UP Politics Yogi Adityanath vs Keshav Prasad Maurya Brajesh Pathak over Shankaracharya controversy, RSS Mohan Bhagwat meeting, Taj News

योगी बनाम मौर्य: शंकराचार्य विवाद ने UP BJP में खोली गुटबाजी की पोल, ब्राह्मण पॉलिटिक्स के भंवर में ‘अकेले’ पड़े सीएम योगी!

उत्तर प्रदेश

Edited by: Thakur Pawan Singh | tajnews.in I 20 Feb 2026, 1:25 pm IST

लखनऊ: उत्तर प्रदेश की राजनीति में हमेशा से ही जाति, धर्म और सत्ता का त्रिकोण हावी रहा है। फिलहाल राज्य में भारतीय जनता पार्टी (BJP) की मजबूत सरकार है और सत्ता की बागडोर ‘हिंदुत्व के पोस्टर बॉय’ कहे जाने वाले मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ (Yogi Adityanath) के हाथों में है। लेकिन, बाहर से शांत और एकजुट दिखने वाली यूपी बीजेपी के भीतर इन दिनों एक सियासी बवंडर उठ रहा है। यह बवंडर प्रयागराज के माघ मेले में ‘शंकराचार्य विवाद’ (Shankaracharya Controversy) से शुरू हुआ था, जिसने अब न सिर्फ धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाई है, बल्कि सत्ताधारी दल के भीतर पनप रही गहरी गुटबाजी और शीर्ष नेताओं के बीच की दरार को भी पूरी तरह से बेनकाब कर दिया है।

मोहन भागवत, सीएम योगी
मोहन भागवत, सीएम योगी
HIGHLIGHTS
  1. शंकराचार्य विवाद से सियासी भूचाल: प्रयागराज में माघ मेले के दौरान शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद के शिष्यों की ‘चोटी’ खींचने के आरोप ने यूपी की राजनीति गरमा दी है।
  2. योगी का सख्त रुख: सीएम योगी ने बिना नाम लिए कहा- ‘संविधान और कानून सबसे ऊपर, अराजकता फैलाने वाले कालनेमि तत्वों को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।’
  3. डिप्टी सीएम के अलग सुर: केशव मौर्य ने जांच की मांग की, जबकि ब्रजेश पाठक ने चोटी खींचने को बताया ‘महापाप’; सीएम के रुख को दी खुली चुनौती।
  4. संघ (RSS) की एंट्री: मोहन भागवत ने लखनऊ में सीएम योगी और दोनों डिप्टी सीएम के साथ अलग-अलग की 30-30 मिनट की अहम बैठक; कैबिनेट फेरबदल की अटकलें तेज।

क्या है ‘शंकराचार्य विवाद’ जिसने गरमाई सियासत? इस पूरे राजनीतिक भूचाल की जड़ें 18 जनवरी 2026 को प्रयागराज (Prayagraj) में हुए एक घटनाक्रम से जुड़ी हैं। मौनी अमावस्या के पवित्र अवसर पर जब ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती (Swami Avimukteshwaranand Saraswati) संगम स्नान के लिए जा रहे थे, तो स्थानीय प्रशासन द्वारा उन्हें रोका गया। आरोप है कि इस दौरान पुलिस और प्रशासन द्वारा उनके शिष्यों के साथ बदसलूकी की गई और उनकी ‘चोटी’ (शिखा) तक खींची गई।

शंकराचार्य ने इसे सनातन धर्म और संतों का घोर अपमान माना। उन्होंने सीधे तौर पर योगी सरकार पर तीखा हमला बोला और यहां तक कह दिया कि सत्ता में बैठे लोग ‘कालनेमि’ (राक्षसी प्रवृत्तियों वाले) शक्तियों से प्रेरित हैं, जो सनातन धर्म को कमजोर कर रहे हैं।

सीएम योगी का सख्त रुख: ‘संविधान और कानून से ऊपर कोई नहीं’ शंकराचार्य के इन गंभीर आरोपों के बाद, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी अपने चिर-परिचित सख्त अंदाज में पलटवार किया। राज्य विधानसभा में बिना किसी का नाम लिए सीएम योगी ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि “देश में संविधान (Constitution) सबसे ऊपर है और कोई भी व्यक्ति, चाहे वह कितना भी बड़ा क्यों न हो, कानून से ऊपर नहीं हो सकता।”

योगी ने प्रशासन की कार्रवाई का बचाव करते हुए कहा कि माघ मेले जैसी विशाल व्यवस्था नियमों के तहत ही चलेगी और किसी भी प्रकार की अराजकता या ‘कालनेमि’ जैसे तत्वों को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। सीएम योगी का यह बयान पूरी तरह से प्रशासनिक सख्ती और कानून-व्यवस्था (Law and Order) को कायम रखने की दिशा में था।

डिप्टी सीएम केशव और ब्रजेश पाठक ने अलापा अलग सुर इस विवाद ने तब एक नया और चौंकाने वाला मोड़ ले लिया, जब योगी सरकार के ही दो उपमुख्यमंत्रियों (Deputy CMs)—केशव प्रसाद मौर्य (Keshav Prasad Maurya) और ब्रजेश पाठक (Brajesh Pathak)—ने मुख्यमंत्री के सख्त रुख से एकदम अलग लाइन पकड़ ली।

पिछड़े वर्ग (OBC) के कद्दावर नेता केशव प्रसाद मौर्य ने शंकराचार्य के प्रति गहरी आस्था जताते हुए उन्हें “पूज्य” और “भगवान शंकराचार्य” कहा। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि संतों का सम्मान सर्वोपरि है और इस कथित अपमान की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।

वहीं, ब्राह्मण चेहरे के रूप में स्थापित ब्रजेश पाठक का बयान तो मुख्यमंत्री के रुख को सीधी चुनौती देने वाला था। ब्रजेश पाठक ने शिखा (चोटी) खींचने की घटना को एक ‘महाअपराध’ और ‘धार्मिक पाप’ करार दिया। उन्होंने मांग की कि जिन भी अधिकारियों ने यह कृत्य किया है, उनके खिलाफ तुरंत और कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए।

गुटबाजी और ‘ब्राह्मण पॉलिटिक्स’ का उभार राजनीतिक विश्लेषकों का स्पष्ट मानना है कि यह केवल संतों के सम्मान का मामला नहीं है, बल्कि इसके पीछे गहरी ‘जातीय राजनीति’ (Caste Politics) और बीजेपी के अंदरूनी वर्चस्व की लड़ाई छिपी है।

  1. ब्राह्मण वोट बैंक की चिंता: 2024 के लोकसभा चुनावों में यूपी में बीजेपी के खराब प्रदर्शन के पीछे एक बड़ा कारण ब्राह्मणों की नाराजगी को भी माना गया था। अब 2027 के विधानसभा चुनावों से पहले, ब्रजेश पाठक जैसे नेता ब्राह्मणों को यह संदेश देने की कोशिश कर रहे हैं कि वे उनके (और संतों के) सम्मान के लिए सरकार के फैसलों के खिलाफ भी खड़े हो सकते हैं। हाल ही में ब्रजेश पाठक द्वारा 101 बटुक ब्राह्मणों का पैर पूजना और उन पर पुष्प वर्षा करना इसी ‘डैमेज कंट्रोल’ का हिस्सा माना जा रहा है।
  2. संगठन बनाम सरकार की लड़ाई: केशव प्रसाद मौर्य हमेशा से संगठन को सरकार से ऊपर मानते आए हैं। 2017 में सीएम पद की रेस में योगी से पिछड़ने और 2022 में अपनी सिराथू सीट हारने के बाद से ही उनके और योगी के बीच ‘कोल्ड वॉर’ की खबरें आती रही हैं। दीपोत्सव जैसे बड़े सरकारी कार्यक्रमों से केशव की दूरी और उनके हालिया बयान (कि ‘संगठन सरकार से बड़ा है’) इस बात की तस्दीक करते हैं कि यूपी बीजेपी में ‘ऑल इज वेल’ नहीं है।

आरएसएस (RSS) प्रमुख मोहन भागवत की एंट्री से बढ़ी हलचल यूपी बीजेपी में मचे इस सियासी घमासान के बीच, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत (Mohan Bhagwat) का लखनऊ दौरा और उनकी ताबड़तोड़ बैठकें बेहद अहम मानी जा रही हैं। भागवत ने लखनऊ के निराला नगर स्थित शिशु मंदिर में पहले सीएम योगी के साथ करीब 30 मिनट तक एकांत में बातचीत की।

दिलचस्प बात यह रही कि इसके तुरंत बाद, भागवत ने दोनों उपमुख्यमंत्रियों—केशव प्रसाद मौर्य और ब्रजेश पाठक—को भी अलग-अलग बुलाया और उनसे भी 30-30 मिनट तक चर्चा की। हालांकि संघ की ओर से इसे ‘शिष्टाचार भेंट’ बताया गया है, लेकिन सूत्रों का दावा है कि इन बैठकों में यूपी की वर्तमान सामाजिक स्थिति, ब्राह्मणों की नाराजगी, सरकार-संगठन के बीच का तालमेल और आगामी विधानसभा चुनावों की रणनीति पर गहन मंथन हुआ है।

क्या यूपी में ‘अकेले’ पड़ गए हैं सीएम योगी? शंकराचार्य विवाद ने एक बात तो साफ कर दी है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अपनी ही सरकार और पार्टी के भीतर इस मुद्दे पर बिल्कुल ‘अकेले’ नजर आ रहे हैं। एक तरफ जहां योगी प्रशासनिक अनुशासन और ‘नो-नॉनसेंस’ अप्रोच पर अड़े हैं, वहीं उनके दोनों प्रमुख सहयोगी (डिप्टी सीएम) संतों और जातियों (विशेषकर ब्राह्मणों) की भावनाओं को सहलाते हुए अपना अलग सियासी जनाधार मजबूत करने में जुटे हैं।

यह टकराव केवल लखनऊ तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके तार दिल्ली दरबार से भी जुड़े माने जा रहे हैं। क्या बीजेपी आलाकमान 2027 के चुनावों से पहले यूपी कैबिनेट या संगठन में कोई बड़ा फेरबदल करेगा? क्या योगी बनाम मौर्य-पाठक की यह गुटबाजी पार्टी को नुकसान पहुंचाएगी? ये वो सवाल हैं जिनके जवाब आने वाले कुछ महीनों की राजनीतिक करवटें ही तय करेंगी। फिलहाल, यूपी की सियासी हांडी में जो ‘खिचड़ी’ पक रही है, उसकी आंच ने लखनऊ से लेकर दिल्ली तक सबको बेचैन कर दिया है।

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Thakur Pawan Singh Editor in Chief Taj News

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