भारत में बाल विवाह के खिलाफ जागरूकता और ग्रामीण-शहरी अंतर दर्शाती प्रतीकात्मक छवि

दो ज़िंदगियाँ। दो भारत। एक कड़वा सच — बाल विवाह के खिलाफ निर्णायक जंग

ओपिनियन

Edited by: Thakur Pawan Singh | tajnews.in | 27 Feb 2026, 11:58 PM IST

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Taj News Editorial & Social Justice Desk

सच, संवेदना और सामाजिक बदलाव की आवाज़

लेखक और लेख के बारे में: यह महत्वपूर्ण और संवेदनशील लेख वरिष्ठ पत्रकार बृज खंडेलवाल द्वारा लिखा गया है, जो दशकों से सामाजिक न्याय, ग्रामीण भारत और नीतिगत बदलावों पर गंभीर लेखन करते रहे हैं। इस लेख में उन्होंने भारत में बाल विवाह की कड़वी हकीकत को दो अलग-अलग जीवन स्थितियों के माध्यम से सामने रखा है। शहर और गांव के बीच अवसरों की असमानता, कानून और जमीनी सच्चाई के अंतर, तथा शिक्षा की निर्णायक भूमिका का विश्लेषण किया गया है। यह लेख केवल समस्या को उजागर नहीं करता, बल्कि समाधान की दिशा भी सुझाता है। समाज, नीति निर्माताओं और युवाओं के लिए यह एक जरूरी हस्तक्षेप है।

Writer Brij Khandelwal

बृज खंडेलवाल

वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार

जंजीरें तोड़ता भारत: बाल विवाह के खिलाफ निर्णायक जंग

हैदराबाद की ऊँची इमारतों के बीच 28 साल की अनीता लैपटॉप पर झुकी है। वह सॉफ्टवेयर इंजीनियर है। प्रमोशन और बेहतर पैकेज उसके लक्ष्य हैं। शादी? “अभी नहीं,” वह कहती है। पहले करियर, फिर मुकाम।

राजस्थान के एक छोटे से गाँव में 15 साल की रानी की दुनिया अलग है। मेहंदी सूखी भी नहीं कि ससुराल की जिम्मेदारियाँ उसके हिस्से आ गईं। किताबें छूट गईं। खेल खत्म। बचपन खामोशी से विदा हो गया।

दो लड़कियाँ। एक देश। फर्क सिर्फ हालात का। शहरों में शादी एक विकल्प है। गांवों में अब भी अक्सर मजबूरी। कहीं “सेटल” होने की प्रतीक्षा, कहीं “बोझ” समझकर जल्दी विदाई।

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के कम्युनिटी हेल्थ सेंटर में हाल ही में “बाल विवाह मुक्त भारत: हमारी ज़िम्मेदारी” विषय पर कार्यक्रम हुआ। विशेषज्ञों ने स्पष्ट कहा—बाल विवाह परंपरा नहीं, बच्चों के अधिकारों पर हमला है।

Prohibition of Child Marriage Act के अनुसार लड़की की न्यूनतम शादी की उम्र 18 और लड़के की 21 वर्ष है। POCSO Act नाबालिगों के शोषण को अपराध मानता है। 1098 चाइल्ड हेल्पलाइन 24 घंटे सक्रिय है।

फिर भी NFHS-5 बताता है कि 20–24 आयु वर्ग की लगभग 23% महिलाओं की शादी 18 से पहले हो चुकी थी। कम उम्र में गर्भधारण से मां और शिशु दोनों के लिए खतरा बढ़ जाता है।

बाल विवाह शिक्षा रोकता है, आर्थिक निर्भरता बढ़ाता है और गरीबी के चक्र को मजबूत करता है। एक अतिरिक्त वर्ष की पढ़ाई इस खतरे को काफी घटा देता है।

“बाल विवाह मुक्त भारत” अभियान 2030 तक इसे समाप्त करने का लक्ष्य रखता है। कन्याश्री जैसी योजनाएँ सकारात्मक बदलाव का संकेत देती हैं।

लेकिन असली जंग सोच की है। जब तक बेटियों को बराबरी का अधिकार नहीं मिलेगा, बदलाव अधूरा रहेगा। जिस दिन हर रानी को अपने सपनों का समय मिलेगा, उसी दिन भारत सच में आज़ाद होगा।

Thakur Pawan Singh Editor in Chief Taj News

Thakur Pawan Singh

Chief Editor, Taj News

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