कागज़ी शेर बना ‘नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल’ (NGT): इरादा नेक था, लेकिन हिम्मत आधी थी!

आर्टिकल Desk | tajnews.in | Friday, April 03, 2026, 05:15:00 AM IST

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विशेष पर्यावरण और न्याय विमर्श
Brij Khandelwal Writer
बृज खंडेलवाल
वरिष्ठ पत्रकार एवं पर्यावरणविद्
वरिष्ठ पत्रकार बृज खंडेलवाल ने अपने इस बेहद मारक आलेख में ‘नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल’ (NGT) को एक बिना दाँतों वाला ‘कागज़ी शेर’ करार दिया है। उन्होंने बताया है कि कैसे 16 साल पहले बनी यह संस्था आज सिर्फ सुर्खियां बटोरने तक सीमित रह गई है। इसके अलावा, उन्होंने दिल्ली प्रदूषण से लेकर गंगा-यमुना की बदहाली पर भी एनजीटी (NGT) के खोखले आदेशों की पूरी पोल खोल दी है। पढ़िए यह विचारोत्तेजक आलेख:

मुख्य बिंदु

  • 2010 में पर्यावरण को अदालत में पहली प्राथमिकता देने के बड़े वादे के साथ NGT की शानदार शुरुआत हुई थी।
  • लेकिन, आज NGT सिर्फ सुर्खियां बटोरता है, क्योंकि इसके कागज़ी फैसलों को ज़मीन पर लागू करने वाली ताकत पूरी तरह नदारद है।
  • NGT की सबसे बड़ी दरार इसकी ‘स्वतंत्रता की कमी’ है; जिस मंत्रालय पर इसे कड़ी नज़र रखनी है, वही इसे पैसा और स्टाफ देता है।
  • दिल्ली का बढ़ता वायु प्रदूषण, यमुना की भयानक गंदगी और अवैध खनन जैसे मामलों में अंततः सुप्रीम कोर्ट को ही सख्त दखल देना पड़ता है।

आए दिन धमकी दी जाती है, NGT में शिकायत कर देंगे, मुकद्दमा दर्ज होता है, मीडिया कवरेज होती है, ऑर्डर भी हो जाता है, फिर क्या होता है?

हवा घुट रही है। नदियाँ सड़ रही हैं।कचरे के पहाड़ शहरों को निगल रहे हैं। और सवाल सीधा है; न्याय कहाँ है?
2010 में एक सपना बेचा गया था। नाम: नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल। कहा गया, अब पर्यावरण को अदालत में प्राथमिकता मिलेगी। तेज फैसले होंगे।विशेषज्ञ बैठेंगे। कागज़ नहीं, न्याय दौड़ेगा。
यह संस्था उम्मीद का चेहरा बनकर आई थी। लोगों ने सोचा, अब पेड़ों की भी सुनवाई होगी, नदियों को भी आवाज मिलेगी。
लेकिन आज तस्वीर उलटी है。
सोलह साल बाद NGT एक सबक बन चुका है: अच्छी नीयत, कमजोर व्यवस्था में कैसे दम तोड़ देती है。

सबसे बड़ी दरार इसकी आत्मा में है, स्वतंत्रता की कमी। जिस मंत्रालय पर इसे नजर रखनी है, वही इसे पैसा देता है, वही स्टाफ देता है। नियुक्तियाँ भी वहीं से。
नतीजा? निगरानी कम, नज़दीकी ज़्यादा। 2017 के बदलावों ने इसे और कमजोर किया। रीढ़ थी, अब झुक चुकी है。
दूसरी चोट: संसाधनों की कमी。
जज नहीं। विशेषज्ञ नहीं। बेंच बंद。
चेन्नई और कोलकाता जैसे शहर ठंडे पड़ गए। दूर बैठे लोग क्या करें?
दिल्ली आएँ। वक्त गंवाएँ। पैसा झोंकें。
न्याय अब भी दूर। नियम भी अजीब हैं। छह महीने में शिकायत करो, वरना दरवाज़ा बंद。
पर्यावरण का जख्म धीरे-धीरे दिखता है। जब तक दिखे, न्याय का समय निकल चुका होता है。

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फैसलों की हालत भी अजीब है。
कभी बहुत सख्त। कभी बेहद नरम।कभी व्यक्ति-आधारित। कभी हद से आगे。
भरोसा टूटता है। मुआवजे का खेल और भी धुंधला है। वैज्ञानिक आधार कमजोर। पैसा तय होता है, पर सही जगह नहीं पहुँचता。
पर्यावरण राहत कोष तक रकम कम ही जाती है। बीच में ही रास्ता बदल जाता है। प्रक्रिया भी कटघरे में है。
सुप्रीम कोर्ट तक कह चुका है: प्राकृतिक न्याय का पालन नहीं हो रहा। यहाँ फैसले अक्सर समितियों को सौंप दिए जाते हैं। रिपोर्टें आती हैं।पीड़ित गायब रहते हैं。

सबसे बड़ा सवाल: फैसलों को लागू कौन करेगा?
NGT आदेश देता है। सुर्खियाँ बनती हैं। तालियाँ बजती हैं। फाइल बंद।जमीन पर? कुछ नहीं बदलता。
याद करें कुछ महत्वपूर्ण मसले:
दिल्ली वायु प्रदूषण संकट: निर्माण, वाहनों और पराली जलाने पर प्रतिबंध से PM2.5 में थोड़ी कमी आई, लेकिन दिवाली के बाद प्रदूषण फिर बढ़ जाता है। सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप से ही कुछ सुधार हुआ है。
गंगा नदी प्रदूषण: दशकों से प्रदूषण रोकने के नियम और कानपुर में चमड़ा कारखाने बंद करने के बावजूद विषैले पदार्थ और मल-जनित बैक्टीरिया नहीं रुके। नदी की हालत लगातार खराब हो रही है。
यमुना प्रदूषण और अतिक्रमण: नालों, कचरे और ‘आर्ट ऑफ लिविंग’ जैसे आयोजनों पर जुर्माने से भी यमुना साफ नहीं हो पाई। अदालती दबाव ही एकमात्र उम्मीद है。
देशभर में ठोस कचरा प्रबंधन की विफलता: बिहार और शहरी लैंडफिल में कचरा निपटान के नियमों के बावजूद कचरे का ढेर लगातार बढ़ रहा है。
जलवायु परिवर्तन याचिका (ऋधिमा पांडे, 2019) की खारिजी: एनजीटी ने बच्ची की याचिका को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि कानून पर्याप्त हैं, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इसे पुनर्जीवित किया。
अवैध खनन और रेत निकासी: उत्तर प्रदेश और राजस्थान में प्रतिबंध के बाद भी नदियों का कटाव नहीं रुका। सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद ही कुछ पालन हुआ。
औद्योगिक मामलों में प्रक्रियागत अतिक्रमण: ग्रासिम और सिंगरौली संयंत्र मामलों में एनजीटी के आदेशों को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज किया。
ग्रेट निकोबार परियोजना: एनजीटी ने वनों, मूंगों, जनजातियों के जोखिम के बावजूद रणनीतिक जरूरतों के नाम पर परियोजना को मंजूरी दे दी。
मुआवजा राशि का उपयोग न होना: प्रदूषण और खनन मामलों में अरबों रुपये की मुआवजा राशि राहत कोष में डाले बिना गलत तरीके से खर्च हो जाती है。
पदों के खाली होने से कामकाज ठप: एनजीटी में बेंचों के खाली होने और देरी के कारण वादियों को दिल्ली जाना पड़ता है, जिससे समयबद्ध मामले अटक जाते हैं। कुछ दिन राहत। फिर वही ज़हर। आख़िर में सुप्रीम कोर्ट की सख्ती ही काम करती है。

सच साफ है。
NGT सुर्खियाँ बनाने में माहिर है। पर अमल में कमजोर। यह अदालत फाइलों में तेज है, जमीन पर बेअसर।पर्यावरण की हालत बिगड़ती गई। हवा जहरीली। नदियाँ बीमार। कचरा बेलगाम। और असली पहरेदार कौन बना?
सुप्रीम कोर्ट。
NGT? एक कागज़ी शेर。

अब भी वक्त है। इसे आज़ाद करना होगा। सरकारी पकड़ से निकालना होगा। खाली पद भरने होंगे। फैसलों को लागू करने की ताकत देनी होगी।कानूनी दायरा बढ़ाना होगा。
वरना यह संस्था इतिहास में एक पंक्ति बनकर रह जाएगी; “इरादा नेक था, लेकिन हिम्मत आधी थी।”और तब तक; हम वही हवा सांस में भरते रहेंगे,
जिसमें सिर्फ धुआँ नहीं, न्याय भी घुट रहा है。

Pawan Singh

Pawan Singh

Chief Editor, Taj News
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