Vishnu Nagar political satire article on Indian politics, nationalism and fake politicians

राजनैतिक व्यंग्य: राष्ट्रवाद के विकास में ‘नाड़े’ का योगदान! विष्णु नागर का बेहद चुटीला प्रहार

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Taj News Satire Desk, Taj News | Tuesday, March 24, 2026, 08:24:14 PM IST

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Taj News Satire Desk

राजनैतिक व्यंग्य-समागम
Vishnu Nagar Writer
विष्णु नागर
वरिष्ठ साहित्यकार एवं पत्रकार
राष्ट्रीय उपाध्यक्ष, जलेस
वरिष्ठ साहित्यकार विष्णु नागर ने अपने इस बेहद चुटीले और हास्यपूर्ण ‘राजनैतिक व्यंग्य’ में वर्तमान राजनीति की खोखली नौटंकियों पर करारा प्रहार किया है। उन्होंने ‘नाड़े’ के रूपक के ज़रिए बताया है कि कैसे आज सिर्फ दिखावे और मदारीपन से ही ‘राष्ट्रवाद’ का विकास हो रहा है। पढ़िए यह शानदार व्यंग्य:

मुख्य बिंदु

  • राष्ट्रवादी जी का पजामा हमेशा खिसक जाता था; उन्हें शक था कि यह सेकुलरों का ही कोई बड़ा षड़यंत्र है।
  • भाषण के ठीक बीचों-बीच नाड़ा कसने की उनकी यह खास कला जनता के बीच भारी मनोरंजन का विषय बन गई थी।
  • जनता ने उनका नाम ही ‘नाड़ावाला’ रख दिया; उनकी रैलियों में प्रधानमंत्री से भी ज्यादा तालियां बजने लगीं।
  • इस ‘मदारीपन’ की ख्याति दिल्ली तक पहुंची; उन्हें सिर्फ ‘नाड़ा कसने’ के लिए मंत्री पद दे दिया गया।

हमारे एक बहुत बड़े राष्ट्रवादी जी थे। उनके पजामे को बार-बार नीचे खिसकने की बहुत ही गंदी आदत लग गई थी। चाहे वे कितनी ही होशियारी दिखा लें, या कितनी भी सावधानी बरत लें। उनका पजामा नीचे खिसके बिना बिल्कुल मानता ही नहीं था। राष्ट्रवादी जी को पूरा शक था कि राष्ट्रवाद के विरुद्ध यह ज़रूर सेकुलरों का कोई बड़ा षड़यंत्र है। मगर उनकी सरकार ने कभी इसकी जांच ‘सीबीआई’ (CBI) से करवाने की कोई आवश्यकता ही नहीं समझी! हालांकि, खुशकिस्मती से हमारे राष्ट्रवादी जी इतने जागरूक और सतर्क इंसान थे। वे अपने पजामे के बिल्कुल नीचे गिरने से ऐन पहले ही पूरी स्थिति संभाल लेते थे। वे फुर्ती से अपना नाड़ा दुबारा कस लेते थे। ऐसी विकट चुनौती उनके सामने हर घंटे-दो घंटे में एक बार जरूर आ जाती थी। और वे उसे सफलतापूर्वक और बड़ी कुशलता से संभाल भी लेते थे!

चूंकि वे एक बहुत बड़े राष्ट्रवादी थे, तो राष्ट्र हित में उन्हें बार-बार लंबे भाषण भी देने पड़ते थे। यह तो उनका परम राष्ट्रीय कर्तव्य था। लेकिन, जब भी उनका जोशीला भाषण अपने बिल्कुल शिखर पर पहुंचने लगता था। तभी उनके पजामे को न जाने कैसे यह खास बात पता चल जाती थी। और वह तुरंत नीचे खिसकने के लिए बड़ी तेजी से दौड़ने लगता था! इसलिए, उन्हें मजबूरी में अपना भाषण बीच में ही रोकना पड़ता था। उन्हें अपना पूरा ध्यान नाड़ा कसने पर ही केंद्रित करना पड़ता था। इस अद्भुत दृश्य का पूरा आनंद मंच पर बैठे सभी नेता लेते थे। इसके अलावा, मंच से नीचे बैठे या खड़े लोग भी इसका खूब मज़ा लेते थे। भीड़ में से कुछ लोग सीटियां बजाकर अपनी भारी खुशी भी जाहिर करते थे। मगर राष्ट्रवादी जी पूरी तरह ध्यानस्थ होकर अपना यह काम करते रहते थे। वे किसी बात का बिल्कुल बुरा नहीं मानते थे। और वे अपना भाषण पुनः वहीं से पूरे जोश में आरंभ कर देते थे。

कभी-कभी तो रैलियों में स्थिति यहां तक आ जाती थी। जब वह अपना भाषण देने के लिए माइक पर खड़े होते थे। तो नीचे से कुछ शरारती श्रोता ज़ोर से चिल्लाते थे — ‘अरे, पहले अपना नाड़ा कस लो’। लेकिन, भीड़ में से कुछ दूसरे लोग इसका तुरंत विरोध भी करते थे। वे कहते थे, ‘नहीं राष्ट्रवादी जी, अभी बिल्कुल नहीं। आप इसे भाषण के ठीक बीचों-बीच उचित समय पर ही कसिएगा।’ यह सब सुनकर वह नेता जी सिर्फ ज़ोर से मुस्कुराते थे। और वे दूसरी तरह के श्रोताओं की इस भारी मांग को पूरा करते थे। वे हमेशा अपने भाषण के अधबीच में ही अपना नाड़ा कसते थे। ऐसा भी कभी-कभी होता था कि उनसे पहले वाले वक्ता को मंच पर बुलाते समय। कार्यक्रम का मुख्य संयोजक उन्हें चुपके से एक चेतावनी दे देता था। वह कहता था कि अब इनके बाद आपको ही बोलना है। इसलिए, आप इस बीच अपना नाड़ा ठीक से कस लें। लेकिन, ऐसा करने पर भी वह अनहोनी होकर ही रहती थी!

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उनके भाषण से पहले भारी भीड़ सिर्फ यह देखने के लिए जुटती थी। कि आखिर इनका नाड़ा कब और कैसे ढीला होगा? इसी मज़ेदार दृश्य को देखने की भारी आशा में श्रोता-दर्शक वहां आते थे। और हमारे राष्ट्रवादी जी उन्हें कभी निराश भी नहीं करते थे! राष्ट्रवाद के सामने उपस्थित तमाम भारी दुराशाओं के बीच वे चमक रहे थे। इस तरह वह देश में आशा के एकमात्र द्वीप बने हुए थे। कुछ ज्ञानी लोग मानते थे कि वह अपनी छवि बनाने के लिए ही यह सब करते हैं। वे मंच पर जान-बूझकर ऐसी हरकत करते हैं। वास्तव में, उनके इस तर्क में भी काफी जान थी। वहां की जनता ने प्यार से उनका उपनाम ही ‘नाड़ावाला’ रख रखा था। और हमारे राष्ट्रवादी जी इतने अधिक राष्ट्रवादी और सीधे थे। कि उन्होंने जनता का दिया यह नाम सहर्ष कुबूल कर लिया था。

अब उनका वह पुराना और पूरा नाम बिल्कुल नहीं लिया जाता था। ‘नाड़ावाला’ कहते ही वहां श्रोताओं में हर्ष की एक भारी लहर दौड़ जाती थी। और वह बड़ी शान से मुस्कुराते हुए सब श्रोताओं को नमस्कार करते थे। वे बड़े स्टाइल से अपना माइक संभाल‌ लेते थे। इसके बाद वे वहां तालियों के थमने का लंबा इंतजार करते थे। उनके मंच पर आने पर इतनी भारी तालियां बजती थीं। कि सचमुच इतनी तालियां तो स्वयं प्रधानमंत्री के भाषण के पहले और बाद में भी बिल्कुल नहीं बजती थीं! लेकिन, उनकी अपनी ही पार्टी का एक बड़ा वर्ग इस कारण उनके सख्त खिलाफ हो चला था। वह वर्ग इन्हें तुरंत पार्टी से बाहर निकालने की मांग करने लगा था। मगर उन्हें एक बात का भारी डर भी सता रहा था。

उन्हें डर था कि वह नेता जी कहीं पलटकर अचानक ‘धर्मनिरपेक्ष’ न हो जाएं। इसलिए, यह विरोधी वर्ग इस कारण बहुत सुस्त पड़ जाता था। बड़े राष्ट्रवादियों ने हाईकमान की कड़ी चेतावनी के बाद उन्हें निकालने की यह पूरी मुहिम बंद-सी कर रखी थी। फिर धीरे-धीरे उनकी यह शानदार ख्याति दिल्ली में प्रधानमंत्री तक भी पहुंची। तो एक बड़ी सभा में भाषण देने के लिए इन राष्ट्रवादी जी को विशेष रूप से बुलाया गया। हाईकमान पूरी तरह आश्वस्त हो गया कि यह बंदा बहुत ही काम का है। इस प्रकार वह राष्ट्रवाद के भारी प्रचार-प्रसार में राष्ट्रीय स्तर पर बहुत उपयोगी साबित हो सकता है। इसलिए, उन्हें तुरंत देश के केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल कर लिया गया। उनसे बहुत साफ-साफ शब्दों में एक बात कही गई। कि आपका एकमात्र काम हर बड़ी रैली में प्रधानमंत्री के आगमन से पहले भीड़ जुटाना है。

आपको अपने भाषण के दौरान कम से कम दो बार नाड़ा कसने के लिए अपना भाषण रोकना है। और आपको वहां ज़ोरदार ताली बजवाना है। बाकी यह भारी-भरकम मंत्री पद आपको सिर्फ गाड़ी-बंगला की सुविधा प्रदान करने के लिए दिया गया है। आप किसी भी सरकारी काम की बिल्कुल चिंता न करें। और अगर आप चिंता करेंगे तो आप तुरंत अपना पद गंवा बैठेंगे! बस जहां भी आपसे कहा जाए, आप वहां चुपचाप अपने दस्तखत कर दें! और अपना शेष काम सिर्फ प्रभु पर छोड़ दें! अब तो पूरे देश में उनकी भारी धूम मच गई थी! उन्हें देखकर अनेक राष्ट्रवादी नेता भी बिल्कुल यही शैली अपनाने लगे थे। मगर जो बात ओरिजनल में होती है, वह बात नकलों में कभी नहीं होती है। इसलिए, ऐसे नकलबाजों का विकास जिला स्तर से आगे कभी नहीं हो सका था। इस तरह उनकी पार्टी देश में बढ़ने लगी, और हमारे महान ‘राष्ट्रवाद’ का विकास बहुत तेजी से होने लगा。

Pawan Singh

Pawan Singh

Chief Editor, Taj News
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