर्वे के अनुसार सिर्फ 27% लोग ही जंग के समर्थन में।
- मिनाब के गर्ल्स स्कूल पर बमबारी से नागरिक मौतों पर उठे सवाल और कंजर्वेटिव खेमे में बढ़ती बेचैनी।
- क्या बिना स्पष्ट योजना और कांग्रेस की मंजूरी के शुरू हुई यह जंग ट्रम्प का ‘वाटरलू’ साबित होगी?
क्या ईरान डोनाल्ड ट्रंप का वाटरलू बनेगा? यह सवाल आज पूरी दुनिया में ज़ोर-शोर से गूंज रहा है। तारीख़ हमेशा इस बात की गवाह रही है। इतिहास को अक्सर ऐसे ही लम्हे बहुत पसंद आते हैं। जब एक बड़ा फैसला लिया जाता है। जब एक बहुत बड़ा और खतरनाक जुआ खेला जाता है। जब अचानक एक भयानक जंग शुरू होती है। और तब जो शासक बिल्कुल अजेय लगता था, वह भी अचानक बहुत कमजोर नज़र आने लगता है। 28 फरवरी 2026 को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बड़ा हुक्म दिया। उन्होंने एक बहुत नाटकीय सैन्य कार्रवाई का सख्त आदेश जारी किया। इस खूनी सैन्य अभियान को ऑपरेशन एपिक फ्यूरी का नाम दिया गया। इस दौरान सब कुछ बहुत तेज़ गति से हुआ। यह हमला बेहद खामोशी से शुरू हुआ। लेकिन इसका अंजाम बहुत ही धमाकेदार अंदाज़ में सामने आया। अमेरिका और इज़राइल की संयुक्त फौजी कार्रवाई ने तबाही मचा दी। उन्होंने ईरान के कई अहम सैन्य ठिकानों को अपना सीधा निशाना बनाया।
खतरनाक मिसाइलें ईरान के कमांड सेंटरों को बुरी तरह चीरती हुई गुज़रीं। लगातार हुए हवाई हमलों ने वहां के बेस और पूरे इन्फ्रास्ट्रक्चर को पूरी तरह तबाह कर दिया। फिर पूरी दुनिया के लिए सबसे बड़ा झटका सामने आया। ईरान के सुप्रीम लीडर अली खमेनेई इन भीषण हमलों में मारे गए। उस समय पूरा मध्य-पूर्व क्षेत्र अपनी सांस रोके खड़ा था। वॉशिंगटन के कुछ सत्ता के गलियारों में जश्न मनाया जा रहा था। जबकि दूसरी तरफ तेहरान की सड़कों पर भयंकर गुस्सा और आग धधक रही थी। देखते ही देखते यह खतरनाक जंग अपने दूसरे हफ्ते में दाखिल हो गई है। व्हाइट हाउस ने अपने इस हिंसक हमले को मजबूत लीडरशिप का नाम दिया। उन्होंने इसे एक बहुत बहादुर कदम बताया। उन्होंने इसे एक बेहद ज़रूरी और अहम कार्रवाई करार दिया। अमेरिकी सरकार का यह पक्का दावा था कि इससे ईरान का न्यूक्लियर प्रोग्राम पूरी तरह कुचल जाएगा। उन्हें शायद यह भी उम्मीद थी कि इससे ईरान की हुकूमत भी पूरी तरह बदल जाएगी।
खुद राष्ट्रपति ट्रम्प का लहजा इस दौरान भारी भरोसे से भरा हुआ था। उन्होंने बड़े गर्व के साथ कहा कि “ताकत के ज़रिए अमन” स्थापित होगा। उनका यह भी कहना था कि यह भारी टकराव “बहुत जल्दी खत्म” हो सकता है। लेकिन ज़मीनी सच्चाई बिल्कुल अलग होती है। जंगें कभी भी किसी राष्ट्रपति की तय की हुई टाइमलाइन नहीं मानती हैं। खासतौर पर मध्य-पूर्व के देशों में तो बिल्कुल भी नहीं। अगर ट्रम्प को लगा था कि इस हमले के बाद अमेरिका में जबरदस्त देशभक्ति की लहर उठेगी। तो असलियत में ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। आज अमेरिका का अंदरूनी माहौल कुछ और ही कहानी बयां कर रहा है। लोगों के अंदर भारी बेचैनी है। हर तरफ गहरा शक है। और आम नागरिकों में एक अजीब सी घबराहट साफ दिखाई दे रही है। अमेरिका के ताज़ा सर्वे इस कड़वी कहानी को बहुत साफ तरीके से बताते हैं। हालात बिल्कुल ट्रम्प की सोच के विपरीत हैं। यह जंग अब अमेरिका के गले की फांस बनती जा रही है।
CNN और SSRS के ताज़ा संयुक्त सर्वे ने सबकी आंखें खोल दी हैं। इस पोल में 59 प्रतिशत अमेरिकियों ने इन सैन्य हमलों को पूरी तरह गलत बताया है। सिर्फ 41 प्रतिशत लोगों ने ही इस कार्रवाई का समर्थन किया है। इसी तरह NPR, PBS और Marist के एक अन्य पोल के आंकड़े भी हैरान करते हैं। उसमें भी 56 प्रतिशत लोग इस फौजी कार्रवाई के बिल्कुल खिलाफ खड़े हैं। केवल 44 प्रतिशत लोग इसके हक में बोलते नज़र आ रहे हैं। रॉयटर्स और इप्सोस का आंकड़ा तो सत्ताधारियों के लिए और भी ज्यादा सख्त है। उनके अनुसार सिर्फ 27 प्रतिशत लोग ही इन हिंसक हमलों का खुला समर्थन कर रहे हैं। यह कोई राष्ट्रीय जोश बिल्कुल नहीं है। बल्कि यह अमेरिकी जनता की एक बहुत बड़ी हिचक है। इन हमलों के बाद खुद ट्रम्प की कुल लोकप्रियता भी भारी मात्रा में गिर गई है। उनकी अप्रूवल रेटिंग गिरकर 40 से 45 प्रतिशत के बीच आ गई है। इसे किसी भी नज़रिए से एक जबरदस्त समर्थन बिल्कुल नहीं कहा जा सकता है।
आज पूरा अमेरिका स्पष्ट रूप से दो अलग-अलग खेमों में बंटा हुआ है। सत्ताधारी रिपब्लिकन पार्टी के करीब 84 प्रतिशत लोग इस हिंसक कार्रवाई के साथ खड़े हैं। इसके बिल्कुल उलट डेमोक्रेट्स में 86 प्रतिशत लोग इसके पूरी तरह खिलाफ हैं। सबसे अहम बात यह है कि देश के इंडिपेंडेंट मतदाता भी ज्यादातर इस हमले के विरोध में हैं। कई अलग-अलग सर्वे में 55 से 59 प्रतिशत लोग इस जंग को आगे बढ़ाने के सख्त खिलाफ दिखते हैं। यह देश की कोई राष्ट्रीय एकता नहीं है। यह समाज में पैदा हुई गहरी ध्रुवीकरण की एक खतरनाक तस्वीर है। और इतिहास गवाह है कि बिना राष्ट्रीय एकता की कोई भी जंग अक्सर एक सियासी दलदल बन जाती है। पुराने समय की जंगों में देश की जनता तुरंत अपने राष्ट्रपति के साथ खड़ी हो जाती थी। 11 सितंबर के दर्दनाक हमलों के बाद अफगानिस्तान युद्ध को जनता का 92 प्रतिशत भारी समर्थन मिला था। इराक युद्ध शुरू होने से पहले भी करीब 72 प्रतिशत लोग सरकार के समर्थन में थे। लेकिन आज हालात बिल्कुल अलग हैं।
आज मुश्किल से अमेरिका का आधा देश भी राष्ट्रपति के साथ नहीं है। कई जगह तो समर्थन का यह आंकड़ा इससे भी बहुत कम है। देश में न कोई बड़ा राष्ट्रीय उबाल है। न ही लोगों में देशभक्ति की कोई लहर है। बस हर तरफ एक गहरी चिंता छाई हुई है। दरअसल अमेरिकियों को पिछली मध्य-पूर्व की पुरानी जंगें आज भी अच्छी तरह याद हैं। वे उन लंबी जंगों का भयानक अंजाम भी जानते हैं। एक और बड़ा सवाल लगातार व्हाइट हाउस का पीछा कर रहा है। आख़िर इस युद्ध का असली प्लान क्या है? कई सर्वे साफ बताते हैं कि आम अमेरिकियों को लगता है कि सरकार के पास कोई साफ योजना ही नहीं है। क्या यह सिर्फ एक सीमित हमला है? क्या यह वहां की सरकार बदलने की कोई साज़िश है? या फिर यह एक और नई अंतहीन जंग की शुरुआत है? वॉशिंगटन प्रशासन अभी तक पूरे भरोसे से इन सवालों का जवाब नहीं दे पाया है। और यह अनिश्चितता हमेशा डर को जन्म देती है।
इसके अलावा अमेरिका में एक और गंभीर मसला संवैधानिक है। अमेरिकी कांग्रेस ने इस हमले को शुरू करने की कोई पूर्व मंजूरी नहीं दी थी। यह एक बहुत अहम और विवादित बात है। ताज़ा सर्वे बताते हैं कि 59 प्रतिशत अमेरिकी मानते हैं कि फौजी कार्रवाई के लिए कांग्रेस की अनुमति लेना बहुत जरूरी होना चाहिए। आलोचकों का सीधा कहना है कि व्हाइट हाउस ने अपनी मनमानी की है और अकेले ही यह बड़ा फैसला लिया है। हर जंग का एक बहुत अंधेरा और खौफनाक पहलू भी होता है। अब ईरान से नागरिकों के हताहत होने की बुरी खबरें लगातार सामने आ रही हैं। एक अमेरिकी हवाई हमले में ईरान के शहर मिनाब में एक लड़कियों का स्कूल भी निशाने पर आ गया। ऐसी दर्दनाक खबरें पूरी दुनिया को झकझोर रही हैं। विदेशों में अमेरिका के खिलाफ भारी नाराज़गी बढ़ी है। और अब खुद अमेरिका के अंदर भी बेहद असहज सवाल उठ रहे हैं। युद्ध कक्षों में बैठे नेताओं के पास सिर्फ लक्ष्य और नक्शे होते हैं। लेकिन ज़मीन पर इंसान और उनकी जान होती है।
इस पूरे मामले का सबसे दिलचस्प असर ट्रम्प के अपने पक्के समर्थक खेमे में भी दिख रहा है। अब कुछ प्रमुख कंज़र्वेटिव आवाज़ें भी बहुत बेचैन हैं। मशहूर टीवी होस्ट टकर कार्लसन ने इस गहरे फौजी दखल से सावधान रहने की स्पष्ट बात कही है। उन्हें भी अब यह डर सता रहा है कि यह कहीं एक और अंतहीन जंग न बन जाए। यहाँ तक कि हमेशा समर्थन करने वाली लौरा इंग्राहम ने भी प्रशासन से नागरिक मौतों पर ज्यादा ईमानदार जवाब मांगा है। ट्रम्प के समर्थकों में ये दरारें अभी छोटी हैं। लेकिन वे साफ तौर पर दिख रही हैं। अमेरिकी राजधानी वॉशिंगटन में सियासी जंग बहुत तेज़ हो गई है। रिपब्लिकन नेता इसे एक बहुत जरूरी कदम बता रहे हैं। उनका तर्क है कि ईरान पूरी दुनिया के लिए एक बड़ा परमाणु खतरा बन चुका था। लेकिन डेमोक्रेट्स की राय इससे बिल्कुल अलग है। वे इसे सिर्फ एक “चुनी हुई जंग” कहते हैं। वे इसे एक खतरनाक बढ़ोतरी मानते हैं। यह बिना किसी साफ वजह के शुरू हुआ एक भयानक संघर्ष है।
आज अमेरिका में यह बहस बहुत तेज़ है। यह बहस बेहद कड़वी है। और यह बहुत जानी-पहचानी भी है। क्योंकि अमेरिका ऐसी बहस पहले भी कई बार देख चुका है। वॉशिंगटन से बाहर अमेरिका के आम शहरों में भी माहौल बुरी तरह उबल रहा है। कई बड़े शहरों में इसके खिलाफ भारी विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। सोशल मीडिया पर यह बहस एक भीषण आग की तरह तेजी से फैल रही है। समर्थकों का कहना है कि ईरान की परमाणु महत्वाकांक्षा ने अमेरिका के पास कोई और रास्ता छोड़ा ही नहीं था। जबकि विरोधियों का साफ कहना है कि देश फिर से इराक वाली पुरानी और घातक गलती दोहरा रहा है। सच शायद हमेशा की तरह उड़ती हुई गोलियों और गिरते हुए बमों के बीच कहीं गहराई में दबा पड़ा है। रणनीति से परे हटकर एक बहुत गहरा इंसानी सवाल खड़ा है। आखिर जंग की असली कीमत क्या होती है? हर मिसाइल दागने के साथ कुछ खौफनाक नतीजे आते हैं। इसमें अमेरिकी सैनिक भारी खतरे में पड़ते हैं। निर्दोष ईरानी नागरिक भयानक तबाही झेलते हैं।
इस जंग से पूरा मध्य-पूर्व इलाका भारी रूप से अस्थिर हो जाता है। ऊपर से की गई बमबारी शायद ही कभी नीचे की नफरत खत्म करती है। अक्सर वह अगली और बड़ी जंग के नए बीज बो देती है। दुनिया का इतिहास इस बात का एक बहुत बेरहम गवाह है। डोनाल्ड ट्रम्प के लिए यह ऑपरेशन एपिक फ्यूरी एक बहुत बड़ा जुआ है। अगर ईरान की सत्ता जल्दी ढह गई, तो वह इसे अपनी ऐतिहासिक जीत बताएंगे। लेकिन अगर यह खूनी जंग लंबी खिंची, तो इसकी सियासी कीमत बहुत भारी हो सकती है। ऐसी लंबी जंगों ने पहले भी कई ताकतवर राष्ट्रपतियों की कुर्सी हिलाई है। और इराक और अफगानिस्तान की डरावनी परछाइयाँ अभी भी अमेरिका की यादों में पूरी तरह जिंदा हैं। इसलिए यह बड़ा सवाल अभी भी हवा में धीरे-धीरे तैर रहा है। पूरी दुनिया इसे भारी बेचैनी के साथ देख रही है। क्या यह ईरान युद्ध ट्रम्प की सबसे बड़ी जीत बनेगी? या फिर यह वही मनहूस पल साबित होगा जिसे इतिहास हमेशा उनका वाटरलू कहेगा?
Pawan Singh
Chief Editor, Taj News
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