Fri, 28 Nov 2025 12:29 PM IST, Hamirpur, Uttar Pradesh.
हमीरपुर जिले में सामूहिक अत्याचार और रसायन पिलाए जाने की शिकार 16 वर्षीय नाबालिग पीड़िता ने एक महीने तक मौत और जीवन के बीच संघर्ष करने के बाद गुरुवार देर रात लखनऊ मेडिकल कॉलेज में दम तोड़ दिया।
28 अक्टूबर की रात घर में घुसकर तीन युवकों पर हमला और उत्पीड़न का आरोप था। लेकिन इस अपराध के बाद पीड़िता जिस तरह अस्पतालों के चक्कर लगाती रही, उसने प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था की खामियों को नंगा करके रख दिया।
एक महीने में छह अस्पताल, सात बार रेफर, कहीं बेड नहीं मिला, कहीं डॉक्टर, कहीं पैसा मांगा गया। और आख़िर में लखनऊ मेडिकल कॉलेज में तीन दिनों तक स्ट्रेचर पर ही पड़ी रही बेटी की सांसें गुरुवार रात लगभग दो बजे रुक गईं।

28 अक्टूबर की रात: घर में घुसकर वारदात, परिवार पर टूटा पहाड़
पीड़िता 28 अक्टूबर की रात घर में सो रही थी जब तीन युवक—जिनमें एक नाबालिग था—अचानक घर में घुसे।
परिजनों की शिकायत के अनुसार, पीड़िता के साथ सामूहिक अत्याचार किया गया और उसे तेज असर वाला रसायन पिला दिया गया।
परिवार ने तुरंत उसे सरीला सीएचसी ले जाया, जहां से चिकित्सकों ने तुरंत झांसी मेडिकल कॉलेज रेफर कर दिया।
यहीं से शुरू हुआ एक महीना लंबा संघर्ष जिसे पीड़िता बर्दाश्त नहीं कर सकी।
उपचार की भयावह यात्रा: छह अस्पताल, सात रेफर… हर जगह टूटा भरोसा
1. सरीला सीएचसी से झांसी मेडिकल कॉलेज
पहला रेफर। 12 दिन इलाज चला, सुधार नहीं हुआ।
2. झांसी मेडिकल कॉलेज से पीजीआई लखनऊ
दूसरा रेफर। भर्ती के लिए भारी खर्च बताकर परिवार को वापस भेज दिया गया।
3. परिवार ने हमीरपुर जिला अस्पताल लाया
यहीं पीड़िता ने मीडिया के सामने अपने साथ हुए अत्याचार को दोहराया।
4. हमीरपुर से कानपुर हैलट अस्पताल
चौथा रेफर। 15 दिन इलाज, हालत और बिगड़ी।
5. हैलट से दोबारा पीजीआई
पांचवां रेफर। दो दिन इलाज चला, सुधार दिखा।
6. पीजीआई में सर्जरी के लिए दो लाख रुपये की मांग
पिता गरीब थे। पैसा न होने के कारण बच्ची को वापस भेज दिया गया।
7. पीजीआई से लखनऊ मेडिकल कॉलेज
सातवां रेफर। यहां पहुंचते ही हालात और बदतर हो गए।
लखनऊ मेडिकल कॉलेज में तीन दिन स्ट्रेचर पर, न बेड मिला, न समय पर इलाज
पीड़िता को लखनऊ मेडिकल कॉलेज में भर्ती जरूर किया गया, लेकिन
- उसे तीन दिन तक स्ट्रेचर पर ही रखा गया
- बेड नहीं मिला
- रक्त की तत्काल उपलब्धता नहीं हुई
- आवश्यक सर्जरी में देरी हुई
बुधवार दोपहर उसे सर्जरी वार्ड में शिफ्ट किया गया। लेकिन उसके शरीर में सिर्फ चार पॉइंट खून बचा था, जिसके कारण स्थिति लगातार गंभीर बनी रही।
गुरुवार पूरे दिन रक्त उपलब्ध नहीं हो सका।
इंस्पेक्टर अजीत सिंह के प्रयास के बाद देर शाम रक्त मिला, लेकिन तब तक शरीर अत्यधिक कमजोर हो चुका था।
गुरुवार की रात: बेटी ने हार मानी, माता-पिता सामने खड़े रोते रहे
रात करीब एक बजे पीड़िता की सांस लेने में दिक्कत बढ़ी।
डॉक्टरों ने मशीन लगाई, नली डाली, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ।
क़रीब दो बजे उसने अंतिम सांस ली।
मां–बाप वहीं खड़े रो रहे थे और बार-बार कह रहे थे कि “अगर समय पर इलाज मिल जाता तो मेरी बच्ची आज जिंदा होती।”
पिता का बयान: “मेरी बेटी स्ट्रेचर पर तड़पती रही… किसी ने दया नहीं की”
पीड़िता के पिता ने भावुक होकर कहा—
“मेरी बेटी कई दिनों तक स्ट्रेचर पर पड़ी रही। न बेड मिला, न इलाज। अगर सही समय पर भर्ती कर लेते, तो वह बच जाती। जिस दिन इलाज शुरू हुआ, उसी रात वह खत्म हो गई।”
यह बयान प्रदेश की स्वास्थ्य प्रणाली की भयावह स्थिति को उजागर करता है।
पुलिस ने दर्ज किया बयान, पोस्टमॉर्टम जारी
गुरुवार शाम लखनऊ पुलिस की एक महिला उपनिरीक्षक और इंस्पेक्टर ने अस्पताल पहुंचकर पीड़िता का बयान दर्ज किया था।
पोस्टमॉर्टम लखनऊ में कराया जा रहा है और परिवार वहीं मौजूद है।
एसपी दीक्षा शर्मा ने बताया—
- पीड़िता को सर्जरी वार्ड में शिफ्ट कराया गया था
- बेड और रक्त की व्यवस्था कराई गई
- इलाज जारी था
निष्कर्ष: अपराधी तीन, लेकिन उसे मारने वाला सिस्टम
अब तक अपराध में तीन आरोपित
लेकिन असल में उसे मौत तक पहुंचाने वाले थे
- सिस्टम की उदासीनता
- अस्पतालों की लापरवाही
- रेफर करने की बिना सोची-समझी परंपरा
- गरीब परिवार की मजबूरी
- और चिकित्सा व्यवस्था की खामियां
एक महीने के भीतर यह केस यूपी की स्वास्थ्य व्यवस्था की सबसे दर्दनाक तस्वीर बनकर सामने आया है।
संपादन: ठाकुर पवन सिंह | ताज न्यूज – आईना सच का
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