Edited by: Thakur Pawan Singh | tajnews.in | Agra | 08 Mar 2026, 05:35 pm IST
Taj News Opinion Desk
विशेष संपादकीय लेख
नेतन्याहू से नाता: आखिर ये रिश्ता क्या कहलाता है?
By: Badal Saroj | Edited by: Thakur Pawan Singh | Agra
बादल सरोज
संपादक, ‘लोकजतन’ एवं संयुक्त सचिव, AIKS
वामपंथी विचारक एवं वरिष्ठ पत्रकार बादल सरोज ने अपने इस विश्लेषणात्मक लेख में भारत और इजरायल के बीच बढ़ती नजदीकियों पर कड़ा प्रहार किया है। उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी की हालिया इजरायल यात्रा, फिलिस्तीन संकट और ईरान पर हुए हमले के संदर्भ में भारत की बदलती विदेश नीति का बेबाक विश्लेषण किया है। पढ़िए उनका यह आलेख:
मुख्य बिंदु (Highlights):
- भारत की विदेश नीति और इजरायल के प्रति लगातार बढ़ते वैचारिक झुकाव पर कड़े सवाल।
- गाजा में हो रहे कत्लेआम और ईरान पर भीषण हमले के बाद भारत सरकार की चुप्पी का तीखा विश्लेषण।
- राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) और यहूदीवाद के बीच ऐतिहासिक और वैचारिक संबंधों का बड़ा खुलासा।
- अटल बिहारी वाजपेयी की विदेश नीति और वर्तमान सरकार की नीतियों के बीच गहरा विरोधाभास।
यह समय बहुत ही असामान्य है। यह एक अभूतपूर्व समय है। दरअसल राजेश जोशी अपनी कविता ‘शांति की अपील’ में एक अहम बात कहते हैं। वे कहते हैं कि जब तक मैं शांति की अपील लिखता हूँ, शहर में आग लग चुकी होती है। इसी तरह की भयावह स्थिति से आज पूरी दुनिया गुजर रही है। जब तक हम एक नृशंस वारदात को दर्ज करते हैं, तब तक दूसरी पाशविकता की डरावनी खबर आ जाती है। हम जब तक तथ्य जांचते हैं, तब तक बर्बरता का एक नया काण्ड घट जाता है। इसके अलावा सप्ताह-दस दिन की छोटी अवधि में दुनिया में बहुत कुछ घटा है। इन घटनाओं के सभी आयाम बहुत गंभीर हैं। इनका असर बहुत दूर तक पड़ेगा। इसलिए इनमें से किसी भी घटना की अनदेखी करना हमारे लिए महंगी साबित हो सकती है। फिलहाल हम सिर्फ एक अजीब आयाम पर बात करेंगे। यह आयाम भारत की विदेश नीति से सीधा जुड़ा है। इजरायल आज दुनिया का सबसे दुष्ट देश बन चुका है। अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय ने बेंजामिन नेतन्याहू को युद्ध अपराधी घोषित किया है। फिर भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उनके साथ गहरी आसक्ति दिखा रहे हैं। नतीजतन भारत की स्वतंत्र विदेश नीति और कूटनीतिक प्रतिष्ठा रसातल में जा रही है。
नरेंद्र मोदी भारत के पहले प्रधानमंत्री हैं। उन्होंने इजरायल की यात्रा की है। लेकिन 26-27 फरवरी की उनकी दूसरी इजरायल यात्रा बेहद नुकसानदेह रही। इस यात्रा ने भारत की अंतर्राष्ट्रीय पहचान को भारी नुकसान पहुंचाया है। भारत हमेशा संप्रभुता और विश्वशांति का पक्का हिमायती रहा है। अपनी यात्रा के दौरान मोदी भारतीय गाँवों के कायाकल्प की बातें कर रहे थे। उन्होंने ‘विलेज ऑफ एक्सीलेंस’ कार्यक्रम का ज़िक्र किया। इसके तहत इजराइल की आधुनिक कृषि तकनीक भारत लाई जाएगी। इसके अलावा वे रक्षा और व्यापार से आगे बढ़कर कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) का करार कर रहे थे। इजरायल पेगासस जैसे जासूसी यंत्रों से सूचनाएं चुराता है। इसके बावजूद मोदी गाँवों को ‘आधुनिक’ बनाने का करार कर रहे थे। उसी समय मोदी हजारों बेगुनाह बच्चों के हत्यारे नेतन्याहू के साथ गलबहियां कर रहे थे। वे इजरायली संसद में इस अवैध राष्ट्र की तारीफ़ में कसीदे पढ़ रहे थे। ठीक उसी समय इजरायल ईरान पर एक भयानक हमले की तैयारी कर रहा था। ईरान भारत का बहुत पुराना और भरोसेमंद दोस्त है। यह हमला द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद के इतिहास का सबसे बड़ा हमला था。
मोदी इजरायली संसद में एक दुष्ट राष्ट्र का लगातार गुणगान कर रहे थे। आज अमेरिका को छोड़कर धरती का हर देश इजरायल को धिक्कारता है। संयुक्त राष्ट्र संघ ने 2015 से 2024 के बीच इजरायल के खिलाफ 173 से अधिक प्रस्ताव पारित किये हैं। इसके बावजूद मोदी ने उसकी संसद में जो बोला, वह दुनिया के सर्वमान्य नजरिये के बिल्कुल उलट था। उन्होंने 7 अक्टूबर 2023 को हुए हमास के हमले की भर्त्सना जरूर की। हालांकि तत्कालीन यूएनओ महासचिव ने साफ कहा था कि इस हमले को उन हालात से अलग करके नहीं देखा जाना चाहिए। मगर मोदी ने फिलिस्तीन के गज़ा में हो रहे वीभत्स नरसंहार पर पूरी तरह चुप्पी साध ली। इजरायल लगातार वहां निर्दोष लोगों को मार रहा है। गज़ा के स्वास्थ्य मंत्रालय ने हाल ही में अपने डरावने आंकड़े जारी किए हैं। इन आंकड़ों के अनुसार छोटे से गज़ा में इजरायल ने 71,000 से अधिक फिलिस्तीनियों को मार दिया है। इनमें लगभग 70 प्रतिशत संख्या सिर्फ महिलाओं और बच्चों की है। इसके अलावा 10,000 से अधिक लोग अभी भी लापता हैं। वे लोग नष्ट हुई इमारतों के मलबे के नीचे दबे पड़े हैं। सीधे हमलों के अलावा 440 लोग भुखमरी और कुपोषण से अपनी जान गंवा चुके हैं। यह मानवता पर एक बड़ा कलंक है。
यह सब उसी फिलिस्तीन में हो रहा है, जिसका भारत ने हमेशा मजबूती से साथ दिया है। अटल बिहारी वाजपेयी ने कभी भारत की स्थिति बिल्कुल स्पष्ट की थी। जनता पार्टी की जीत के बाद 1977 में वाजपेयी जी ने दिल्ली के रामलीला मैदान में एक ऐतिहासिक भाषण दिया था। उन्होंने कहा था कि लोग एक गलतफहमी पैदा कर रहे हैं। वे कह रहे हैं कि जनता पार्टी अरबों का साथ छोड़कर इजरायल का साथ देगी। वाजपेयी ने साफ कहा था कि इजरायल को अरबों की कब्जाई ज़मीन तुरंत खाली करनी होगी। उन्होंने स्पष्ट किया था कि कोई भी आक्रमणकारी अपने आक्रमण का फायदा कभी नहीं उठा सकता। उन्होंने फिलिस्तीनियों के अधिकारों की स्थापना की जोरदार वकालत की थी। वाजपेयी ने मध्य-पूर्व में स्थायी शांति का आधार बनाने की अहम बात कही थी। लेकिन आज मोदी उन्हीं फिलिस्तीनियों के हत्यारे के खास मेहमान बने बैठे हैं। वे इस भयानक कत्लेआम पर पूरी तरह चुप्पी साधे हुए हैं। दरअसल यह खामोशी कोई अनायास घटना नहीं है। यह एक सोची-समझी कूटनीतिक चाल है。
यही शर्मनाक खामोशी ईरान के सुप्रीम लीडर आयतुल्ला खामनेई की आपराधिक हत्या पर भी दिखाई दी। इजरायल ने उनकी हत्या की। लेकिन भारत सरकार ने इसके विरोध में कुछ नहीं कहा। खामनेई वही व्यक्ति हैं, जिनसे मुलाकात करने मोदी खुद तेहरान गए थे। मोदी ने वहां जाकर कहा था कि भारत और ईरान के रिश्ते दुनिया के इतिहास जितने ही पुराने हैं। मई 2016 में अपनी ईरान यात्रा के दौरान मोदी ने खामनेई से मुलाकात की थी। उन्होंने खामनेई को कुरान की 700 वर्ष पुरानी एक दुर्लभ पांडुलिपि भेंट की थी। इसी यात्रा के दौरान मोदी ने हसन रूहानी को मिर्जा गालिब की फारसी कविताओं का संग्रह भेंट किया था। इतना ही नहीं, मई 2024 में इब्राहिम रईसी की हेलीकॉप्टर दुर्घटना में मौत हो गई थी। तब भारत सरकार ने उनके सम्मान में एक दिन का राजकीय शोक घोषित किया था। लेकिन उसी मोदी सरकार ने खामनेई की हत्या के बाद शोक का एक शब्द भी व्यक्त नहीं किया। इसके उलट मोदी खुद नेतन्याहू को फ़ोन करके संवेदनाएं जता रहे हैं। भारत की कूटनीति इससे पहले इतनी निर्लज्ज और एकतरफा कभी नहीं रही थी。
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आखिर यह कूटनीतिक रिश्ता क्या कहलाता है? पूरा विश्व आज इजरायल की कड़ी निंदा और भर्त्सना कर रहा है। फिर भी भारत सरकार उसके प्रति इतना असीम मोह क्यों दिखा रही है? इसमें भारत के कोई राष्ट्रीय हित बिल्कुल शामिल नहीं हैं। इस्लामिक देशों के संगठन में पाकिस्तान ने अक्सर कश्मीर का मुद्दा उठाया है। तब ईरान ने हमेशा पाकिस्तान को रोका और भारत का मजबूत साथ दिया। साल 1994 में पाकिस्तान ने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग में भारत के खिलाफ प्रस्ताव लाने की कोशिश की थी। उस समय भी ईरान ने अंतिम समय में भारत का खुलकर साथ दिया था। ईरान ने उस प्रस्ताव को रोकने में भारत की अहम मदद की थी। इसके अलावा ईरान भारत की तेल आपूर्ति का सबसे भरोसेमंद स्रोत रहा है। स्वयं मोदी ने चाबहार पोर्ट के समझौते को एक ऐतिहासिक उपलब्धि बताया था। दूसरी तरफ इजरायल हमेशा अमेरिका के साथ खड़ा रहा है। अमेरिका ने आज तक भारत के खिलाफ सिर्फ साजिशें ही रची हैं। फिर भारत आज इजरायल के साथ क्यों खड़ा है? दरअसल इसके पीछे अमेरिकी दवाब और डोनाल्ड ट्रम्प को ख़ुश करने की मंशा है। इसके अलावा इनका स्वाभाविक अपनापा ‘मुस्लिम विरोध’ से जुड़ा है। इसी कारण मोदी खुद को नेतन्याहू के बहुत करीब मानते हैं。
यह रिश्ता न तो आज का है और न ही यह दबा-छुपा है। इजरायली विदेश मंत्रालय के ऐतिहासिक दस्तावेजों में इसकी कई कथायें भरी पड़ी हैं। इजरायली राजनयिक जनसंघ की मुस्लिम विरोधी राजनीति को अच्छी तरह समझते थे। वे जनसंघ को इजरायल का एक स्वाभाविक और पक्का समर्थक मानते थे। वाशिंगटन में तत्कालीन इजरायली राजदूत डेविड तुर्गमैन ने 1977 में एक टेलीग्राम भेजा था। उन्होंने लिखा था कि दक्षिणपंथी जनसंघ अपने मुस्लिम विरोधी स्वभाव के कारण इजरायल का पक्का समर्थक है। साल 1980 में भारत में इजरायली उच्चायुक्त हाइम डिवोन ने भी एक टेलीग्राम लिखा था। उन्होंने बताया कि भारतीय जनता पार्टी वास्तव में भेष बदलकर जनसंघ ही है। उन्होंने कहा कि इसके सदस्य इजरायल के प्रति बेहद समर्थक रुख रखते हैं। 1960 के दशक से ही इजरायली राजनयिकों ने जनसंघ के नेताओं के साथ गहरे संबंध बना लिए थे। जब समूचा भारत फिलिस्तीन के सवाल पर एक राय रखता था, तब भी यह कुनबा इजरायल के साथ रिश्ते बनाए हुए था। मुस्लिम विरोध तब भी एक प्रमुख वजह थी और आज भी है। इसी ग्रंथि के चलते उन्हें यहूदीवाद के दुष्ट इरादे के साथ भाईचारा महसूस होता है। इसलिए संघ और भाजपा ने साबित कर दिया है कि विदेश नीति हमेशा आतंरिक नीतियों का ही सीधा प्रतिबिम्ब होती है। उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय संबंधों को भी नफरती जहर से पूरी तरह विषाक्त कर दिया है। यह भारत की छवि के लिए बहुत खतरनाक है。
इजरायली संसद में मोदी ने ‘फादरलैंड-मदरलैंड’ की उपमा का इस्तेमाल किया। यह हरकत इस वैचारिक रिश्ते को हद से ज्यादा आगे बढाने वाली थी। यह सिर्फ भाषण लिखने वाले की कोई मामूली गलती नहीं है। बल्कि यह आरएसएस के धर्म आधारित राष्ट्र के विचार का सीधा विस्तार है। क्या मोरिय्याह पहाड़ी पर ज्ञान पाने के कारण भारतीय यहूदियों की फादरलैंड इजरायल हो जायेगी? स्वयं यहूदी धर्म भी ऐसी कोई बेतुकी बात नहीं करता है। उसकी शिक्षाओं में राष्ट्र या पितृ भूमि का कोई जिक्र नहीं है। इजरायल के बाद मध्य-पूर्व में सबसे बड़ी यहूदी आबादी ईरान में ही रहती है। इन ईरानी यहूदियों ने इजरायल को कभी अपनी पितृभूमि नहीं माना है। धर्म के उदगम स्थल को पितृ भूमि मानना एक अत्यंत खतरनाक और विभाजनकारी धारणा है। अगर यह कुतर्क चला, तो फिर आर्यों को भी मध्य एशिया की याद आने लगेगी। इसके अलावा दुनिया भर को मानवता के पालने दक्षिण अफ्रीका जाना पड़ेगा। असल में नफरती साम्प्रदायिकता समाज को इसी अंधी गली में ले जाकर खड़ा करना चाहती है। यह देश की एकता के लिए शुभ संकेत नहीं है。
हमें याद रखना चाहिए कि जो कुनबा आज नेतन्याहू की परिक्रमा कर रहा है, वही कुनबा कभी नाज़ी जर्मनी का समर्थक था। साल 1939 में संघचालक एम.एस. गोलवलकर ने अपनी किताब ‘हम और हमारी राष्ट्रीयता’ लिखी थी। उन्होंने लिखा था कि जर्मनी ने यहूदियों को बाहर निकालकर दुनिया को चौंका दिया है। उन्होंने इसे राष्ट्रीय गौरव का उच्चतम स्तर बताया था। उन्होंने कहा था कि हिंदुस्तान को इससे एक अच्छा सबक सीखना चाहिए। संघ ने अपने प्रमुख नेता डॉ. मुंजे को मुसोलिनी और हिटलर के पास भी भेजा था। विनायक दामोदर सावरकर ने भी नाजीवाद और हिटलर की नीतियों की जमकर प्रशंसा की थी। सावरकर ने नाजीवाद को जर्मनी का “रक्षक” बताया था। आज वही संघ यहूदियों द्वारा की जा रही बर्बरता का खुलकर गुणगान कर रहा है। साफ़ बात है कि जब हिंसक बर्बरता ही असली साध्य हो, तो आराध्य बदलने में उन्हें कोई संकोच नहीं होता। इतिहास में कुछ ऐसे सप्ताह आते हैं, जो दशकों का भारी बदलाव ला देते हैं। ट्रम्प और नेतन्याहू की जोड़ी अपने खौफनाक इरादों को पूरा करे, उससे पहले हमें जागना होगा। दुनिया की मानवता, लोकतंत्र और अंतर्राष्ट्रीय कानूनों में विश्वास करने वाले भारतीय अवाम को अब एक स्वर में अपनी बात बोलनी होगी। अन्यथा बहुत देर हो जाएगी。
Thakur Pawan Singh
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