आर्टिकल Desk | tajnews.in | Tuesday, March 24, 2026, 10:13:37 PM IST

Taj News Global Desk

मुख्य बिंदु
- स्पेन की वामपंथी सरकार ने नाटो का सदस्य होने के बावजूद अमेरिका को अपने सैन्य बेस का इस्तेमाल करने से साफ मना कर दिया।
- गंभीर आर्थिक संकट से जूझ रहे श्रीलंका ने भी अमेरिकी लड़ाकू विमानों को अपनी ज़मीन पर उतरने की अनुमति नहीं दी।
- खुद को ‘इस्लामिक राष्ट्र’ कहने वाले खाड़ी देशों (सऊदी अरब, कतर) ने ईरान पर हमले में अमेरिका-इजरायल का पूरा साथ दिया।
- हमले से 36 घंटे पहले इज़रायल की यात्रा और ईरान के सर्वोच्च नेता की हत्या पर भारत सरकार की ‘चुप्पी’ पर कड़े सवाल।
ईरान पर अमेरिका और इजरायल के भयानक हमले के बाद दुनिया का एक देश सबसे पहले मुखर होकर सामने आया है। वह देश बहुत ठोस तरीके से अमेरिका और इजरायल के खिलाफ मजबूती से खड़ा हुआ है। वास्तव में, वह बहादुर देश स्पेन है। हालांकि, स्पेन अमेरिका के नेतृत्व वाले ताकतवर सैन्य गठबंधन ‘नाटो’ (NATO) का एक अहम सदस्य है। वह उस यूरोपीय यूनियन का भी सदस्य है, जिसके अधिकांश देश अमेरिका का पूरा समर्थन कर रहे हैं। वे देश खुले या थोड़े ढंके तरीके से अमेरिका और इजरायल का साथ लगातार दे रहे हैं। स्पेन में इस समय वामपंथ की ओर झुकी हुई एक बहुत मज़बूत सरकार है। वहां ‘स्पेनिश सोशिलिस्ट वर्कस पार्टी’ की सरकार का राज है। वहां के प्रधानमंत्री वामपंथी पेड्रो सांचेज हैं। यूरोप और पश्चिमी दुनिया में स्पेन की सरकार ही एकमात्र ऐसी साहसी सरकार है।
जिसने साफ शब्दों में इस खूनी हमले को पूरी तरह गैर-कानूनी (अवैध) कहा है। उसने इसे एक तरफा सैन्य कार्रवाई भी बताया है। स्पेन के प्रधानमंत्री ने बहुत साफ शब्दों में कहा है कि हम इस विनाशकारी युद्ध के बिल्कुल खिलाफ हैं। हम इसमें ‘नाटो’ के सदस्य के रूप में बिल्कुल भी शामिल नहीं होंगे। स्पेन की ‘वर्कर्स पार्टी’ की सरकार ने सिर्फ एक कोरा बयान ही जारी नहीं किया है। बल्कि, इसके साथ उसने कई बहुत ठोस कूटनीतिक कदम भी तुरंत उठाए हैं। स्पेन ने अमेरिका को अपने सैन्य बेस का इस्तेमाल करने की कोई इजाजत बिल्कुल नहीं दी है। इसके बाद, बौखलाए हुए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने स्पेन के खिलाफ बहुत कुछ अनाप-शनाप बका है। ट्रंप ने स्पेन को कई गंभीर धमकियां भी दी हैं। इतना ही नहीं, नाटो का सक्रिय सदस्य होते हुए भी स्पेन ने एक और बड़ा कदम उठाया है।
स्पेन ने अपने देश के भीतर सभी अमेरिकी सैन्य गतिविधियों पर कड़ी रोक लगा दी है। इसके अलावा, उसने इजरायल से अपने राजदूत को भी तुरंत वापस बुला लिया है। स्पेन की वामपंथी सरकार के लिए अमेरिका और इजरायल के खिलाफ खड़ा होना कोई आसान काम बिल्कुल नहीं था। क्योंकि, स्पेन एक बहुत बड़ा और अहम यूरोपीय देश है। उसका अमेरिका से बहुत ही घनिष्ठ आर्थिक, राजनीतिक, तकनीकी और सैन्य संबंध मौजूद है। फिर भी, स्पेन की सरकार एक बहुत बड़ा रिस्क लेकर अमेरिका और इजरायल के खिलाफ मजबूती से खड़ी हुई है। इसमें स्पेन के मजदूर वर्ग और आमजन के बीच वहां की ‘वर्कर्स पार्टी’ का भारी जनाधार है। इसके साथ ही, उनकी उस वामपंथी विचारधारा के प्रति गहरी प्रतिबद्धता भी शामिल है। जो विचारधारा सभी देशों की संप्रभुता, राष्ट्रों की स्वतंत्रता और एक न्यायपूर्ण दुनिया में अपना पक्का विश्वास करती है।
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यूरोपीय देश स्पेन की ही तरह हमें पड़ोसी श्रीलंका की वामपंथी सरकार के कदमों की भी दाद देनी चाहिए। क्योंकि, उन्होंने भी अमेरिका और इजरायल को चुनौती देते हुए दो बड़े और ऐतिहासिक कदम उठाए हैं। श्रीलंका की सरकार से शक्तिशाली अमेरिका ने एक बड़ा अनुरोध किया था। उसने श्रीलंका से ईरान के खिलाफ युद्ध में अपनी ज़मीन (सैन्य अड्डे) का इस्तेमाल करने की अनुमति मांगी थी। लेकिन, श्रीलंका की सरकार ने अमेरिका की इस मांग को साफ शब्दों में पूरी तरह खारिज कर दिया। यह अहम सूचना श्रीलंका के वामपंथी राष्ट्रपति अनुरा कुमार दिसानायके ने खुद श्रीलंका की संसद को दी है। श्रीलंका के राष्ट्रपति ने संसद को बहुत गर्व से बताया कि सरकार ने अमेरिका के दो लड़ाकू विमानों को अनुमति देने से साफ इनकार कर दिया था।
अमेरिका उन विमानों को देश के दक्षिण-पूर्व स्थित मत्ताला अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर उतारना चाहता था। दिसानायके ने कहा कि जिबूती स्थित अमेरिकी अड्डे से दो युद्धक विमानों ने 4 और 8 मार्च को श्रीलंका आने की विशेष अनुमति मांगी थी। लेकिन, श्रीलंका ने अमेरिका के ये दोनों अनुरोध पूरी तरह अस्वीकार कर दिए थे। इसके साथ ही, श्रीलंका के तट के पास ईरान की नौसेना के एक जहाज पर अमेरिकी पनडुब्बी ने अचानक हमला किया था। जिसमें ईरान के 87 लोग बुरी तरह मारे गए थे। इसके अलावा, कई लोग बहुत बुरी तरह घायल भी हुए थे। तब श्रीलंका ने इस जहाज़ पर सवार सैनिकों को तुरंत बचाने, घायलों का इलाज कराने और शवों को निकालने के लिए अपनी पूरी ताकत लगा दी थी।
नतीजतन, श्रीलंका की नौ सेना ईरान के 32 लोगों को बचाने में पूरी तरह सफल रही। हालांकि, यह कार्रवाई श्रीलंका ने सिर्फ अंतरराष्ट्रीय कानूनों का अनुपालन करते हुए एक मानवीय सहायता के रूप में ही की थी। लेकिन, अमेरिका ने इसे भी अपने सख्त खिलाफ और ईरान के पक्ष में की गई एक कार्रवाई की तरह ही देखा। श्रीलंका के ये सभी कदम देखने में बहुत छोटे लग सकते हैं। लेकिन, अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में इन कदमों का बहुत बड़ा महत्व है। श्रीलंका ने यह करके अमेरिका के खिलाफ कितना बड़ा जोखिम लिया है, इसको हम दो बातों से आसानी से समझ सकते हैं। पहला तो यह कि श्रीलंका अभी एक बहुत गंभीर आर्थिक संकट से जूझ कर बाहर निकला है। अभी उसके उस भयानक आर्थिक संकट का पूरी तरह समाधान भी नहीं हुआ है।
इस संकट के समाधान में अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष (IMF), विश्व बैंक और अमेरिका-यूरोप की एक बहुत बड़ी भूमिका है। इसके बावजूद भी श्रीलंका ने अमेरिका को सीधा मना करने का भारी साहस दिखाया। उसने अमेरिका की इच्छा के खिलाफ खड़ा होने का एक बड़ा जोखिम उठाया है। दूसरी बात यह है कि आज दुनिया के अधिकांश बड़े देश अमेरिका के साथ खड़े हैं। श्रीलंका के पड़ोसी देश भारत और पाकिस्तान भी अमेरिका-इजरायल के साथ खड़े साफ दिख रहे हैं। उस मुश्किल हालात में श्रीलंका की वामपंथी सरकार और उसके राष्ट्रपति का यह निर्णय बहुत मायने रखता है। स्पेन का निर्णय पश्चिमी दुनिया, यूरोपियन यूनियन और नाटो का सदस्य होने के चलते बहुत मायने रखता है। तो श्रीलंका का निर्णय इसलिए महत्वपूर्ण हो जाता है कि वह युद्ध क्षेत्र के बिल्कुल दायरे का एक देश है।
वह देश ईरान का कई कूटनीतिक मायने में पड़ोसी भी है। लैटिन अमेरिका की इस युद्ध में सीधे तौर पर कोई भी भूमिका बिल्कुल नहीं है। लेकिन, वामपंथ की ओर झुके हुए ब्राजील के राष्ट्रपति और उनकी सरकार ने भी खुलकर अमेरिका और इजरायल की कड़ी निंदा की है। ब्राज़ील ने ईरान पर अमेरिकी-इजरायली हमले को सीधी दादागिरी कहा है। उसने इसे ईरान की संप्रभुता का खुला और बेशर्म उल्लंघन कहा है। यहां रूस और चीन की चर्चा करने की इसलिए विशेष जरूरत बिल्कुल नहीं है। क्योंकि, उनका अमेरिका से पहले से ही सीधी टकराहट का पुराना रिश्ता है। और भविष्य में भी उनके बीच गंभीर टकराहटों की पूरी संभावना है। वास्तव में, ये ही वे दो देश हैं, जिन्होंने इस खूनी हमले की सबसे पहले कड़ी निंदा की थी।
स्पेन और श्रीलंका जैसी मजबूत वामपंथी सरकारों का यह साहसी रुख बहुत कुछ बताता है। श्रमिकों को अपना आधार मानने वाली ब्राजील की सरकार का अमेरिका-इजरायल के खिलाफ खड़ा होना एक बड़ा कूटनीतिक संदेश है। यह बताता है कि वामपंथी वैचारिकी आज भी पार्टियों, नेताओं और व्यक्तियों को हर तरह के भारी अन्याय के खिलाफ खड़ा होने का पक्का दर्शन देती है। वह उन्हें विचार और लड़ने की असली कूबत देती है। यह बात सिर्फ कुछ वामपंथी पार्टियों की ही नहीं है। बल्कि, दुनिया भर की वामपंथी पार्टियां, उनके नेता-कार्यकर्ता और समर्थक बुद्धिजीवी भी आज मैदान में हैं। वे किसी भी अन्य वैचारिकी की पार्टियों की तुलना में इस विनाशकारी युद्ध की मुखालफत में बिल्कुल खुलकर खड़े हैं। ये पार्टियां, उनके छोटे ग्रुप, नेता और वामपंथी बुद्धिजीवी पूरी तरह डटे हुए हैं।
इसके अलावा, उनकी पत्र-पत्रिकाएं और मीडिया भी बिना किसी किंतु-परंतु के अमेरिका और इजरायल को एक बर्बर हमलावर के रूप में देख रहे हैं। वे उन्हें इंसानियत का नरसंहार करने वाले क्रूर दानव के रूप में देख रहे हैं। वे अपने-अपने देशों और विभिन्न अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इसका भारी विरोध लगातार कर रहे हैं। यहां तक कि वे सड़कों पर उतरकर अमेरिका-इजरायली हमले के खिलाफ ज़ोरदार प्रदर्शन भी कर रहे हैं। एक तरफ दुनिया में वामपंथी सरकारें, पार्टियां और कार्यकर्ता खुलकर अमेरिका-इजरायल के खिलाफ खड़े हैं। वहीं, दूसरी ओर खुद को ‘इस्लामिक राष्ट्र’ का दर्जा देने वाले या मुसलमानों का सच्चा हितैषी कहने वाले दुनिया के कई बड़े देश बिल्कुल खामोश हैं। विशेषकर पश्चिम एशिया के और ईरान के पड़ोसी देश पूरी तरह इस खूनी हमले में अमेरिका-इजरायल के साथ खड़े हैं।
ईरान और ईरानी जनता के खिलाफ हो रहे इस बर्बर हमले में ये देश पूरे के पूरे अमेरिका-इजरायल के सहयोगी बने हुए हैं। सऊदी अरब, कतर, ओमान, कुवैत और बेरूत आदि खाड़ी देशों के खुले सहयोग के बिना ऐसा बिल्कुल संभव नहीं था। इन देशों के साथ के बिना न तो इजरायल और न ही अमेरिका आज ईरान का कुछ बिगाड़ सकते थे। खाड़ी देशों के इन तथाकथित इस्लामिक राष्ट्रों में स्थित अमेरिकी सैन्य अड्डे के बिना अमेरिका और इजरायल ईरान पर इतना भारी हमला कभी नहीं कर सकते थे। पाकिस्तान तो आज अमेरिका और ट्रंप की चापलूसी करने की अपनी सारी पुरानी हदें पार कर चुका है। सच यह है कि खुद को इस्लामिक देश-राष्ट्र कहने वाले बहुलांश देश पूरी तरह से बिक चुके हैं। विशेषकर ईरान के पड़ोसी देश तो पूरी तरह अमेरिका-इजरायल के सामने पेट के बल लेट गए हैं।
इसके अलावा, खुद को ‘हिंदू राष्ट्र’ और हिंदुत्व हृदय सम्राट कहे जाने वाले हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का रुख भी हैरान करने वाला है। उन्होंने भारत में अपनी स्वतंत्र विदेश नीति और संप्रभुता को पूरी तरह किनारे लगाकर इस युद्ध में इजरायल-अमेरिका का सीधा साथ दिया है। ईरान पर अमेरिका-इजरायल के भयानक हमले के ठीक 36 घंटे पहले उन्होंने इजरायल की खास यात्रा की थी। उन्होंने वहां जाकर उसे भारत का अपना ‘फादर लैंड’ (पितृभूमि) तक कह डाला था। उन्होंने हर मुश्किल स्थिति में उसके साथ पूरी तरह खड़ा होने का पक्का वादा भी किया था। मोदी जी ने ईरान जैसे भारत के एक बहुत लंबे समय के सच्चे साथी के साथ पूरी तरह विश्वासघात किया है। ईरान के राष्ट्र प्रमुख खुमैनी की इजरायल-अमेरिका द्वारा एक गुंडे की तरह सरेआम हत्या कर दी गई।
लेकिन, भारत सरकार इस नृशंस हत्या पर लगातार अपनी चुप्पी साधे रही। आज तक भारत के प्रधानमंत्री या उनके किसी मंत्री ने इस हत्या की कोई निंदा नहीं की है। सभी अंतरराष्ट्रीय कानूनों का खुला उल्लंघन करके ईरान पर यह खूनी हमला किया गया है। वहां के सर्वोच्च नेता और अन्य निर्दोष लोगों की निर्मम हत्या पर भारत पूरी तरह चुप रहा। यहां तक कि ईरान की सैकड़ों मासूम बच्चियों की हत्या पर भी भारत ने अपना मुंह बिल्कुल नहीं खोला है। भारत के अधिकांश पूर्व ‘राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों’ (NSA) ने एक स्वर से भारत की इस कायरतापूर्ण पोजिशन की कड़ी आलोचना की है। उन्होंने इसे न केवल भारत राष्ट्र की संप्रभुता, गरिमा और ऐतिहासिक विरासत के खिलाफ कहा है। बल्कि, उन्होंने इसे हमारे अपने ‘राष्ट्रीय हितों’ के भी पूरी तरह खिलाफ माना है।
खुद को ‘इस्लामिक राष्ट्र’ कहने वाले ईरान के पड़ोसी पश्चिम एशिया के देश आज नंगे हो चुके हैं। या फिर ‘हिंदू राष्ट्र’ और ‘विश्व गुरु’ का झूठा दंभ भरने वाली भारत सरकार का यह दोहरा रवैया भी बेनकाब हो गया है। ईरान के खिलाफ बर्बर अमेरिका-इजरायल हमले में इनका सहभागी होना या अपनी चुप्पी साधे रखना दो बातें बिल्कुल साफ कर देता है। पहली बात तो यह है कि इनके लिए ‘धर्म’ सिर्फ अपनी सत्ता को कायम रखने का एक बड़ा हथकंडा है। यह सिर्फ आम जनता को भारी धोखा देने का एक सुंदर आवरण है। वास्तव में, इन सरकारों और शासकों का सच्चे धर्म से कोई खास लेना-देना बिल्कुल नहीं है। दूसरी कड़वी बात यह है कि जिस धर्म की ये लोग रोज़ कसमें खाते हैं। और जिसके वे सच्चे संरक्षक और सबसे बड़े चैंपियन होने का झूठा दावा करते हैं।
उस धर्म के न्याय के किसी भी मूल तत्व से इनका कोई लेना-देना बिल्कुल नहीं है। असल में ये सभी देश अपने-अपने देशों के मुट्ठी भर उच्च मध्यवर्ग और मध्यवर्ग के एक स्वार्थी हिस्से के ही प्रतिनिधि हैं। ये लोग सिर्फ उनके चाकर हैं। वे लोग सिर्फ उनके सुख-सुविधा और भारी विलासिता के रक्षक हैं। वे अपने देशों के बेईमान व्यापारियों, कारोबारियों और मुनाफाखोरों के बड़े कारोबार के कुशल प्रबंधक हैं। इनमें से कई नेता तो खुद के कारोबारी-व्यापारी हैं या फिर वे बड़े कारोबारियों-व्यापारियों के सबसे पक्के मित्र हैं। इन सब का निजी हित सिर्फ अमेरिकी कार्पोरेट-कार्पोरेशन, बड़े शेयर बाजारों, बैंकों और इनके प्रबंधकों से ही जुड़ा हुआ है। और, जिनके हितों के सबसे बड़े मैनेजर आजकल सिर्फ अमेरिका के डोनाल्ड ट्रंप ही हैं।
हां, इन शासकों के पास न्याय, गरिमा, संप्रभुता और व्यापक मानवता को केंद्र में रखने वाला कोई दर्शन बिल्कुल नहीं है। इनके पास कोई सच्चा विचार, कोई एजेंडा, कोई स्वप्न और कोई कार्यक्रम भी नहीं है। जहां तक पश्चिमी उदारवाद या नवउदारवादी कहे जाने वाले बड़े देशों की बात है। ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, इटली आदि देशों का प्रश्न भी यहां बहुत महत्वपूर्ण है। इनके देशों की आम जनता का एक बहुत बड़ा हिस्सा आज फिलिस्तीन की पीड़ित जनता के साथ खड़ा है। वह जनता इजरायल और उसके सबसे बड़े सहयोगी अमेरिका के पूरी तरह खिलाफ भी है। जनमत के इस भारी दबाव में इन देशों की लोकतांत्रिक सरकारें खुलकर अमेरिका-इजरायल का साथ नहीं दे पा रही हैं। लेकिन, ब्रिटेन ईरान के खिलाफ इस हमले में तमाम शाब्दिक आडंबरों के बाद भी अमेरिका-इजरायल को युद्ध में भारी सैन्य मदद दे रहा है। फ्रांस की स्थिति भी कमोबेश ब्रिटेन के जैसी ही है।
जर्मनी थोड़ी ज्यादा कूटनीतिक दूरी बनाए हुए है। इटली भी पूरी तरह अमेरिका-इजरायल के साथ आज खड़ा नहीं हो पा रहा है। पर इन सब बातों के बावजूद भी यह एक बिल्कुल खुला तथ्य है। कि इन देशों ने अंतरराष्ट्रीय कानूनों का खुला उल्लंघन करके ईरान पर हुए अमेरिका-इजरायल के हमले की अभी तक कोई निंदा नहीं की है। ईरान की संप्रभुता और उसकी आजादी के मनमाने तरीके से रौंदने की इन खूनी कोशिशों का इन देशों ने कोई खुला विरोध भी नहीं किया है। भले ही वे अपने देशों के जनमत और विश्व जनमत से बहुत डरे हुए हों। और दुनिया को बिला वजह भारी संकट में डाल देने वाले इस युद्ध में वे अमेरिका के हर आह्वान का सीधा साथ नहीं दे रहे हैं। और वे यह भी कह रहे हैं कि यह युद्ध कोई ‘नाटो’ का युद्ध बिल्कुल नहीं है।
इन तमाम सहमतियों और असहमतियों के बीच भी सच यही है कि पश्चिमी दुनिया का बड़ा हिस्सा झुका हुआ है। पश्चिमी दुनिया के अधिकांश उदारवादी लोकतांत्रिक देश की सरकारें ट्रंप और इजरायल के सामने पूरी तरह नतमस्तक हैं। वे भले ही इस्लामिक देशों और ‘हिंदू राष्ट्र’ के मसीहा की तरह उनके सामने लेटे हुए न हों। पर वे उनके सामने बुरी तरह झुके हुए ज़रूर हैं, कोई थोड़ा कम झुका है और कोई बहुत ज्यादा झुका है। बिल्कुल यही दयनीय स्थिति दुनिया भर के उदारवादी-लोकतांत्रिक कहे जाने वाली पार्टियों की भी है। दुनिया के तमाम नेताओं और बड़े बुद्धिजीवियों के एक बड़े हिस्से की भी यही स्थिति है। भारत में यदि वामपंथी पार्टियों, नेताओं और कार्यकर्ताओं को आज छोड़ दिया जाए। तो कोई भी दूसरी पार्टी या बड़ा नेता भारतीय जनमत को इस मुद्दे पर अमेरिका-इजरायल के खिलाफ खड़ा करने की कोई मजबूत पहलकदमी करता हुआ नहीं दिखाई दे रहा है।
उनकी भारत सरकार की आलोचना सिर्फ कुछ रस्मी शब्दों तक ही सीमित रह गई है। हालांकि, भारत में ऐसे गंभीर अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर वामपंथी पहलकदमी भी आज काफी कमजोर पड़ी है। व्यापक जन को हमेशा केंद्र में रखने वाला कोई दर्शन, विचार, स्वप्न, एजेंडा और कार्यक्रम ही दुनिया को बचा सकता है। उस पर आधारित कोई सच्चा संगठन, पार्टी या नेता ही अंत में राष्ट्रों की संप्रभुता को बचा सकता है। वह देशों की आजादी और आम जनता के शोषण-उत्पीड़न से जनता की मुक्ति का पक्का पक्ष ले सकता है। वह एक ऐसी नई दुनिया की रचना कर सकता है, जहां हर व्यक्ति, हर राष्ट्र और देश का बिल्कुल समान मूल्य हो। किसी भी ताकतवर देश पर किसी का कोई भी अनुचित वर्चस्व न हो। कोई भी देश किसी के भी अधीन और मातहत न हो।
वामपंथ के भारी पराजय के इस वर्तमान दौर में भी बची-खुची पार्टियों का रुख बहुत महत्वपूर्ण है। वामपंथ की कुछ सरकारों, नेताओं और कार्यकर्ताओं का अमेरिकी-इजरायली हमले के खिलाफ आज मजबूती से खड़ा होना बहुत अहम है। यह पूरी दुनिया को एक बहुत साफ कूटनीतिक संकेत देता है कि व्यापक मेहनतकश जन को केंद्र में रखनी वाली ‘वामपंथी वैचारिकी’ ही दुनिया का असली भविष्य है। हां, यह बिल्कुल सच है कि वह कोई सिर्फ अतीत का साधारण दुहराव नहीं होगा। बल्कि, वह 21वीं सदी की मानव जाति की सभी जरूरतों को केंद्र में रखकर एक नए रूप में सामने आएगी।

Pawan Singh
7579990777













