आर्टिकल Desk, Taj News | Tuesday, April 07, 2026, 07:15:00 PM IST


JNU, दिल्ली
मुख्य बिंदु
- भारत-अमेरिका व्यापार समझौता पूरी तरह से एक तरफा है; जहाँ अमेरिका 18% आयात शुल्क लगाएगा, वहीं भारत अमेरिकी मालों पर 0% शुल्क लगाएगा।
- इसके अलावा, भारत को अगले पांच साल तक अमेरिका से कम से कम 100 अरब डॉलर का माल खरीदने के लिए पूरी तरह मज़बूर किया गया है।
- दरअसल, सस्ते रूसी तेल की जगह 20% महंगे अमेरिकी तेल को खरीदने से देश में महंगाई भड़केगी और इसका सीधा असर मेहनतकश जनता पर पड़ेगा।
- कृषि उत्पादों के आयात के लिए दरवाज़े खोलने से भारतीय किसान बर्बाद होंगे, जबकि अमेरिकी किसानों को अरबों डॉलर का सीधा मुनाफा होगा।
एक ग़ैरबराबरी का समझौता, जो औपनिवेशिक दौर की याद दिलाता है
(आलेख : प्रभात पटनायक, अनुवादक : राजेंद्र शर्मा)
हम अगर भारत-अमेरिका व्यापार समझौते के विशिष्ट प्रावधानों को अलग भी रख दें, तब भी इस समझौते की दो ऐसी असामान्य विशेषताएं हैं, जो इस समझौते के उस प्रकार की एक ग़ैर-बराबरी की संधि होने को दिखाती हैं, जिस तरह की संधियां सामराजी ताकतें वैश्विक दक्षिण या पिछड़ी दुनिया के ऐसे देशों पर थोपा करती थीं, जिन पर वे सीधे-सीधे राज नहीं करती थीं。
इनमें पहली तो यही व्यवस्था है कि जिन माल को पूरी तरह से ही इस समझौते के दायरे से बाहर रखा गया है, उन्हें छोड़ दिया जाए तो, जहां अमेरिका भारतीय मालों पर 18 फीसद आयात शुल्क लगाएगा, डोनाल्ड ट्रंप के बयान के अनुसार मोटे तौर पर भारत, अमेरिकी मालों पर शून्य आयात शुल्क लगाएगा। इस तरह का समझौता करना, जो आधिकारिक रूप से टैरिफ की दरों में इस तरह के अंतर को संस्थागत रूप से स्थापित करता है, बहुत ही अजीबो-गरीब है।
इसका अर्थ तो यही है कि अमेरिका तो ‘पड़ौसी जाए भाड़ में’ की नीति अपनाएगा, लेकिन जिस पड़ौसी को इस नीति के जरिए वास्तव में ‘कंगाल’ बनाया जा रहा होगा, वह वास्तव में अमेरिका के साथ एक समझौते पर दस्तखत कर के, अपने साथ ऐसा किए जाने के लिए ‘मंजूरी’ दे रहा होगा。
दूसरी असामान्य विशेषता, इस प्रावधान में है कि भारत को अगले पांच साल तक, हर साल कम से कम 100 अरब डालर के अमेरिकी माल खरीदने होंगे। एक ऐसा व्यापार समझौता, जो इसका प्रावधान करता है कि किसी देश को, हर सूरत में दूसरे देश से कम से कम कितने मूल्य के माल खरीदने होंगे, मुक्त बाजार की समूची विचारधारा के ही खिलाफ जाता है, जो कि पूंजीपति वर्ग को इतनी प्यारी है। इस विचारधारा के अनुसार तो वास्तव में कितने मूल्य का व्यापार होगा, खरीददारों के चयनों से तय होगा। उन्हें सरकारों द्वारा थोपा नहीं जा सकता है और इसलिए ये सरकारों के फैसले नहीं हो सकते हैं। इसलिए, खरीद के इस वादे का एक समझौते में शामिल किया जाना, पूरी तरह से अजीबो-गरीब है।
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और इससे भी ज्यादा अजीब है यह तथ्य कि यह न्यूनतम आंकड़ा, इस समझौते के एक पक्ष के लिए तो तय किया गया है, लेकिन दूसरे पक्ष के लिए तय ही नहीं किया गया है, जो साफ तौर पर इसे एक ग़ैर-बराबरी की संधि बना देता है。
इस तरह की ग़ैर-बराबरी की संधि तो किसी देश द्वारा दूसरे देश पर थोपी ही जा सकती है। भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार चाहे कुछ भी दिखावा क्यों न करे, अमेरिका ने उसकी बाहें मरोड़ कर उसे इस समझौते पर दस्तखत करने के लिए मजबूर किया है। यह स्वतंत्र भारत के इतिहास में पहला ही मौका है, जब हमारे स्वतंत्र देश की सरकार इतनी कायरता का प्रदर्शन कर रही है कि उसने, एक ऐसी ग़ैर-बराबरी की संधि पर दस्तखत कर दिए हैं, जो औपनिवेशिक दौर में याद दिलाती है。
रूसी तेल का मुद्दा : मेहनतकशों पर चोट
इस ग़ैर-बराबरी की संधि के दो सबसे स्वत:स्पष्ट निहितार्थ हैं। पहला, रूसी तेल की खरीद के संबंध में। और दूसरा, कृषि क्षेत्र के संबंध में।
औसत भारत के कुल तेल आयात का एक-तिहाई रूस से आता है। बेशक, यह तब की बात है, जब तक भाजपा-नीत सरकार ने रूस से तेल की खरीद में कटौती शुरू नहीं की थी। अब अगर हमारा तेल का कुल आयात 120 अरब डालर के करीब माना जाए, तो इस तरह रूसी तेल की जगह अमेरिकी तेल को अपनाने से, हमारे तेल आयात के बिल में करीब 8 अरब डालर की बढ़ोतरी हो जाएगी। यह तो उस औपनिवेशिक किस्म की ‘निकासी’ या ड्रेन का सिर्फ एक तत्व है, जिसे इस नये व्यापार समझौते के जरिए भारत पर अमेरिका थोप रहा है। इसका अर्थ होगा, अर्थव्यवस्था को मुद्रास्फीतिकारी धक्का लगना, जिसकी असली मार मेहनतकश जनता पर पड़ेगी。
किसानों की बर्बादी
जहां तक कृषि क्षेत्र का सवाल है, कृषि के क्षेत्र के एक बहुत ही महत्वपूर्ण हिस्से के या डॉउनस्ट्रीम गतिविधियों के लिए दरवाजे खोल दिए गए हैं। सेब, कपास, ट्री नट्स, ताजा तथा प्रोसेस्ड फल, सोयाबीन का तेल और वाइन तथा स्प्रिट्स, इसके उल्लेखनीय उदाहरण हैं। यह उल्लेखनीय है कि ट्रंप प्रशासन इस समझौते के चलते अमेरिकी किसानों की आय में अरबों डालर की बढ़ोतरी की बातें कर रहा है। अगर अमेरिकी किसानों को भारत में बढ़ा हुआ बाजार हासिल होने जा रहा है, तो अनिवार्य रूप से इसका अर्थ यही है कि भारतीय किसानों को इस बाजार से धकिया कर बाहर किया जा रहा होगा。
औपनिवेशिक दौर की प्रतिध्वनि
पुन:, यहां भी हमें औपनिवेशिक दौर की प्रतिध्वनि सुनाई देती है। स्वतंत्रता संघर्ष के इस वादे के साथ पूरी तरह विश्वासघात करते हुए, एक बार फिर उनके ऊपर वही मुश्किलें ढहायी जा रही हैं। अमेरिकी साम्राज्यवाद के सामने मोदी सरकार के इस समर्पण और उससे पहले रही एक प्रधानमंत्री के रुख में हमें जमीन-आसमान का अंतर नजर आता है। भारत की उस प्रधानमंत्री ने अमेरिका के दबाव को इतनी दृढ़ता से ठुकराया था कि एक अमेरिकी राष्ट्रपति ने खुद कबूल किया था, उसे उनकी आंखों में देखकर बात करने से डर लगता था।
(लेखक दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के आर्थिक अध्ययन एवं योजना केंद्र में प्रोफ़ेसर एमेरिटस हैं।)

Pawan Singh
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