
आगरा।
मानव जीवन में सुख की तलाश सदियों से सबसे बड़ा उद्देश्य और संघर्ष का केंद्र रही है। जन्म से मृत्यु तक मनुष्य जिन वस्तुओं, संबंधों, पदों और उपलब्धियों की आकांक्षा करता है, उनका मूल लक्ष्य सुख-प्राप्ति ही होता है। लेकिन दर्शन, इतिहास और जीवनानुभव यह संकेत करते हैं कि जिसे सामान्यतः सुख माना जाता है, वह प्रायः क्षणिक और भ्रमजन्य होता है, जबकि दुःख जीवन का एक सार्वभौमिक और स्थायी यथार्थ है।
इसी सच्चाई को बौद्ध दर्शन ने स्पष्ट और निर्भीक रूप से प्रस्तुत किया है। गौतम बुद्ध के उपदेश इस बात पर केंद्रित रहे कि सुख की अंधी खोज मनुष्य को और अधिक दुःख में जकड़ देती है। बुद्ध का प्रथम उपदेश ही “दुःख आर्यसत्य” से प्रारंभ होता है, जिसे अक्सर गलत रूप से निराशावाद समझ लिया जाता है, जबकि यह जीवन का यथार्थवादी विश्लेषण है।
सुख का भ्रम, दुःख की सच्चाई: जीवन-दर्शन की यथार्थवादी दृष्टि
डॉ प्रमोद कुमार
मानव जीवन की सबसे बड़ी जिज्ञासा और संघर्ष का केंद्र सदैव “सुख” रहा है। जन्म से लेकर मृत्यु तक मनुष्य जिस वस्तु, संबंध, पद, सत्ता और उपलब्धि की खोज करता है, उसका मूल उद्देश्य सुख-प्राप्ति ही होता है। किंतु इतिहास, दर्शन, अनुभव और आत्मचिंतन का गहन अध्ययन यह संकेत करता है कि जिसे मनुष्य सुख समझता है, वह प्रायः क्षणिक, सापेक्ष और भ्रमजन्य होता है, जबकि दुःख जीवन का एक स्थायी, सार्वभौमिक और निर्विवाद सत्य है। इसी यथार्थ को बौद्ध दर्शन ने अत्यंत निर्भीकता और वैज्ञानिक विवेक के साथ उद्घाटित किया। तथागत गौतम बुद्ध का जीवन और उपदेश इस बात के सशक्त प्रमाण हैं कि सुख की खोज में भटकता मानव दुःख से और अधिक बंधता चला जाता है।

मनुष्य सामान्यतः सुख को इंद्रियजन्य अनुभूति से जोड़कर देखता है। भोग, उपभोग, संग्रह, सत्ता, यश और संबंध—ये सभी सुख के तथाकथित साधन माने जाते हैं। परंतु यह सुख स्थायी नहीं होता। जैसे ही परिस्थितियाँ बदलती हैं, वही सुख दुःख में परिवर्तित हो जाता है। धन की प्राप्ति सुख देती है, किंतु उसके संरक्षण का भय दुःख बन जाता है। प्रेम सुख देता है, किंतु बिछोह दुःख बन जाता है। शरीर स्वास्थ्य में सुखद लगता है, किंतु रोग में वही शरीर पीड़ा का कारण बनता है। इस प्रकार जिसे हम सुख कहते हैं, वह वास्तव में दुःख के अभाव की क्षणिक अनुभूति मात्र है, कोई स्वतंत्र और स्थायी सत्ता नहीं।
बौद्ध दर्शन इसी बिंदु से जीवन की व्याख्या आरंभ करता है। बुद्ध का प्रथम उपदेश ही “दुःख आर्यसत्य” से प्रारंभ होता है। यह कोई निराशावादी उद्घोष नहीं, बल्कि जीवन का यथार्थवादी विश्लेषण है। जन्म दुःख है, जरा दुःख है, व्याधि दुःख है, मरण दुःख है, अप्रिय से संयोग दुःख है और प्रिय से वियोग दुःख है—यह सूची जीवन की समग्रता को समेट लेती है। बुद्ध ने यह नहीं कहा कि जीवन में सुख नहीं है, बल्कि उन्होंने यह स्पष्ट किया कि जो सुख प्रतीत होता है, वह अनित्य, अस्थिर और तृष्णा-आधारित है।
सुख का भ्रम इसलिए उत्पन्न होता है क्योंकि मनुष्य “अनित्यता” के सत्य को स्वीकार नहीं करना चाहता। वह चाहता है कि जो सुख उसे मिला है, वह सदा बना रहे। किंतु संसार की प्रकृति परिवर्तनशील है। सब कुछ क्षण-क्षण बदल रहा है—शरीर, भावनाएँ, संबंध, परिस्थितियाँ। इस परिवर्तनशीलता में स्थायित्व की आकांक्षा ही दुःख का मूल कारण बनती है। बुद्ध इसे “तृष्णा” कहते हैं—चाहे वह भोग की तृष्णा हो, अस्तित्व की तृष्णा हो या नष्ट न होने की तृष्णा।
भारतीय दार्शनिक परंपरा में भी यह स्वीकार किया गया है कि सुख-दुःख द्वैतात्मक हैं। उपनिषदों में आत्मज्ञान के माध्यम से सुख-दुःख से परे जाने की बात कही गई है। गीता में कृष्ण कहते हैं कि इंद्रियों के विषयों से उत्पन्न सुख दुःख के ही कारण होते हैं और वे आदि-अंत वाले होते हैं। किंतु बौद्ध दर्शन इन दार्शनिक निष्कर्षों को अत्यंत व्यावहारिक और मनोवैज्ञानिक ढंग से प्रस्तुत करता है। बुद्ध आत्मा या ईश्वर की चर्चा में नहीं उलझते, बल्कि प्रत्यक्ष अनुभव, चित्त और व्यवहार के स्तर पर दुःख के कारणों और निरोध का मार्ग बताते हैं।
सुख का भ्रम केवल व्यक्तिगत स्तर पर नहीं, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक स्तर पर भी विद्यमान है। आधुनिक समाज विकास, उपभोग और भौतिक समृद्धि को सुख का पर्याय मान बैठा है। आर्थिक वृद्धि को सामाजिक सुख का मापदंड बना दिया गया है। किंतु परिणामस्वरूप तनाव, अवसाद, हिंसा, असमानता और अकेलापन बढ़ता जा रहा है। यह स्पष्ट संकेत है कि भौतिक सुख की अधिकता भी दुःख को समाप्त नहीं कर पाती। बल्कि कभी-कभी वह उसे और गहरा कर देती है।
बौद्ध दर्शन इस संदर्भ में अत्यंत समकालीन प्रतीत होता है। वह कहता है कि जब तक मनुष्य अपने चित्त को प्रशिक्षित नहीं करता, तब तक बाह्य परिस्थितियाँ उसे सुखी नहीं बना सकतीं। सम्यक दृष्टि, सम्यक संकल्प, सम्यक वाणी, सम्यक कर्म, सम्यक आजीविका, सम्यक प्रयास, सम्यक स्मृति और सम्यक समाधि—यह अष्टांगिक मार्ग दुःख से मुक्ति का व्यावहारिक जीवन-दर्शन है। इसमें सुख की खोज नहीं, बल्कि दुःख के कारणों की समाप्ति का मार्ग सुझाया गया है।
यथार्थवादी दृष्टि का अर्थ यह नहीं कि जीवन निरर्थक या नीरस है। इसका अर्थ है—जीवन को जैसा है, वैसा स्वीकार करना। सुख के भ्रम से मुक्त होकर जब मनुष्य दुःख की सच्चाई को समझता है, तब उसके भीतर करुणा, विवेक और समता का विकास होता है। वह दूसरों के दुःख को समझ पाता है, क्योंकि वह अपने दुःख को पहचान चुका होता है। यही करुणा बौद्ध नैतिकता का मूल है।
आज के समय में जब व्यक्ति निरंतर सुख की तलाश में भाग रहा है—सोशल मीडिया, उपभोक्तावाद, प्रतियोगिता और प्रदर्शन के दबाव में—बौद्ध जीवन-दर्शन एक संतुलित दृष्टि प्रदान करता है। वह सिखाता है कि सुख को पकड़ने की चेष्टा ही दुःख का कारण है। जब मनुष्य अपेक्षाओं से मुक्त होकर क्षण में जीना सीखता है, तब चित्त में शांति उत्पन्न होती है। यह शांति किसी बाहरी उपलब्धि पर निर्भर नहीं होती।
दुःख की सच्चाई को स्वीकार करना साहस का कार्य है। यह आत्म-प्रवंचना से मुक्ति का मार्ग है। जो व्यक्ति यह मान लेता है कि जीवन में सब कुछ उसके अनुसार नहीं होगा, वही व्यक्ति वास्तविक रूप से परिपक्व होता है। बौद्ध दर्शन इसी परिपक्वता को प्रज्ञा कहता है। प्रज्ञा वह दृष्टि है, जो सुख-दुःख दोनों को समभाव से देखती है।
अंततः कहा जा सकता है कि “सुख का भ्रम, दुःख की सच्चाई” कोई नकारात्मक कथन नहीं, बल्कि जीवन को समझने की कुंजी है। यह कथन मनुष्य को पलायन नहीं, बल्कि जागरूकता की ओर ले जाता है। बौद्ध जीवन-दर्शन हमें यह सिखाता है कि दुःख से भागकर नहीं, बल्कि उसे समझकर ही मुक्ति संभव है। जब तृष्णा का क्षय होता है, तब न तो सुख की लालसा रहती है, न दुःख का भय—यही निर्वाण की दिशा है, यही जीवन-दर्शन की यथार्थवादी दृष्टि।
डॉ प्रमोद कुमार
डिप्टी नोडल अधिकारी, MyGov
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