Edited by: Thakur Pawan Singh | tajnews.in | Agra | 07 Mar 2026, 03:20 pm IST
Taj News Opinion Desk
विशेष संपादकीय लेख
अर्का राजपंडित
अनुवाद: संजय पराते
स्वतंत्र पत्रकार अर्का राजपंडित (अनुवाद: संजय पराते) ने अपने इस विश्लेषणात्मक लेख में पश्चिम बंगाल के 2026-27 बजट की जमीनी हकीकत को उजागर किया है। उन्होंने बताया है कि कैसे कल्याणकारी योजनाओं के दिखावे के पीछे राज्य भारी कर्ज, बढ़ती बेरोजगारी और खस्ताहाल औद्योगिक ढांचे से जूझ रहा है। पढ़िए उनका यह बेबाक आलेख:
पश्चिम बंगाल सरकार ने 2026-27 का राज्य बजट पेश किया है। सरकार ने इस बजट को ‘बंगाल का गौरव’ नाम दिया है। इस बड़े बजट का कुल आकार 4.06 लाख करोड़ रुपये है। दरअसल यह बजट मुख्यमंत्री ममता बनर्जी सरकार के पंद्रह साल पूरे होने का प्रतीक है। इसलिए सरकार ने अपनी एक गरीबपरस्त और प्रगतिशील छवि बनाई है। इसके अलावा ममता बनर्जी का समर्थन करने वाले एक उदार नेटवर्क ने इस बात को खूब आगे बढ़ाया है। वे लोग राज्य के नकद हस्तांतरण मॉडल को नव-उदारवाद के खिलाफ एक बड़ा विरोध बताते हैं। फिर भी अब यह झूठा दिखावा टूट रहा है। दरअसल ये कल्याणकारी कार्यक्रम निम्न वर्ग की कोई जीत नहीं दिखाते हैं। इसके बजाय ये योजनाएं सिर्फ़ ज़िंदा रहने के लिए थोड़ी राहत देती हैं। साथ ही ये योजनाएं एक आत्मनिर्भर उत्पादक अर्थव्यवस्था बनाने की गहरी नाकामी को छिपाती हैं। इस प्रगतिशील ब्रांडिंग का असल में मज़दूर वर्ग और किसानों की कठिनाईयों से कोई लेना-देना नहीं है।
पश्चिम बंगाल का नया राजकोषीय रोडमैप एक अलग ही कहानी बताता है। इससे पता चलता है कि राज्य की अर्थव्यवस्था पूरी तरह से संरचनात्मक निर्भरता में फंसी हुई है। इसके अलावा राजकोषीय भंगुरता का चक्र लगातार चल रहा है। सरकार ने 21.48 लाख करोड़ रूपये के जीएसडीपी का अनुमान लगाया है। इसके मुकाबले कुल राजस्व प्राप्ति सिर्फ 2,87,792 करोड़ रूपये रहने का अनुमान है। इसलिए राज्य की वित्तीय आमदनी स्थानीय टैक्स और केंद्रीय करों की हिस्सेदारी पर बुरी तरह निर्भर है। यह स्थिति एक ठहरे हुए अंदरूनी राजस्व आधार को साफ दिखाती है। नतीजतन राज्य स्वतंत्र रूप से अपनी कोई परिसंपत्ति का निर्माण नहीं कर पा रहा है। हालांकि सरकार राजस्व घाटे में 21,759 करोड़ रूपये की कमी का बड़ा दावा करती है। लेकिन ऐसे अनुमान अक्सर कर्ज़ से चलने वाले राज्य की कड़वी सच्चाई को छिपा लेते हैं। प्रशासन ने बाजार से 80,445 करोड़ रूपये का भारी उधार लेने का अनुमान लगाया है। इसलिए सरकार अपनी मौजूदा कमजोरियों की भरपाई के लिए राज्य के भविष्य को सीधे गिरवी रख रही है।
राज्य सरकार सामाजिक कल्याण के कार्यों पर 1.80 लाख करोड़ रुपये खर्च कर रही है। यह रकम कुल बजट का लगभग 45 प्रतिशत हिस्सा है। इसमें लक्ष्मीर भंडार योजना को 15,000 करोड़ रुपये तक बढ़ाना भी शामिल है। सरकार निजी श्रम बाजार की नाकामी की भरपाई के लिए सामाजिक मजदूरी दे रही है। नव-उदारवादी दौर में ये सुरक्षा उपाय ज़िंदा रहने के लिए बहुत ज़रूरी हैं। लेकिन सरकार इन योजनाओं को उद्योग और प्रौद्योगिकी के विकास के साथ बिल्कुल नहीं जोड़ती है। इसलिए ये योजनाएं गरीबी को खत्म करने के बजाय सिर्फ उसे प्रबंधित करने का एक तरीका बन जाती हैं। सरकार ने उद्योग और एमएसएमई के लिए बहुत कम आबंटन किया है। यह रकम कुल बजट के एक प्रतिशत से भी कम है। यह स्थिति सुनिश्चित करती है कि मज़दूर वर्ग हमेशा श्रम की एक आरक्षित सेना बना रहे। नतीजतन मजदूरों को उत्पादक रोज़गार के बजाय पलायन करने पर मजबूर होना पड़ता है। इसके अलावा वे सिर्फ राज्य से मिलने वाले पैसे पर गुज़ारा करते हैं।
सरकार ने पूंजीगत व्यय के लिए 86,533 करोड़ रूपये आबंटित किए हैं। यह रकम एक मज़बूत अधोसंरचना के निर्माण की योजना के लिए बिल्कुल नाकाफी है। यह सरकार का एक चूका हुआ विचार लगता है। यह निवेश बंगाल के उद्योगों और खेती-बाड़ी को बढ़ावा देने के लिए पर्याप्त नहीं है। जबकि बंगाल को एक नियमित गुज़ारे लायक अर्थव्यवस्था में बदलने के लिए इसकी सख्त ज़रूरत है। पश्चिम बंगाल बहुत ज़्यादा आर्थिक उतार-चढ़ाव से बुरी तरह ग्रस्त है। यह एक ऐसी कड़वी सच्चाई है जिसे हर कोई जानता है। लेकिन ममता बनर्जी के उदार दोस्त इस सच्चाई को बताने में अक्सर नाकाम रहे हैं। साल 2025-26 में राज्य की प्रति व्यक्ति आय लगभग 1,71,184 रूपये थी। यह आंकड़ा 2.12 लाख रूपये के राष्ट्रीय औसत से लगभग 20 प्रतिशत कम है। यह बड़ा अंतर प्रति व्यक्ति जीडीपी के मामले में पश्चिम बंगाल को भारत में 21वें स्थान पर धकेल देता है। इसके कारण पश्चिम बंगाल दक्षिणी और पश्चिमी भारत की औद्योगिक महाशक्तियों से काफी पीछे रह गया है।
यहाँ के घर-परिवारों के वित्तीय स्वास्थ्य की हालत भी उतनी ही चिंताजनक है। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के हाल ही के आंकड़े एक डरावनी तस्वीर पेश करते हैं। आंकड़ों से पता चलता है कि 2019 और 2025 के बीच इस राज्य में सालाना वित्तीय देनदारी में 102 प्रतिशत की भारी बढ़ोतरी हुई है। इसके उलट लोगों की वित्तीय संपत्ति में सिर्फ़ 48 प्रतिशत की ही बढ़ोतरी हुई है। इसका सीधा मतलब है कि लोगों की हर एक रूपये की बचत पर कर्ज़ लगभग दो रूपये बढ़ रहा है। यह भारी असंतुलन एक और बात से साफ होता है। पश्चिम बंगाल पर अब पूरे देश में सबसे ज़्यादा सूक्ष्म वित्त (एमएफआई) कर्ज बकाया है। कई गरीब ग्रामीण परिवारों के लिए अब बचत का मतलब संपत्ति निर्माण बिल्कुल नहीं है। बल्कि वे हर हफ़्ते या महीने में सिर्फ एमएफआई का कर्जा चुकाने के लिए बचत करते हैं।
स्वास्थ्य देखभाल और बैंक कर्ज तक पहुंच के संकट ने इस कर्ज़ के चक्कर को और बढ़ा दिया है। साल 2025-26 की एक विस्तृत रिपोर्ट में इस बात का खुलासा हुआ है। रिपोर्ट बताती है कि पश्चिम बंगाल में वित्तीय तनाव के सबसे ज़्यादा मामले मौजूद हैं। इसके कारण परिवारों को अस्पताल में भर्ती होने के खर्च के लिए अपनी संपत्ति बेचनी पड़ती है। कई बार उन्हें साहूकारों से भारी कर्ज़ लेना पड़ता है। नतीजतन सोने को गिरवी रखकर कर्ज लेना अब आखिरी उपाय नहीं रहा है। बल्कि गोल्ड लोन घरेलू कर्ज़ का मुख्य चालक बन गया है। साल 2025 के आखिर तक ये ऋण साल-दर-साल 125 प्रतिशत तक बढ़ गए हैं। यह बड़ी बढ़ोतरी ज़्यादातर सोने की रिकॉर्ड ऊँची कीमतों के कारण हुई है। साथ ही सुरक्षित ऋण विकल्पों में भारी कमी ने भी इसमें भूमिका निभाई है। इससे गरीब घरों के पास बहुत कम विकल्प बचे हैं। इसके अलावा राज्य की औद्योगिक बुनियाद भी बहुत कमज़ोर हो चुकी है। ममता बनर्जी के उदार दोस्त अक्सर इस गंभीर बात को नज़रअंदाज़ कर देते हैं।
राज्य की अर्थव्यवस्था में विनिर्माण क्षेत्र का योगदान सिर्फ़ 18.8 प्रतिशत ही रह गया है। यह आंकड़ा राष्ट्रीय औद्योगिक औसत से काफी कम है। सरकार ग्लोबल बिज़नेस समिट्स का जोर-शोर से प्रचार करती है। लेकिन इसके बावजूद 2019 और 2025 के बीच वास्तव में विदेशी प्रत्यक्ष निवेश बहुत कम आया है। इस दौरान एफडीआई का प्रवाह सिर्फ़ 15,256 करोड़ रूपये ही था। यह रकम महाराष्ट्र या कर्नाटक जैसे राज्यों द्वारा हासिल किए गए निवेश का एक बहुत छोटा सा हिस्सा है। इसके अलावा 2025 के उत्तरार्द्ध में राज्य के पूंजीगत व्यय में 35.1 प्रतिशत की भारी कमी आ गई है। यह गिरावट साफ दिखाती है कि राज्य सरकार दीर्घकालिक संपत्ति निर्माण पर ध्यान नहीं दे रही है। सरकार ज़रूरी कारखानों, पुलों और बंदरगाहों पर बहुत कम पैसा खर्च कर रही है। उच्च मजदूरी वाले औद्योगिक रोजगार के अभाव ने पश्चिम बंगाल को एक अलग दिशा में धकेल दिया है। वास्तव में राज्य अब एक श्रम निर्यात करने वाली अर्थव्यवस्था में बदल गया है। हालांकि सरकार आधिकारिक बेरोज़गारी दर 3.6 प्रतिशत बताती है।
लेकिन बेरोज़गारी भत्ते के लिए ‘बांग्लार युवा साथी’ योजना की मांग कुछ और ही दर्दनाक कहानी कहती है। लगभग 27.8 लाख युवा इस भत्ते की कतार में खड़े हैं। इनमें से कई युवाओं के पास उच्च शिक्षा की डिग्री मौजूद है। फिर भी उन्हें मूल भत्ते से ज़्यादा वेतन वाला कोई रोजगार नहीं मिल रहा है। इन भत्ते बांटने के लिए राज्य सरकार ने 2026-27 के बजट में 5,000 करोड़ रूपये का आबंटन किया है। इसे निजी क्षेत्र में खपत की गहरी अधोसंरचनात्मक कमी के लिए सिर्फ एक मरहम-पट्टी के तौर पर देखा जाना चाहिए। ग्रामीण इलाकों में बताई जा रही 3.1 प्रतिशत की बेरोज़गारी दर भी पूरी तरह गुमराह करने वाली है। क्योंकि राज्य की 63.2 प्रतिशत आबादी छोटे और अलाभकारी खेती के टुकड़ों में अपना काम करती है। यह स्थिति दरअसल छिपी हुई बेरोज़गारी का एक स्पष्ट और शास्त्रीय मामला है। मजदूरों के पलायन का भयानक स्तर राज्य के कार्यबल के अंदर की गहरी निराशा को दिखाता है। साल 2025 के अंत के सरकारी आंकड़ों के मुताबिक लगभग 22.40 लाख मजदूर दूसरे राज्यों में काम कर रहे हैं। वहीं श्रमश्री योजना की रिपोर्ट एक अलग आंकड़ा देती है।
रिपोर्ट के अनुसार 31.77 लाख प्रवासी मजदूरों ने लौटकर स्थानीय मदद पाने के लिए अपना पंजीयन कराया है। साल 2025 के एक स्वतंत्र अध्ययन में एक कड़वी सच्चाई सामने आई है। अध्ययन में पाया गया है कि इनमें से 62.9 प्रतिशत लोग सिर्फ़ बेहतर रोजगार के मौकों के लिए पलायन करते हैं। इसके अलावा 25 प्रतिशत प्रवासी परिवार भेजे गए पैसे का इस्तेमाल सिर्फ़ अपना पेट भरने के लिए करते हैं। आजीविका के लिए होने वाला यह पलायन एक बात को पूरी तरह पुष्ट करता है। आबादी के एक बड़े हिस्से के लिए राज्य छोड़ना ही आधारभूत पोषण की ज़रूरतों को पूरा करने का एकमात्र तरीका बन गया है। यह बार-बार दुहराई जाने वाली एक बड़ी आर्थिक नाकामी है। लेकिन मौजूदा सरकार का समर्थन करने वाले लोग इस सच्चाई को पूरी तरह अनदेखा कर रहे हैं। सरकार ने उद्योग और खनिज के लिए 2,842.96 करोड़ रूपये का आबंटन किया है। यह रकम कुल खर्च का सिर्फ़ 0.70 प्रतिशत ही है। यह बहुत कम निवेश खास तौर पर गहरी चिंता की बात है। क्योंकि राज्य अभी ज़्यादा उत्पादकता वाले विनिर्माण रोजगार की भारी कमी से जूझ रहा है।
विज्ञान, प्रोद्योगिकी और पर्यावरण के मामले में सरकार की यह अनदेखी और भी साफ़ नज़र आती है। इन क्षेत्रों को सिर्फ़ 155.94 करोड़ रूपये दिए गए हैं। यह रकम कुल बजट का लगभग 0.03 प्रतिशत ही है। यह बहुत कम वित्त-पोषण आधुनिक प्रौद्योगिकी में मुकाबला करने की राज्य की काबिलियत को असरदार तरीके से कम कर देता है। वैश्विक प्रतियोगी एआई, जैव-प्रौद्योगिकी और हरित ऊर्जा में भारी निवेश कर रहे हैं। वहीं पश्चिम बंगाल का आबंटन बेहद निराशाजनक है। इसमें से सिर्फ़ लगभग 82 करोड़ रूपये ही विज्ञान और प्रौद्योगिकी के लिए रखे गए हैं। यह स्थिति सुनिश्चित करती है कि राज्य के सबसे तेज़ दिमाग लगातार पलायन करते रहें। वे कर्नाटक, तमिलनाडु या महाराष्ट्र जैसे ज़्यादा प्रौद्योगिकी वाले आगे बढ़े हुए राज्यों में ब्रेन ड्रेन कर रहे हैं। शोध और विकास कार्यों में निवेश की यह कमी एक कड़वी सच्चाई को पक्का करती है। बंगाल एक प्रौद्योगिकी निर्माण राज्य होने के बजाय सिर्फ़ उपभोक्ता राज्य बना रहेगा। इससे उत्पादक रोज़गार के सृजन में अंतर और ज्यादा बढ़ जाता है। सरकार ने सिंचाई और बाढ़ नियंत्रण के लिए सिर्फ 5,858.95 करोड़ रूपये का आबंटन किया है।
यह रकम बजट का सिर्फ़ 1.48 प्रतिशत है। पश्चिम बंगाल भारत के सबसे ज़्यादा बाढ़ वाले इलाकों में से एक है। राज्य उत्तर में नदी किनारे के कटाव और दक्षिण में ज्वार-भाटे से लगातार जूझता है। इस स्थिति को देखते हुए यह कम आबंटन बड़े अधोसंरचनात्मक परियोजनाओं के लिए बिल्कुल काफ़ी नहीं है। यह 1,500 करोड़ रुपए के घाटल मास्टर प्लान जैसे बार-बार आने वाले चुनावी मुद्दों को हल नहीं कर सकता। इसके अलावा यह पूरे राज्य भर की पुरानी नहर प्रणाली को आधुनिक बनाने के लिए भी नाकाफी है। इसी तरह ऊर्जा क्षेत्र को सिर्फ़ 5,372.50 करोड़ रूपये मिले हैं। यह रकम कुल खर्च का 1.36 प्रतिशत है। इस कम निवेश से राज्य के बहु-प्रचारित औद्योगिक लक्ष्यों में गतिरोध आने का बड़ा खतरा है। शिक्षा के क्षेत्र में उच्च शिक्षा के लिए 6,858.69 करोड़ रुपये का आबंटन किया गया है। फिर भी यह आंकड़ा मानवीय पूंजी में मौजूद गहरे संकट को पूरी तरह छुपाता है। राज्य सरकार ‘तरुणेर स्वप्नो’ जैसी छात्रों को प्रत्यक्ष फंड योजना का आबंटन जारी रखे हुए है। इसके तहत टैबलेट और स्मार्टफोन के लिए 900 करोड़ रुपये दिए गए थे। लेकिन शिक्षण की मुख्य अधोसंरचना पूरी तरह चरमरा रही है।
राज्य में अभी भी सेकेंडरी स्कूलों में शिक्षकों के 35,726 पद खाली पड़े हैं। इसके अलावा प्राथमिक शिक्षकों के 13,421 पद भी रिक्त हैं। यह भारी रिक्तता काफी हद तक 2016 के एसएलएसटी भर्ती घोटाले का सीधा नतीजा है। उस घोटाले में सुप्रीम कोर्ट ने व्यवस्था में गड़बड़ियों के कारण 2025 में लगभग 26,000 नियुक्तियां रद्द कर दी थी। स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए 22,338.08 करोड़ रुपये का बजट रखा गया है। यह स्वास्थ्य बजट साफ दिखाता है कि बीमा की वजह से सार्वजनिक कल्याण का तेज़ी से निजीकरण हो रहा है। स्वास्थ्य साथी मॉडल में लगभग 2.45 करोड़ परिवार शामिल हैं। यह मॉडल निजी चिकित्सा पूंजी के साथ दावा निर्धारण करने के लिए सार्वजनिक वित्त का अच्छे से इस्तेमाल करता है। यह योजना सार्वभौमिक कवरेज का बड़ा दिखावा करती है। जबकि ज़मीनी स्तर पर वित्तीय तनाव का मामला बहुत ज़्यादा बना रहता है। इससे गरीबों को बुनियादी इलाज के लिए अपनी संपत्तियां बेचनी पड़ती हैं। ग्रामीण इलाकों में डॉक्टर-मरीज का अनुपात राष्ट्रीय औसत 1:811 से काफी नीचे है। इसके बावजूद राज्य के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों को मज़बूत बनाने पर ध्यान नहीं दिया गया है।
इसके बजाय बजट में निजी अस्पतालों की लाभ-सीमा को प्राथमिकता दी गई है। इससे आम लोगों के जीने का सवाल पूरी तरह बाजार के भरोसे हो गया है। अंततः इस बजट में ‘गर्व’ करने लायक कुछ भी नहीं है। बल्कि यह बजट स्थाई निर्भरता की ऐसी योजना पेश करता है जो लोगों को हमेशा गरीबी में फंसाए रखता है। असल में असली तरक्की तभी होती है जब सरकार बिगड़ी हुई व्यवस्था को ठीक करे। सरकार को एक उत्पादक अर्थव्यवस्था का निर्माण करना चाहिए। ऐसी अर्थव्यवस्था जहाँ मज़दूरों को घर पर ही रोजगार और अहमियत दी जाए। उन्हें आजीविका के लिए दूसरे राज्यों में पलायन करने के लिए मजबूर न किया जाए। ममता बनर्जी के उदार समर्थक इस दर्दनाक सच्चाई को भले ही नज़रअंदाज़ कर सकते हैं। लेकिन लाखों प्रवासी मज़दूरों और कर्ज़ में डूबकर संघर्ष कर रहे गरीब परिवारों के पास ऐसा करने का कोई कारण मौजूद नहीं है। वे रोज़ाना इस आर्थिक संकट का सीधा सामना कर रहे हैं।
Thakur Pawan Singh
Chief Editor, Taj News
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