Brij Khandelwal Writer Social Media Ban Taj News Editorial

Why not? क्या भारत को 16 साल से कम उम्र वालों के लिए सोशल मीडिया बैन कर देना चाहिए? या अभी और शव यात्राओं का इंतजार करें?

ओपिनियन

Edited by: Thakur Pawan Singh | Written by: Brij Khandelwal | tajnews.in | 24 Feb 2026, 01:15 pm IST

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Taj News Opinion Desk

विशेष संपादकीय लेख

Brij Khandelwal Writer

बृज खंडेलवाल

वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक

दुनिया भर में बच्चों पर सोशल मीडिया के पड़ रहे जानलेवा प्रभाव और लगातार हो रहे हादसों पर वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक बृज खंडेलवाल ने गंभीर सवाल खड़े किए हैं। उनका मानना है कि जब ऑस्ट्रेलिया और यूरोप जैसे देश 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया बैन कर सकते हैं, तो भारत क्यों पीछे है? प्रस्तुत है उनका यह विचारोत्तेजक लेख, उन्हीं के शब्दों में:

क्या भारत को 16 साल से कम उम्र वालों के लिए सोशल मीडिया बैन कर देना चाहिए?

एक “लाइक” के लिए कितने और बच्चे मरने चाहिए? यह सवाल दिल दहला देने वाला है। लेकिन भारत को इसका सामना करना ही पड़ेगा। हम इस कड़वी सच्चाई से मुँह नहीं मोड़ सकते कि हमारे बच्चों के हाथों में मौजूद स्मार्टफोन अब एक खतरनाक हथियार बन चुका है।

दुनिया भर में हुकूमतें जाग रही हैं। उन्हें समझ आ गया है कि टेक कंपनियों के मुनाफे की कीमत उनके देश का भविष्य चुका रहा है। ऑस्ट्रेलिया ने पूरे देश में 16 साल से कम उम्र वालों पर सोशल मीडिया बैन लगा दिया है। वहां बच्चों के अकाउंट्स डीएक्टिवेट किए जा रहे हैं और बड़े-बड़े प्लेटफॉर्म्स को सख्त चेतावनी दे दी गई है। न्यूजीलैंड भी ठीक ऐसा ही कानून ला रहा है, ताकि बचपन को इन डिजिटल बेड़ियों से आज़ाद किया जा सके।

जर्मनी में सीडीयू (CDU) पार्टी ने 14 साल की न्यूनतम उम्र का प्रस्ताव दिया है, और वह भी सख्त उम्र वेरिफिकेशन के साथ। सीडीयू का प्रस्ताव एक मजबूत राष्ट्रीय और यूरोपीय कानून चाहता है, जो मजबूत डेटा प्रोटेक्शन वाले ‘एज वेरिफिकेशन सिस्टम’ (Age Verification System) लागू करे। यह सिर्फ खुद की घोषणा (Self-declaration) से आगे की बात है, जहां बच्चे अपनी उम्र बढ़ाकर आसानी से अकाउंट बना लेते हैं। इस प्रस्ताव में साफ कहा गया है कि नियम न मानने वाली कंपनियों पर भारी जुर्माना लगे। साथ ही, पूरे यूरोप में एक जैसी उम्र की स्टैंडर्ड्स लाने को कहा गया है, ताकि कोई लूपहोल्स (Loopholes) न रहें। इसके अलावा, पार्टी स्कूलों में डिजिटल लिटरेसी एजुकेशन पर भी ज़ोर देती है— अल्गोरिदम कैसे काम करता है, साइबरबुलिंग क्या है और ऑनलाइन साजिशों के बारे में बच्चों को सिखाना। पैरेंट्स और कम्युनिटी को भी इसमें शुमार किया जाए, ताकि यह एक सामूहिक लड़ाई बन सके।

सिर्फ इतना ही नहीं, फ्रांस, डेनमार्क, स्पेन और ब्रिटेन भी बच्चों को बचाने के लिए टेक कंपनियों पर लगातार सख्ती बढ़ा रहे हैं। वहां की सरकारें अब टेक जायंट्स (Tech Giants) के दबाव में झुकने को तैयार नहीं हैं।

और भारत? हम क्या कर रहे हैं? हम सिर्फ स्क्रीन स्क्रॉल करते हैं। टीवी डिबेट्स में बहस करते हैं। किसी भी कड़े फैसले को कल पर टालते हैं। इधर हमारी खामोशी के बीच, रील्स लगातार घूमती रहती हैं। सोशल मीडिया का अल्गोरिदम हमारे बच्चों का शिकार करता रहता है। बचपन पूरी तरह से खतरे में पड़ रहा है।

हमें अब ये नाटक बंद कर देना चाहिए कि ये सोशल मीडिया महज एक एंटरटेनमेंट या टाइमपास है। सोशल मीडिया कोई खेल का मैदान नहीं है। ये अरबों डॉलर छापने वाली एक ‘मुनाफे की मशीन’ है। इसका अल्गोरिदम इस तरह से डिजाइन किया गया है कि यह खतरे को इनाम देता है। जो जितना खतरनाक है, वह उतना ही वायरल हो जाता है। डिजिटल दुनिया में ‘सावधानी’ कभी ट्रेंड नहीं करती, बल्कि ‘पागलपन’ ट्रेंड करता है।

अमेरिका में कई टीनएजर्स ‘वायरल चैलेंज’ (Viral Challenges) करते हुए मरे हैं। कोई एक स्पीडिंग गाड़ी के पीछे फोल्डिंग टेबल पर लटका पाया गया, तो कोई दूसरा मूविंग कार के ट्रंक से गिरकर अपनी जान गंवा बैठा। और यह सब किसके लिए? चंद views के लिए। खोखली डिजिटल तालियों के लिए। “ब्लैकआउट चैलेंज” ने 12 साल से छोटे कई मासूम बच्चों की जान ले ली। बच्चे खुद को गला दबाकर अजनबियों को इम्प्रेस करने की कोशिश में मौत की नींद सो गए। ये कैसा इनोवेशन है? या फिर यह एक दिमागी पागलपन है?

भारत को भी इन हादसों से कोई छूट नहीं मिली है। मध्य प्रदेश में एक जवान 50 फीट की ऊंचाई से गिर गया, क्योंकि वह “गोल्डन ऑवर” की परफेक्ट रील बना रहा था। मुंबई में एक मशहूर इन्फ्लुएंसर खाई में जा गिरा सिर्फ इसलिए क्योंकि उसे ‘एडवेंचरस कंटेंट’ क्रिएट करना था। एक और युवा ने सोशल मीडिया पर देखकर फायर स्टंट (Fire Stunt) ट्राई किया और वह बुरी तरीके से झुलस गया।

याद रखिए, ये सिर्फ कुछ अलग-थलग हादसे नहीं हैं। ये एक ‘डिजिटल डेयरडेविलरी’ (Digital Daredevilry) का पूरा कल्चर बन चुका है। और सबसे डराने वाली बात यह है कि हमारे बच्चे इस पूरे इकोसिस्टम की सबसे कमजोर कड़ी हैं।

आजकल ‘साइबरबुलिंग’ (Cyberbullying) एक ऐसा जहर बन चुका है, जो बेहद क्रूर है और लगातार फैल रहा है। पहले स्कूल में बुलींग होती थी, तो स्कूल की घंटी बजते ही बच्चा घर आकर सुरक्षित हो जाता था। लेकिन अब स्कूल की घंटी इसे नहीं रोकती। क्लासरूम की दीवारें इस जहर को घर तक पहुंचने से नहीं रोक पातीं। 24 घंटे फोन के जरिए बच्चों को मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जाता है।

कई स्टडीज साफ तौर पर कहती हैं कि साइबरबुलिंग के शिकार बच्चे आम बच्चों के मुकाबले दो गुना ज्यादा सुसाइड (Suicide) ट्राई करते हैं। ज्यादा सोशल मीडिया यूज का सीधा लिंक उदासी, बेबसी और ‘सेल्फ-हॉर्म’ (खुद को नुकसान पहुंचाने) से है। आज एक टीनएजर के हाथ में पकड़ा हुआ स्मार्ट फोन एक घातक हथियार बन जाता है। एक ऐसा हथियार जो गुमनाम है। बेहद बेरहम है। और जो nonstop वार करता है।

इंटरनेट का एक और काला सच ‘सेक्सटॉर्शन गैंग्स’ (Sextortion Gangs) हैं, जो 13-14 साल के मासूम लड़कों और लड़कियों को फंसाते हैं। ऑनलाइन शिकारी (Online Predators) वीडियो गेम्स और चैट्स के जरिए बच्चों से दोस्ती करते हैं और उन्हें अपने जाल में फंसाते हैं। कई हिंसक और चरमपंथी ग्रुप्स ऐसे ही माइनर्स को डार्क नेटवर्क में भर्ती करते हैं, क्योंकि बच्चों का ब्रेनवॉश करना सबसे आसान होता है।

ग्लोबल पुलिस रिपोर्ट्स में ऐसे हजारों केस दर्ज हैं। मासूम बच्चों को ब्लैकमेल करके उन्हें ‘सेल्फ-हॉर्म’ पर मजबूर किया जाता है। उन्हें डिप्रेशन और अंततः सुसाइड तक धकेल दिया जाता है। फिर भी हम सीना तानकर कहते हैं, “डिजिटल इंडिया को बढ़ना चाहिए।” हां, बिल्कुल बढ़ना चाहिए। टेक्नोलॉजी देश के विकास के लिए जरूरी है। लेकिन एक बड़ा सवाल यह है कि हमारे छोटे बच्चे इसका भारी नुकसान क्यों झेलें?

वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन (WHO) के ताजा आंकड़े बताते हैं कि 11% एडोलसेंट्स (किशोरों) में सोशल मीडिया का अत्यधिक और खतरनाक यूज साफ दिखता है। लत जैसी आदतें, रातों की नींद खराब होना, स्कूलों में ग्रेड्स गिरना, एंग्जायटी (Anxiety) और डिप्रेशन— यह सब आम हो गया है। 2010 से, जब से स्मार्टफोन और सोशल मीडिया का दायरा बढ़ा है, दुनिया भर के टीनएजर्स में डिप्रेशन का ग्राफ भी बहुत तेजी से ऊपर गया है। क्या यह सिर्फ एक कनेक्शन है? महज एक संयोग है? या फिर एक सीधा नतीजा है?

भारत जैसे देश में, जहां मेंटल हेल्थ सिस्टम (Mental Health System) पहले ही बहुत कमजोर है और मानसिक बीमारियों पर खुलकर बात करने में झिझक है, क्या हम सच में ये खामोश महामारी झेल सकते हैं? ईमानदारी से कहें तो आज हर घर में पैरेंट्स परेशान हैं। स्कूल इस डिजिटल खतरे से निपटने के लिए तैयार नहीं हैं। और सबसे बड़ी बात, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स बिलकुल भी जवाबदेह नहीं हैं। उम्र की जो भी लिमिट (Age limit) है, वह सिर्फ कागज पर है। 10 साल के बच्चे सेकंड्स में गलत जन्मतिथि डालकर इस सिक्योरिटी को बायपास (Bypass) कर देते हैं।

अगर हमारे देश में शराब पीने और गाड़ी चलाने (Driving) पर सख्त उम्र की पाबंदी (Age restriction) है, तो बच्चों का पूरा ‘अटेंशन हाईजैक’ (Attention Hijack) करने वाले इन डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर ऐसी पाबंदी क्यों नहीं होनी चाहिए?

सोशल मीडिया बैन के खिलाफ अक्सर वही पुरानी बहस सुनने को मिलती है: “बच्चों को फ्यूचर के लिए डिजिटल स्किल्स चाहिए।” “बैन लगाने से बच्चे अंडरग्राउंड या डार्क वेब पर चले जाएंगे।” “ऐसे कानूनों का एनफोर्समेंट (लागू करना) बहुत मुश्किल है।”

हां, ये सब मुश्किल है। लेकिन ‘मुश्किल’ होना कभी भी inaction (कुछ न करने) का बहाना नहीं हो सकता। ऑस्ट्रेलिया ने मजबूत एक्शन लिया। जर्मनी कड़े वेरिफिकेशन और भारी फाइन की मांग कर रहा है। यूरोपियन देश सारे लूपहोल्स बंद करने के लिए एकजुट हो रहे हैं। फिर भारत क्यों पीछे खड़ा है?

हम अक्सर ‘डेमोग्राफिक डिविडेंड’ (Demographic Dividend) यानी युवा आबादी की ताकत की बात करते हैं। लेकिन याद रखिए, उस डिविडेंड का फायदा उठाने के लिए एक हेल्दी और शांत दिमाग चाहिए। हम यंग इनोवेटर्स को सेलिब्रेट करते हैं, लेकिन इनोवेशन (Innovation) के लिए एक गहरा फोकस चाहिए, न कि सेकंड-सेकंड में टूटते अटेंशन स्पैन वाली पीढ़ी। यह कोई ‘टेक्नोफोबिया’ (तकनीक से डर) नहीं है। यह सही टाइमिंग की बात है। 16 साल से कम की उम्र बेहद फॉर्मेटिव (बदलाव वाली) होती है। इस उम्र में इंपल्स कंट्रोल (संवेगों पर नियंत्रण) अभी बन रहा होता है। बच्चों की आइडेंटिटी नाजुक होती है और पीयर प्रेशर (दोस्तों का दबाव) बहुत तीव्र होता है। क्या हम अपने बच्चों के उन कोमल दिमागों को सिलिकॉन वैली (Silicon Valley) के मुनाफे वाले अल्गोरिदम को शेप करने देंगे?

भारत में भी एक ‘कैलिब्रेटेड अप्रोच’ (Calibrated approach) मुमकिन है। प्लेटफॉर्म्स पर सख्त उम्र वेरिफिकेशन लागू हो। नियम तोड़ने वाली कंपनियों पर भारी सजा और फाइन का प्रावधान हो। स्कूलों में ‘डिजिटल लिटरेसी’ अनिवार्य की जाए, जहां बच्चों को अल्गोरिदम की चालाकी, मैनिपुलेशन और साइबरबुलिंग से बचना सिखाया जाए। पैरेंट्स के लिए अवेयरनेस प्रोग्राम चलाए जाएं। ग्रेजुअल एक्सेस (धीरे-धीरे पहुंच) और सेफगार्ड्स (सुरक्षा उपाय) के साथ ही बच्चों को इंटरनेट दिया जाए।

लेकिन यह सच्चाई है कि बिना किसी ‘फर्म लीगल बॉउंड्री’ (ठोस कानूनी सीमा) के, सब कुछ सिर्फ एक एडवाइजरी (सलाह) बनकर रह जाता है। और एक साधारण एडवाइजरी इन बिलियन डॉलर टेक जायंट्स (Tech giants) के सामने हमेशा कमजोर ही पड़ जाती है।

भारत ने एक समय ‘नेशनल सिक्योरिटी’ (National Security) के नाम पर चाइनीज ऐप्स को रातोंरात बैन करने का साहस दिखाया था। तो क्या आज हम अपने मासूम बच्चों की सिक्योरिटी के लिए कड़े कदम नहीं उठा सकते? सवाल बहुत साफ और सीधा है— क्या हम विदेशी कंपनियों का प्रॉफिट बचाएंगे? या अपने बच्चों का भविष्य?

भारत में 16 साल से कम उम्र के बच्चों पर सोशल मीडिया पूरी तरह रेस्ट्रिक्ट (Restrict) होना चाहिए। यह नियम सख्त हो। क्लियर हो। और पूरी तरह से कानूनी हो। क्योंकि हमारे सामने घट रही हर वायरल ट्रेजडी (हादसा) एक चेतावनी है। हर साइबरबुलिंग से हुआ सुसाइड एक चीख है। और हर सेक्सटॉर्शन केस हमारे समाज के माथे पर एक गहरा दाग है।

अब हमें जागने के लिए और कितने शव यात्राओं और अलर्ट्स का इंतज़ार है?

Thakur Pawan Singh

Thakur Pawan Singh

Chief Editor, Taj News

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