गोरखपुर डेस्क, Taj News | Published by: ठाकुर पवन सिंह | Updated: Sunday, 11 Jan 2026 08:05 AM IST
उत्तर प्रदेश से सटी भारत-नेपाल सीमा पर सुरक्षा एजेंसियों की भारी चौकसी के दावों के बीच मादक पदार्थ तस्करों का नेटवर्क खतरनाक रूप से मजबूत हो रहा है। खुली सीमा और भौगोलिक स्थिति का फायदा उठाकर तस्कर अब मुख्य रास्तों के बजाय पगडंडियों और कच्चे रास्तों से ‘सफेद जहर’ (ड्रग्स) की खेप उत्तर प्रदेश के जिलों में पहुंचा रहे हैं। ताजा आंकड़ों के अनुसार, महराजगंज, सिद्धार्थनगर और बहराइच जैसे सीमावर्ती जिलों में हर साल बड़ी मात्रा में बरामदगी के बावजूद तस्करी के सिंडिकेट को जड़ से उखाड़ने में एजेंसियां अब तक सफल नहीं हो सकी हैं।

आंकड़े दे रहे गवाही: कार्रवाई के बाद भी नेटवर्क सक्रिय
सीमावर्ती जिलों से मिली जानकारी के अनुसार, तस्करी रोकने के लिए पुलिस और एसएसबी (SSB) लगातार अभियान चला रहे हैं, लेकिन नतीजे चिंताजनक हैं।
- महराजगंज: वर्ष 2025 में 30 मामले दर्ज हुए और 40 आरोपी सलाखों के पीछे गए।
- सिद्धार्थनगर: 30 एनडीपीएस मामलों में 38 तस्करों की गिरफ्तारी हुई।
- बहराइच: यहाँ सबसे अधिक 48 मामलों में 53 आरोपियों को पकड़ा गया। इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि गिरफ्तारी के बावजूद तस्करी का काला कारोबार थमने का नाम नहीं ले रहा है। हाल ही में अररिया और किशनगंज सीमा पर भी भारी मात्रा में गांजा और मॉर्फिन की बरामदगी हुई है, जो इस नेटवर्क के व्यापक विस्तार को दर्शाती है।
पगडंडियों का सहारा ले रहे ‘मौत के सौदागर’
सुरक्षा एजेंसियों की जांच में यह चौंकाने वाला तथ्य सामने आया है कि तस्कर अब मुख्य सड़कों और सीसीटीवी कैमरों वाले चेक पोस्ट से पूरी तरह बच रहे हैं। वे सीमावर्ती गांवों के बीच मौजूद कच्चे रास्तों, घने जंगलों और नदी के किनारे बनी पगडंडियों का इस्तेमाल करते हैं। इन गुप्त रास्तों पर न तो कोई स्थायी चौकी है और न ही तकनीकी निगरानी की व्यवस्था। तस्कर रात के अंधेरे का फायदा उठाकर आसानी से हेरोइन, चरस और स्मैक की खेप भारतीय सीमा में दाखिल कर देते हैं।
सरगना तक नहीं पहुँच पा रहे कानून के हाथ
सीमा पर तैनात एजेंसियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि पकड़ में आने वाले अधिकतर लोग केवल ‘कैरियर’ (सामान पहुँचाने वाले) होते हैं, जिन्हें कुछ हजार रुपयों का लालच दिया जाता है। इस काले धंधे के असली मास्टरमाइंड नेपाल और भारत के बड़े शहरों में सुरक्षित बैठे हैं। जानकारों का मानना है कि जब तक इन बड़े सिंडिकेट्स के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ठोस रणनीति नहीं बनेगी, तब तक केवल छोटी बरामदगी से इस पर लगाम लगाना नामुमकिन है।
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