Brij Khandelwal satirical article on modern Indian weddings, love marriage and event management show off

शादी का नया रंगमंच: पहले बस में बारात, अब कारों की कतार… प्यार का परचम या सिर्फ पैकेज की परेड?

आर्टिकल

Edited by: Pawan Singh | tajnews.in | Agra | 16 Mar 2026, 05:25 am IST

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Taj News Lifestyle Desk

विशेष सामाजिक व्यंग्य

Brij Khandelwal Writer

बृज खंडेलवाल

वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक

वरिष्ठ पत्रकार और लेखक बृज खंडेलवाल ने अपने इस बेहद दिलचस्प और विचारोत्तेजक व्यंग्य में ‘आधुनिक शादियों’ और ‘लव मैरिज’ के खोखले दिखावे पर कड़ा प्रहार किया है। उन्होंने बताया है कि कैसे कभी समाज से बगावत करने वाला ‘इश्क’ आज महज़ एक महंगा ‘इवेंट मैनेजमेंट’ बनकर रह गया है। पढ़िए यह शानदार आलेख:

मुख्य बिंदु

  • बगावत वाली पुरानी ‘लव मैरिज’ बनाम आज की महंगी ‘मैरिज ऑफ कन्वीनियंस’ (सुविधा की शादी)।
  • शादियों में बसों की जगह कारों की कतार और डीजे, ड्रोन, प्री-वेडिंग शूट का नया महंगा शौक।
  • दहेज का नया रूप ‘गिफ्ट्स’ और दिखावे वाली रस्मों के आगे घुटने टेकती आधुनिक मोहब्बत।
  • क्या आधुनिक शादियों में प्यार कम और इवेंट मैनेजमेंट ज्यादा हो गया है?

कभी हमारे समाज में सच्ची मोहब्बत एक बहुत बड़ी बगावत हुआ करती थी। इसमें घर वालों से सीधी लड़ाई होती थी। समाज के पुराने ठेकेदारों से खुला टकराव होता था। उस समय का प्रेमी जोड़ा बिल्कुल फिल्मी अंदाज़ में कहता था: “प्यार किया तो डरना क्या!” उस दौर में लड़का-लड़की घर से भाग कर छुपते-छुपाते शादी कर लेते थे। कोर्ट में बस दो गवाह होते थे। या फिर किसी आर्य समाज मंदिर में जल्दी-जल्दी सात फेरे हो जाते थे। उस शादी में ना कोई बैंड बजता था, ना बाजा होता था और ना ही कोई बड़ी बारात आती थी। वहाँ बस दो सच्चे दिलों की एक पक्की जिद होती थी। इस बगावत के बाद मां-बाप सालों तक रूठे रहते थे। पूरे मोहल्ले में कई महीनों तक कानाफूसी चलती रहती थी। पर उस दौर के इश्क में एक अलग ही आग होती थी। उस मोहब्बत में एक सच्ची दीवानगी होती थी। लेकिन आज इस आधुनिक समाज में वह पूरी तस्वीर बदल गई है।

आजकल का इश्क ऑफिस में एक साथ काम करने से शुरू होता है। फिर कॉफी डेट पर बातें होती हैं। वीकेंड पर रोमांटिक ट्रिप होते हैं। और इंस्टाग्राम पर खूबसूरत स्टोरी लगाई जाती हैं। धीरे-धीरे यह इश्क भी आज एक पूरा “पैकेज” बन गया है। दोनों की अच्छी और मोटी तनख्वाह होती है। दोनों का एक स्मार्ट और महंगा लाइफस्टाइल होता है। इस आधुनिक प्यार में जाति-भाषा की पुरानी दीवारें भी कहीं-कहीं ढहती हुई नजर आती हैं। इसे देखने में ऐसा लगता है कि जैसे आधुनिक मोहब्बत ने रूढ़िवादी समाज को पूरी तरह मात दे दी है। पर इस पूरी कहानी का असली ट्विस्ट तो शादी के दिन ही आता है। उस दिन फिर वही पुरानी पटकथा दोहराई जाती है। वही शोर-शराबे वाला बैंड-बाजा। वही महंगी डेस्टिनेशन वेडिंग। वही फूहड़ डांस, बहती हुई दारू, कान फोड़ू डीजे और आसमान में उड़ता ड्रोन कैमरा।

आजकल लोग दहेज का नाम नहीं लेते हैं, लेकिन उसकी जगह “गिफ्ट्स” ने ले ली है। सीधा लेन-देन नहीं होता, तो उसे “कस्टम” या रस्म का नाम दे दिया जाता है। वही भारी-भरकम गहने-जेवर, झूठा दिखावा और फालतू रस्मों की एक बहुत लंबी फेहरिस्त सामने आ जाती है। जो युवा कभी प्यार के नाम पर समाज से बड़ी बगावत करते थे। आज शादी के दिन वही युवा उस रूढ़िवादी समाज के सबसे आज्ञाकारी छात्र बन जाते हैं। उनकी मोहब्बत की वह सारी बड़ी-बड़ी क्रांति शादी के सजे हुए मंडप में परंपरा के सामने घुटने टेक देती है। कहने को तो यह आज की ‘लव मैरिज’ है। लेकिन असल में यह सिर्फ एक “मैरिज ऑफ कन्वीनियंस” यानी सुविधा की शादी बनकर रह गई है। पहले के समय में परिवार हुक्म देता था और बच्चे चुपचाप मानते थे। अब इस नए दौर में बच्चे खुद फैसला करते हैं और परिवार सिर्फ ताली बजाता है। दोनों में फर्क बस इतना ही है: पहले के इश्क में एक आग थी। आज के इश्क में सिर्फ एक महंगा इवेंट मैनेजमेंट है। और आज की यह आधुनिक मोहब्बत कभी-कभी बस एक खूबसूरत बहाना सी लगती है।

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भारत में शादी कभी भी सिर्फ दो लोगों का निजी मिलन नहीं रही है। यह हमेशा से एक बहुत बड़ा सामाजिक मेला हुआ करती थी। इस मेले में पूरा गाँव शामिल होता था। पूरा मोहल्ला इकट्ठा होता था और सारे रिश्तेदार जुटते थे। आज भी शादी एक मेला ही है। लेकिन अब इस मेले के असली रंग पूरी तरह बदल गए हैं। ढोल तो आज भी वही है, बस अब उसकी तान बिल्कुल बदल गई है। पुरानी शादी और आज की आधुनिक शादी में सचमुच जमीन और आसमान का एक बड़ा फर्क आ गया है। जैसा हमारे बुजुर्ग अक्सर कहते थे: “समय बड़ा बलवान होता है।” इस बदलते समय के साथ हमारी शादियों ने भी अपना पूरा रंग ही बदल लिया है। पहले जब बारात निकलती थी, तो पूरे परिवार के लिए एक बस ही काफी होती थी। वह बस क्या होती थी, वह तो एक चलता-फिरता घर हुआ करती थी। उस बस की सीटों पर लोग बैठे होते थे। गैलरी में लोग खड़े होते थे। और कभी-कभी तो मजे के लिए छत पर भी लोग बैठ जाते थे। हमारे बुजुर्ग मज़ाक में कहते थे: “अरे भाई! जितने लोग इस बस में ठुंस कर आ जाएँ, बस उतने ही हमारे सच्चे रिश्तेदार हैं!”

उस बस के सफर में रास्ते भर नाश्ता चलता रहता था। लंबी-लंबी अंताक्षरी के मज़ेदार दौर चलते थे। कभी-कभी किसी छोटी सी बात पर फूफाजी रूठ कर बैठ जाते थे। और कभी-कभी शादी कराने वाले पंडितजी ही मंडप में देर से पहुँचते थे। उस समय दूल्हे के लिए अलग से एक छोटी सी सजी हुई कार होती थी। बस वही उस समय की सबसे बड़ी शान मानी जाती थी। बाकी पूरी बस तो रिश्तेदारी और गहरी दोस्ती का एक जीता-जागता प्रतीक लगती थी। ऐसा लगता था जैसे उस बस में कोई मशहूर फिल्मी गीत बज रहा हो: “ये दोस्ती हम नहीं तोड़ेंगे…” वह बारात जब पहुँचती थी, तो किसी धर्मशाला या बगीची में रुकती थी। लड़की वालों का पूरा कुटुंब उनकी आवभगत में जी-जान से लग जाता था। औरतें मंगल गीत गाती थीं। और मज़े के लिए गालियाँ भी बजती थीं। वह सब कुछ हमारी वही पुरानी और मीठी देसी रस्मों का हिस्सा था। कहीं कोने में ताश की लंबी बाज़ी लगती थी। तो कहीं भांग और ठंडाई का शानदार दौर चलता था। और फिर शादी के उन मज़ेदार किस्सों को सालों तक पूरे परिवार में सुनाया जाता था।

लेकिन आज यह पूरी तस्वीर ही उलट गई है। एक बस में जाने का वह पुराना जमाना अब हमेशा के लिए चला गया है। अब शादियों में महंगी कारों की एक लंबी कतार लगती है। सब लोग एक ही रंग की और एक जैसी गाड़ियाँ चाहते हैं। दूल्हे की कार हमेशा सबसे अलग और चमकीली होनी चाहिए। कहीं-कहीं तो रईसी दिखाने के लिए हेलीकॉप्टर से एंट्री भी होने लगी है। आज के फोटोग्राफरों का एक अलग ही उत्साह देखने को मिलता है। उन्हें शादी का हर पल कैमरे में कैद करना होता है। यह सब देखकर ऐसा लगता है जैसे यह कोई सच्ची शादी नहीं, बल्कि किसी लाइव फिल्म की बड़ी शूटिंग हो रही हो। आजकल सजावट का भी एक बिल्कुल नया और महंगा खेल शुरू हो गया है। पहले के समय में दूल्हे की गाड़ियों पर खर्च बहुत कम होता था। लेकिन अब तो हालत यह हो गई है कि गाड़ी की असली कीमत से ज्यादा खर्च उसकी एक दिन की सजावट पर हो जाता है। उसमें विदेशी फूल, महंगी लाइट, रेशमी रिबन और खास थीम होती है। यह सब देखकर ऐसा लगता है जैसे वह कोई कार नहीं, बल्कि एक चलती-फिरती फूलों की बड़ी दुकान हो। किसी समझदार इंसान ने बिल्कुल सही कहा है: “आजकल शादी सच्चे रिश्तों से कम, और इवेंट मैनेजमेंट से बहुत ज्यादा चलती है।”

पहले का जमाना बहुत सीधा और सरल था। दूल्हा अपनी दुल्हन का चेहरा पहली बार सुहागरात के दिन ही ठीक से देखता था। वह बिल्कुल उस पुराने फिल्मी अंदाज़ की तरह था: “पर्दा है पर्दा…” लेकिन अब यह कहानी भी पूरी तरह बदल गई है। अब पहले लंबी मुलाकातें होती हैं। फिर महंगी कैफे में डेट होती है। और उसके बाद लाखों रुपये खर्च करके प्री-वेडिंग शूट होता है। कभी पहाड़ों की वादियों में फोटो खिंचवाई जाती है। तो कभी किसी झील के किनारे रोमांटिक वीडियो बनाया जाता है। एक महंगा ड्रोन कैमरा उनके सिर के ऊपर उड़ रहा होता है। और पीछे बैकग्राउंड में कोई रोमांटिक बॉलीवुड गाना बज रहा होता है: “तुम ही हो…” सिर्फ इन तस्वीरों और छोटे से वीडियो पर लाखों रुपये पानी की तरह बहा दिए जाते हैं। कभी-कभी तो लोग इस पर तंज कसते हुए मजाक में कहते हैं: “आजकल शादी तो बहुत बाद में होती है, लेकिन इन दोनों की फिल्म पहले ही बन कर तैयार हो जाती है।”

पहले शादी में एक सादा सा बैंड बाजा होता था। लाल यूनिफॉर्म पहने हुए बैंड वाले आते थे। उनके पास ट्रम्पेट, देसी ढोल और नगाड़ा होता था। और वे वही पुराना और अमर गीत बजाते थे: “आज मेरे यार की शादी है…” या फिर “बहारों फूल बरसाओ…” उस संगीत पर घर के बुजुर्ग, युवा और बच्चे सब एक साथ नाचते थे। किसी को भी डांस का कोई खास ‘स्टेप’ नहीं आता था। फिर भी वे सभी लोग पूरे दिल से झूम कर नाचते थे। लेकिन आज जमाना बदल गया है, आज डीजे (DJ) का जमाना है। अब शादी में महंगी लेज़र लाइट, नकली स्मोक और एक बड़ा डांस फ्लोर होता है। एक डीजे शायद बैंड से थोड़ा सस्ता हो सकता है। लेकिन उसके लिए जो एक खास ‘डीजे ज़ोन’ तैयार किया जाता है, वह अक्सर लड़की वालों की जेब बहुत ढीली कर देता है।

शादियों में आज खाने का भी पूरा रंग बदल गया है। पहले शादी का टेंट बहुत सादा होता था। चार सीधे बाँस और उस पर एक रंग-बिरंगा कपड़ा। खाना बनाने वाला हलवाई सिर्फ एक होता था। मेनू बहुत छोटा और स्वादिष्ट होता था। गरम पूरी, रसेदार आलू की सब्जी, बूंदी का रायता, मीठी जलेबी और लड्डू-बर्फी। लोग उँगलियाँ चाटते हुए बड़े प्यार से कहते थे: “वाह! आज तो खाकर मजा आ गया।” लेकिन आज की शादी में खाने की एक पूरी अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शनी लगती है। वहाँ एक चाइनीज काउंटर होता है। एक इटालियन काउंटर होता है। लाइव पिज्जा बनता है। तीखी चाट की दस अलग-अलग किस्में होती हैं। पचास तरह के डिब्बाबंद अचार और चालीस तरह के पापड़ होते हैं। कभी-कभी तो बेचारे मेहमान अपनी खाली प्लेट लेकर पूरे पंडाल में बस घूमते ही रहते हैं। उन्हें समझ ही नहीं आता कि वे आखिर क्या खाएँ और क्या छोड़ दें।

समाज में आए इतने सारे बदलावों के बाद भी आज एक बहुत बड़ा सवाल बचता है। क्या हमारी ये आधुनिक शादियाँ सच में ज्यादा खुशहाल हुई हैं? या फिर ये सिर्फ बहुत ज्यादा महँगी और दिखावटी हो गई हैं? हमारे घर के पुराने लोग अक्सर एक बहुत पते की बात कहते हैं: “पहले की शादी में प्यार और अपनापन ज्यादा था, लेकिन दिखावा बहुत कम था।” आज इसके उलट सिर्फ झूठा दिखावा ही ज्यादा है। शादियों में पैसा पानी की तरह बेदर्दी से बहता है। कभी-कभी तो हमें ऐसा भी दुखद किस्सा सुनने को मिलता है कि बेटी की एक दिन की शादी के खर्च से गरीब बाप की कमर ही हमेशा के लिए टूट जाती है। और ऊपर से इस बेरहम समाज का भारी दबाव उसे अलग से मारता है। लोग बिल्कुल उस घमंडी फिल्मी अंदाज़ में एक-दूसरे को दिखाते हैं: “आज मेरे पास गाड़ी है, बंगला है…” पर इस दिखावे के बीच सबसे असली सवाल यह है: क्या इस महंगे दिखावे के बाद भी उनके दिल में कोई सच्चा सुकून बचा है?

आखिर में हम बस यही कह सकते हैं कि समय हमेशा बदलता है। समय के साथ समाज के रीति-रिवाज भी बदलते हैं। पर इस चकाचौंध में एक चीज़ कभी नहीं बदलनी चाहिए। वह है हमारे रिश्तों की सादगी और उनकी गहरी सच्चाई। क्योंकि एक शादी का असली और सबसे पवित्र अर्थ सिर्फ दो दिलों का सच्चा मिलन है। इसके अलावा बाकी सब कुछ तो बस एक फालतू लाइट, कैमरा और एक्शन है। इसलिए आपकी शादी चाहे कैसी भी हो, वह बस इतनी सादी और सच्ची होनी चाहिए कि भविष्य में सिर्फ खुशियाँ रहें, सिर पर कोई भारी कर्ज नहीं।

Pawan Singh

Pawan Singh

Chief Editor, Taj News

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