Rajendra Sharma Article Himanta Biswa Sarma Constitution Attack

Opinion Desk, Taj News Published by: ठाकुर पवन सिंह | Updated: Thu, 12 Feb 2026 02:30 PM IST

आगरा (एक नजरिया): असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा और उनकी पार्टी द्वारा जारी एक वीडियो ने भारतीय राजनीति में भूचाल ला दिया है। वरिष्ठ पत्रकार राजेंद्र शर्मा का मानना है कि यह केवल एक राजनीतिक विज्ञापन नहीं, बल्कि संविधान की छाती पर ‘पाइंट ब्लैंक’ फायर है। वीडियो में जिस तरह एक विशेष समुदाय को निशाना बनाया गया है, वह ‘गन कल्चर’ से आगे बढ़कर फासीवादी मानसिकता का प्रदर्शन है।

✒️ राजेंद्र शर्मा

(वरिष्ठ पत्रकार एवं संपादक, ‘लोकलहर’)

⚡ विश्लेषण के मुख्य अंश (Key Highlights)

  • 🔫 पाइंट ब्लैंक फायर: हिमंत बिस्व सरमा का वीडियो संविधान और लोकतंत्र पर सीधा हमला है।
  • 🤐 शीर्ष नेतृत्व की चुप्पी: मोदी-शाह की चुप्पी बताती है कि यह सब एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है।
  • ⚖️ संस्थाओं का पतन: चुनाव आयोग और न्यायपालिका की निष्क्रियता बहुसंख्यक सांप्रदायिकता को बढ़ावा दे रही है।
Rajendra Sharma Article Himanta Biswa Sarma Constitution Attack
संविधान की छाती पर पाइंट ब्लैंक फायर! (आलेख : राजेंद्र शर्मा)

आखिरकार, हिमांत बिश्वशर्मा ने और अकेेले विश्व शर्मा ने ही नहीं, उनके नेतृत्व में भाजपा की असम इकाई ने भी, भारतीय संविधान को खुली चुनौती दे ही दी। भाजपा के आधिकारिक हैंडल से प्रसारित एक वीडियो संदेश में, बिश्वशर्मा हाथों में तरह-तरह की बंदूकें/ पिस्तौलें लिए, अमरीकी फिल्मों के कॉउबाय की मुद्राओं में प्रकट ही नहीं हुए, वह अपने हथियारों से गोलियां दागते हुए दिखाई भी दिए। याद रहे कि बंदूकों के साथ अपने गीतों को फिल्माने के लिए ही पंजाब में तथा अन्यत्र कई गायकों को हिंसा को बढ़ावा देने की धाराओं में कानूनी कार्रवाई का सामना करना पड़ा है।

फासीवादी नरसंहार का मॉडल

इस ”गन कल्चर” को एक गंभीर खतरे की तरह चित्रित किया जाता रहा है। लेकिन, भाजपायी मुख्यमंत्री हिंसा के जरिए अपनी ”मर्दानगी” के प्रदर्शन तक ही नहीं रुके। इससे आगे बिश्वशर्मा ने, फासीवादी नरसंहार का मॉडल पेश करने के रास्ते पर लंबी छलांग लगायी है। बिश्वशर्मा ने सीधे जिंदा लोगों पर निशाना लगाया। और निशाने का चुनाव उनकी ”मर्दानगी” के वास्तविक चरित्र का पूरी तरह से खुलासा कर देने वाला था। निशाने पर जो दो लोग नजर आते हैं, वेशभूषा से साफ तौर पर मुसलमान हैं — एक अपेक्षाकृत युवा और एक अधेड़। शर्मा निशाना साधकर गोली दागते नजर आते हैं। और भाजपायी वीडियो खुशी से एलान करता है — पाइंट ब्लैंक!

“किसी टिप्पणीकार ने ध्यान दिलाया कि पाइंट ब्लैंक के फायर से संघ परिवार का नाता पुराना है। जनवरी 1948 में जब गोडसे की पिस्तौल से निकली तीन गोलियों ने महात्मा गांधी की जान ली थी, वह फायर भी पाइंट ब्लैंक का बताया गया था।”

परदेश में गले लगाना, देश में गोली चलाना

स्वाभाविक रूप से, अल्पसंख्यकों के खिलाफ नरसंहार के इस तरह के खुले आह्वान पर, मुख्यधारा के मीडिया पर संघ-भाजपा के पूर्ण नियंत्रण के बावजूद, काफी हो-हल्ला मचा। अन्य चीजों के अलावा इस पर भी तीखी टिप्पणियां आयीं कि शर्मा के नेतृत्व में असम भाजपा द्वारा उक्त वीडियो विज्ञापन ठीक उस समय जारी किया गया था, जब उन्हीं की पार्टी के प्रधानमंत्री, नरेंद्र मोदी 65 फीसद से अधिक मुस्लिम आबादी वाले और घोषित रूप से इस्लामी राज्य, मलेशिया की मेहमान नवाजी का आनंद ले रहे थे। परदेश में मोदी मुस्लिम नेताओं को गले लगा रहे थे और भारत में उनकी डबल इंजन सरकार का असम का डिब्बा, मुसलमान की पहचान कर, पाइंट ब्लैंक से फायर कर रहा था!

‘संदेश’ देकर हटाने का पुराना खेल

निंदा के इन स्वरों को अपने अनुमान से ज्यादा तेज होता देखकर, असम भाजपा ने अपने हैंडल से उक्त विज्ञापन वीडियो को डिलीट कर दिया। लेकिन, यह तभी किया गया, जब पहले यह सुनिश्चित कर लिया गया कि लाखों संघ-भाजपा समर्थक, इस वीडियो को देख चुके थे और आगे शेयर करने की शृंखलाएं शुरू कर चुके थे। यह किसी से छुपा हुआ नहीं है कि संघ-भाजपा ने खंडन-मंडन के इस तरह के धतकर्म में खूब महारत हासिल कर रखी है। किसी उकसावेपूर्ण सांप्रदायिक और इसलिए संविधान पर चोट करने वाले ”संदेश” को हवा में उछाल कर, इसकी थाह लेना और फिर रस्मी तौर पर उस संदेश को ”वापस” ले लेना, उनका जाना-पहचाना खेल है।

‘खतरे’ का जाप और चुनावी तुरुप

संघ-भाजपा के शीर्ष नेतृत्व, खासतौर पर मोदी-शाह जोड़ी की, ऐसे सभी मामलों में चुप्पी वैसे तो एक आम कायदा ही है, फिर भी आने वाले विधानसभाई चुनावों के संदर्भ में यह चुप्पी उनके लिए और भी जरूरी है। यह थोड़े भी राजनीतिक रूप से सजग, तटस्थ प्रेक्षकों से छुपा नहीं हैं कि आम तौर पर आने वाले राज्य विधानसभाई चुनावों में, संघ परिवार को अपनी अति-उपयोग से बुरी तरह घिस चुकी, हिंदुत्ववादी सांप्रदायिक तुरुप का ही सहारा है। वास्तव में खुल्लमखुल्ला सांप्रदायिक तुरुप का केंद्रीय आधार के रूप में सहारा लेने की शुरूआत तो, 2024 के आम चुनाव के दूसरे-तीसरे चरण से ही शुरू हो गयी थी।

संविधान की रक्षा कौन करेगा?

फिर भी हैरानी की बात है कि इस पर शायद ही किसी को हैरानी होगी कि बहुसंख्यक सांप्रदायिकता के इस खेल को रोकने के लिए, बिखरे हुए जनमत के सिवा, संविधान की रक्षा के लिए जिम्मेदार किसी भी संस्था में शायद ही कोई हरकत नजर आती है। संविधान की शपथ लेकर, सभी लोगों के हितों की रक्षा करने का वचन देने वाला, एक राज्य का मुख्यमंत्री खुले आम आबादी के एक हिस्से के नरसंहार के आह्वान कर रहा है और सर्वोच्च न्यायालय समेत, समूची न्याय प्रणाली इसे अनदेखा कर के अपने ‘न्याय करने’ की रस्मअदायगी करने में लगी हुई है।

बहुसंख्यक सांप्रदायिकता की ताकतें, धर्मनिरपेक्ष, जनतंत्रात्मक संविधान को तेजी से पीछे धकेल रही हैं। न्यायपालिका समेत इसकी रक्षा के लिए जिम्मेदार सभी संस्थाएं, पीछे खिसकते हुए इसके लिए जगह खाली कर रही हैं। संविधान की छाती पर पाइंट ब्लैंक फायर खोल दिया गया है।

यह भी पढ़ें: राजेंद्र शर्मा के अन्य ओपिनियन (Opinion) पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।

(डिस्क्लेमर: इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं। ताज न्यूज़ नेटवर्क का इससे सहमत होना अनिवार्य नहीं है।)

#Constitution #HimantaBiswaSarma #Opinion #RajendraSharma #Democracy #TajNews #PointBlankFire

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *