
Opinion Desk, Taj News Published by: ठाकुर पवन सिंह | Updated: Thu, 12 Feb 2026 09:50 AM IST
आगरा: “क्या चीखने-चिल्लाने से इतिहास बदल जाता है?” यह सवाल आज वरिष्ठ पत्रकार बृज खंडेलवाल अमेरिका की मौजूदा स्थिति पर पूछ रहे हैं। भारत और यूरोपीय संघ (EU) के बीच हुई ऐतिहासिक डील (Mother of all Deals) ने अमेरिका की नींद उड़ा दी है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की बौखलाहट अब गाली-गलौज और बचकाने ट्वीट्स में बदल चुकी है। लेकिन इससे भी ज्यादा चिंताजनक है अमेरिकी बुद्धिजीवियों की खामोशी।

बृज खंडेलवाल
वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक
⚡ विश्लेषण के मुख्य अंश (Key Highlights)
- 🇺🇸 ट्रंप की बौखलाहट: भारत-EU डील पर ट्रंप की प्रतिक्रिया नीति नहीं, बल्कि एक ‘दबंग की दहाड़’ है।
- 🤐 बुद्धिजीवियों की चुप्पी: अमेरिका की लिबरल लॉबी, यूनिवर्सिटी और मीडिया अपने घर में लगी आग पर मौन क्यों हैं?
- 🌍 नया विश्व: गाली, घमंड और गिरावट के बाद अब दुनिया आगे बढ़ रही है, अमेरिका पीछे छूट रहा है।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की बौखलाहट अब साफ झलक रही है। यूरोपीय संघ (European Union) पर उनकी ‘कैप्स-लॉक’ वाली, बचकानी और अपमानजनक टिप्पणियाँ कोई साधारण बयान नहीं हैं। ये भारत-यूरोपीय संघ के ऐतिहासिक “मदर ऑफ ऑल डील्स” पर झुंझलाहट का नतीजा हैं।
यह नीति नहीं, एक दबंग की आदिम दहाड़ है। यूरोप को “कंगाल” या “बच्चा” कहना उस इतिहास पर थूकना है, जिससे अमेरिका की पहचान बनी। अमेरिका का संविधान, संस्थाएँ और विचार—सब पर यूरोप की गहरी छाप है। ऐसे में यूरोप का मजाक उड़ाना अमेरिका के लिए आत्म-अपमान से कम नहीं है।
€15 ट्रिलियन का बाजार कोई खेल नहीं
हकीकत ये है कि यूरोप कोई खेल का मैदान नहीं, जहाँ “डैडी टैक्स” जैसे जुमलों से तालियाँ बटोरी जाएँ। यूरोपीय संघ का €15 ट्रिलियन का सिंगल मार्केट दुनिया का सबसे परिष्कृत ढांचा है। हर साल 600 अरब डॉलर से ज्यादा अमेरिकी सामान यूरोप खरीदता है। ऐसे साझेदार का उपहास करना आर्थिक आत्महत्या है।
सबसे डरावनी है ‘खामोशी’
इस तमाशे में सबसे डरावनी अमेरिका के बुद्धिजीवी वर्ग की खामोशी है। अमेरिका की तथाकथित लिबरल अंतरात्मा कहाँ है? यूनिवर्सिटियाँ, थिंक-टैंक्स और एडिटोरियल बोर्ड्स क्यों चुप हैं? जो दुनिया भर में लोकतंत्र की खामियाँ तलाशते हैं, वे अपने घर की सांस्कृतिक-कूटनीतिक आगजनी पर मौन क्यों हैं? यह चुप्पी कायरता नहीं, बल्कि मानसिक जड़ता का संकेत है।
“भारत-ईयू डील कोई तंज नहीं, भविष्य का खाका है। दुनिया की दूसरी लोकतांत्रिक ताकतें जुड़ रही हैं। अमेरिका जोकर बने तो उसकी मर्जी। यूरोप निर्भरता बदल रहा है और मार-ए-लागो के अपमान इसे और तेज कर रहे हैं।”
निष्कर्ष: अमेरिका पीछे छूट रहा है
ट्रंप की बौखलाहट अमेरिकी पतन का मील का पत्थर साबित होगी। देश उस ताकत के हाथों हाइजैक हो रहा है, जो विरासत से नफरत करती है और आपसी निर्भरता को नहीं समझती। दुनिया आगे बढ़ रही है। लोग गंभीर कमरों में फ्यूचर के सौदे कर रहे हैं, जबकि अमेरिका जहरीली छाया में चिल्लाता हुआ पीछे छूट रहा है।
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(डिस्क्लेमर: इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं। ताज न्यूज़ नेटवर्क का इससे सहमत होना अनिवार्य नहीं है।)
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