Jawarimall Parakh article on US imperialism, Israel-Iran conflict and global south

दुनिया को औपनिवेशिक दौर में ले जाने की कोशिश: अमरीकी साम्राज्यवाद और भारत की विदेश नीति

आर्टिकल

Edited by: Thakur Pawan Singh | tajnews.in | Agra | 11 Mar 2026, 02:15 am IST

Taj News Logo

Taj News Opinion Desk

विशेष संपादकीय लेख

Jawarimall Parakh Writer

जवरीमल्ल पारख

वरिष्ठ समालोचक एवं लेखक

विद्वान समालोचक एवं जनवादी लेखक संघ के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष जवरीमल्ल पारख ने अपने इस विशेष आलेख में अमरीकी साम्राज्यवाद, मध्य-पूर्व के ताज़ा हालात और भारत की बदलती विदेश नीति का बेहद गहरा और बेबाक भू-राजनीतिक विश्लेषण किया है। पढ़िए उनका यह आलेख:

मुख्य बिंदु

  • म्यूनिख सुरक्षा सम्मेलन में पश्चिमी साम्राज्यवाद की वापसी और ‘ग्लोबल साउथ’ पर नियंत्रण की अमरीकी रणनीति का खुलासा।
  • गाज़ा में इस्राइल का जनसंहार और ईरान पर अमरीका-इस्राइल के ताज़ा संयुक्त हमले का कूटनीतिक विश्लेषण।
  • भारत की विदेश नीति में आया बड़ा बदलाव और अमरीका-इस्राइल के प्रति बढ़ते एकतरफा झुकाव पर कड़े सवाल।
  • विवादित ‘एपस्टिन फाइलों’ के खुलासे और सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोगों के गठजोड़ से जुड़ी कड़वी सच्चाई।

फ़रवरी 2026 के म्यूनिख सुरक्षा सम्मेलन में अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने एक नई रूपरेखा पेश की। उन्होंने पश्चिमी प्रभाव को दुनिया में फिर से स्थापित करने की दिशा में एक बड़े बदलाव का संकेत दिया। उन्होंने पश्चिमी शक्ति के ऐतिहासिक विस्तार का परोक्ष रूप से बचाव किया। इसके साथ ही उन्होंने खनिज संसाधनों और आपूर्ति शृंखलाओं पर औद्योगिक प्रभुत्व सुरक्षित करने के लिए एक मजबूत एकजुट मोर्चा बनाने का आह्वान किया। रूबियो ने अपने भाषण में एक कड़ा तर्क दिया। उन्होंने कहा कि 1945 के बाद पश्चिमी प्रभाव में भारी गिरावट आई है। उपनिवेश-विरोधी आंदोलनों ने इस गिरावट को बहुत तेज किया था। रूबियो ने इस ऐतिहासिक बदलाव को पश्चिम की एक बहुत बड़ी ग़लती बताया। इसके बजाय उन्होंने पश्चिमी सभ्यता की सत्ता को पूरी दुनिया पर अधिक स्पष्ट और निस्संकोच रूप से फिर से थोपने की वकालत की।

रूबियो के अनुसार दूसरे विश्वयुद्ध के बाद पश्चिमी प्रभाव लगातार सिमटता गया। कम्युनिस्ट क्रांतियों और उपनिवेश-विरोधी विद्रोहों ने इसे और अधिक कमज़ोर किया। रूबियो इसे पश्चिम के लिए एक बहुत नकारात्मक मोड़ मानते हैं। वास्तव में रुबियो के इस भड़काऊ वक्तव्य को नव-उपनिवेशवाद या पश्चिमी साम्राज्यवाद की सीधी वापसी की पुकार के रूप में देखा जा सकता है। अमरीका अब ग्लोबल साउथ के देशों में मौजूद महत्वपूर्ण खनिज संसाधनों को हथियाना चाहता है। वह अपनी वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं को पूरी तरह सुरक्षित करना चाहता है। इसलिए अमरीका अपना पश्चिमी प्रभाव बढ़ाने की यह आक्रामक रणनीति अपना रहा है। यह रणनीति सिर्फ अमरीका को श्रेष्ठ बनाने तक सीमित नहीं है। बल्कि यह सीधे तौर पर अमरीकी साम्राज्य को पूरी दुनिया पर थोपने की एक खतरनाक योजना है। रूबियो के इस पूरे भाषण से एक बात बिल्कुल स्पष्ट हो जाती है। पश्चिम अब अपने प्रतिद्वंद्वियों के प्रभाव का हर हाल में मुकाबला करेगा। वह यह सुनिश्चित करेगा कि 21वीं सदी के उद्योगों पर पूरा नियंत्रण सिर्फ पश्चिम के पास ही रहे।

गाज़ा में इस्राइल पिछले कई महीनों से भयंकर जनसंहार कर रहा है। इसके साथ ही ईरान पर हाल ही में अमरीका और इस्राइल ने एक बड़ा संयुक्त हमला किया है। इन दोनों घटनाओं को ग्लोबल साउथ पर अपना पूर्ण नियंत्रण सुनिश्चित करने की इसी साम्राज्यवादी योजना के हिस्से के रूप में देखा जाना चाहिए। 7 अक्टूबर 2023 को हमास ने इस्राइल पर एक हमला किया था। इस्राइल ने इस हमले को अपना सबसे बड़ा बहाना बना लिया। इस बहाने की आड़ में इस्राइल गाज़ा में फिलिस्तीनियों पर पिछले दो साल से लगातार क्रूर हमले कर रहा है। यह कार्रवाई अब युद्ध नहीं बल्कि सीधे तौर पर एक नरसंहार बन चुकी है। हमास के हमले में लगभग 1100 लोग मारे गये थे। इसके अलावा लगभग 250 लोगों को बंधक बनाया गया था। लेकिन इसका बदला लेते हुए इस्राइल ने गाज़ा में अब तक 75 हजार निर्दोष फिलिस्तीनियों की बेरहमी से हत्या कर दी है। इन मृतकों में लगभग तीस हज़ार औरतें और मासूम बच्चे शामिल हैं।

दरअसल फिलिस्तीनियों पर यह इस्राइल का कोई पहला हमला नहीं था। पिछले सौ सालों से जबसे यहूदियों को इस क्षेत्र में बसाया गया है, वे लगातार वहाँ के अरबी-भाषी फिलिस्तीनी नागरिकों पर हिंसक हमले करते आ रहे हैं। साल 1948 में पश्चिम की साम्राज्यवादी ताक़तों ने ज़ोर-ज़बर्दस्ती फिलिस्तीन में यहूदियों का एक अलग राष्ट्र बना दिया। उन्होंने इस अवैध राष्ट्र को इस्राइल के नाम से पूरी दुनिया पर थोप दिया। लेकिन जितना इलाका इस्राइल के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित किया गया था, उसे वहाँ के शासकों ने कभी स्वीकार नहीं किया। अपने वजूद में आने के समय से ही इस्राइल फिलिस्तीनियों को उस पूरे क्षेत्र से खदेड़ने की कोशिश कर रहा है। इस्राइल फिलिस्तीनियों का पूरी तरह सफ़ाया करने के लिए उन पर लगातार हमले करता रहा है। 1967 के युद्ध में इस्राइल ने गाज़ा पट्टी, वेस्ट बैंक, पूर्वी येरुशलम और गोलन हाइट में फिलिस्तीनियों का भयंकर नरसंहार किया। उसने लोगों को वहाँ से खदेड़कर इस पूरे इलाक़े पर अपना अवैध क़ब्ज़ा कर लिया। इसके बाद इस्राइल ने वहाँ अपनी नई यहूदी बस्तियाँ बसा लीं। इस तरह फिलिस्तीनी क्षेत्रों पर हमला करके उन्हें इस्राइल में ज़बरदस्ती मिलाने का यह खूनी अभियान लगातार चलता आ रहा है। इस्राइल की इस क्रूर विस्तारवादी कार्रवाई को अमरीका और यूरोप के देशों का हमेशा हर तरह से समर्थन मिलता रहा है।

इस्राइल के पड़ोसी मध्य एशिया के अधिकतर देशों की बहुसंख्यक आबादी मुस्लिम है। यहाँ के अधिकतर देशों में राजशाही व्यवस्था लागू है। बहुत कम देशों में लोकतंत्र मौजूद है और वह भी आधा-अधूरा ही है। सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, क़तर, कुवैत, ओमान, जोर्डन और बहरीन जैसे सभी देशों में राजतंत्र है। इन देशों में धार्मिक तत्ववाद की एक बहुत अहम भूमिका है। दूसरी तरफ मिस्र, ईरान, इराक, सीरिया, लीबिया और लेबनान जैसे देशों में राजतन्त्र तो नहीं रहा है। लेकिन वहां तानाशाही और लोकतंत्र का एक अजीब मिला-जुला शासन तंत्र हमेशा रहा है। इन देशों में कोई एक नेता बहुत शक्तिशाली होता है और उसी का आदेश अंतिम माना जाता है। या फिर वहाँ धार्मिक तत्ववाद से संचालित एक धर्म-आधारित सीमित लोकतंत्र काम करता है। इन सभी देशों में कच्चे तेल के बहुत बड़े-बड़े भंडार मौजूद हैं। अमरीका सहित पश्चिम के सभी साम्राज्यवादी देशों की नज़र शुरू से ही इन विशाल तेल भंडारों पर टिकी रही है। अमरीका इस पूरे मध्य-पूर्व क्षेत्र पर अपना सैन्य और आर्थिक वर्चस्व क़ायम करने की कोशिश लगातार करता रहा है।

इस्राइल की स्थापना का एक बहुत बड़ा मक़सद यह भी था कि इसकी सुरक्षा के बहाने पूरे क्षेत्र पर प्रत्यक्ष या परोक्ष नियंत्रण हमेशा रखा जा सके। खाड़ी के जिन देशों में राजतन्त्र था, वे हमेशा अपनी ही जनता से डरते थे। उन्हें डर था कि कहीं जनता विद्रोह करके उन्हें सत्ता से बेदख़ल न कर दे। इसलिए उन्होंने अपनी राष्ट्रीय संप्रभुता को पूरी तरह तिलांजलि दे दी। उन्होंने अपनी सत्ता बचाने के लिए अमरीका के साथ एक बड़ा सामरिक और आर्थिक गठजोड़ कर लिया। उन्होंने अपने देश की ज़मीन पर अमरीका को बड़े-बड़े सैनिक अड्डे बनाने की खुली अनुमति दे दी। अमरीका के लिए भी यह स्थिति ज़्यादा अनुकूल थी। वह चाहता था कि इन देशों में धार्मिक तत्ववाद की जड़ें हमेशा मजबूत रहें। वह नहीं चाहता था कि जनता कभी भी उसके चंगुल से खुद को मुक्त करे। दूसरी ओर जो अरब देश राजतन्त्र से पूरी तरह मुक्त हो चुके थे, उनमें से कुछ देशों ने डरकर अमरीका के आगे अपने घुटने टेक दिए। लेकिन जिन देशों ने अमरीका के सामने झुकने से साफ़ इंकार कर दिया, उन पर अमरीका और नाटो देशों ने कोई न कोई झूठा बहाना बनाकर सीधा हमला किया। अमरीका ने वहाँ के स्वतंत्र शासकों को सत्ता से हटाकर उन देशों में अपनी कठपुतली सरकारें क़ायम कर दीं। इस तरह अमरीका ने वहाँ के अरबों डॉलर के तेल भंडारों पर आसानी से अपना कब्जा जमा लिया।

ईरान के भारी तेल भंडारों पर ब्रिटेन और अमरीका की नज़र काफ़ी पहले से गड़ी हुई थी। इसके लिए दूसरे विश्व युद्ध के ठीक बाद अमरीका ने वहाँ की चुनी हुई लोकतांत्रिक सरकार का तख्ता पलटवा दिया था। उसने शाह रज़ा पहलवी को ईरान की सत्ता पर बैठा दिया। शाह रज़ा पहलवी पूरी तरह ब्रिटेन और अमरीका के इशारे पर अपना शासन चलाता था। इस तरह ईरान के तेल पर पश्चिम की बड़ी तेल कंपनियों का पूरा एकाधिकार हो गया था। लेकिन साल 1979 की ऐतिहासिक इस्लामिक क्रांति ने सब कुछ बदल दिया। इस जनक्रांति के कारण रज़ा पहलवी को अपना देश छोड़कर सीधे अमरीका भागना पड़ा। शियाओं के सबसे बड़े धार्मिक नेता अयातुल्ला खौमेनी के नेतृत्व में ईरान में एक नए इस्लामिक गणराज्य की स्थापना की गयी। यह गणराज्य कोई बहुत आदर्श लोकतान्त्रिक राज्य बिल्कुल नहीं था। सामाजिक मामलों में इसके बहुत से नियम-क़ायदे पूरी तरह स्त्री-विरोधी थे। लेकिन ईरान के इस नए इस्लामिक गणराज्य ने पश्चिम के साम्राज्यवादी देशों को अपने यहाँ पैर जमाने का कोई अवसर फिर कभी नहीं दिया। ईरान ने अपने तेल भंडारों का उपयोग उन देशों के पक्ष में किया जो अमरीकी साम्राज्यवाद के अंधे पिछलग्गू नहीं थे। भारत और चीन को भी इस स्वतंत्र नीति का बहुत फ़ायदा मिला। आज मध्य-पूर्व में अब ईरान ही अकेला ऐसा शक्तिशाली देश बचा है जो फिलिस्तीनियों का खुलकर समर्थन करता आ रहा है।

इराक का खौफनाक उदाहरण हम सभी के सामने मौजूद है। जब इराक के शासक सद्दाम हुसैन ने अमरीका की शर्तों को मानने से इंकार कर दिया, तो हालात बदल गए। सद्दाम हुसैन तेल के बारे में अपने फ़ैसले खुद स्वतंत्र रूप से लेने लगे थे। अमरीका ने उसे कभी ईरान से लड़वाकर तो कभी कुवैत पर हमला करने के लिए उकसाकर पहले तो बाहरी युद्धों में उलझाए रखा। बाद में अमरीका ने विनाशकारी हथियारों (WMD) का एक बहुत बड़ा झूठा बहाना बनाया। अमरीका ने जनता के लिए दमनकारी तानाशाही को मुख्य कारण बताकर वहाँ लोकतंत्र स्थापित करने का नाटक रचा। साल 2003 में अमरीका ने इराक पर एकतरफा हमला कर दिया। इस भीषण युद्ध में लगभग दो लाख निर्दोष इराक़ी नागरिक मारे गये। यह भी पश्चिमी देशों का एक तरह का बड़ा नरसंहार ही था। अमरीकी और नाटो फ़ौजों द्वारा पूरे इराक पर बलपूर्वक अधिकार कर लिया गया। बाद में सद्दाम हुसैन को एकतरफा मुकदमा चलाकर फाँसी की सज़ा दे दी गई। इराक जैसी यही खूनी कहानी कमोबेश लीबिया और सीरिया में भी अमरीका ने दोहराई। खाड़ी के जितने भी अपेक्षाकृत आधुनिक, धर्मनिरपेक्ष और लोकतान्त्रिक देश थे, अमेरिका ने नाटो देशों की मदद से उन सबको पूरी तरह तबाह कर दिया।

इन तबाह हुए देशों में लोकतंत्र तो कभी स्थापित नहीं हुआ। लेकिन उनके तेल भंडारों पर अमरीकी कंपनियां अपना वर्चस्व स्थापित करने में पूरी तरह कामयाब रहीं। पिछले तीन दशकों से अमरीका और नाटो देश खाड़ी के देशों में लगातार अपना हिंसक हस्तक्षेप कर रहे हैं। वे उन देशों में लगातार तबाही मचाते रहे हैं जिन्होंने अमरीका के आगे घुटने टेकने से साफ़ इंकार कर दिया था। ऐसे देशों में अब केवल ईरान ही अकेला बचा हुआ था। ईरान ने न केवल अमरीका के आगे घुटने नहीं टेके, बल्कि वह इस्राइल के यहूदीवादी शासन से भय खाए बिना फिलिस्तीन का लगातार समर्थन करता रहा। दूसरे विश्व युद्ध के बाद इस्राइल की स्थापना सिर्फ़ इसलिए नहीं की गई थी कि हिटलर ने यूरोप में साठ लाख यहूदियों की हत्या कर दी थी। उस समय जब यहूदियों को यूरोप के किसी भी देश में शरण नहीं मिल रही थी, तब फिलिस्तीनियों ने ही इंसानियत के नाते उन्हें अपने यहाँ शरण दी थी। लेकिन यहूदीवादी यहूदियों ने फिलिस्तीन में शांतिपूर्वक रहने की बजाय अमरीकी साम्राज्यवाद की मदद से हिंसक रूप अपना लिया। उन्होंने फिलिस्तीनियों को ही उनके अपने घरों से खदेड़ना शुरू कर दिया। उस समय महात्मा गाँधी ने बिल्कुल सही कहा था कि हिटलर के कारण उजाड़े गए यहूदियों को उन्हीं देशों में वापस बसाया जाना चाहिए जहाँ से उन्हें उजाड़ा गया है।

अमरीका को मध्य-पूर्व में अपने सम्पूर्ण वर्चस्व की राह में ईरान ही एकमात्र बड़ा अवरोध नज़र आता है। अमरीका चाहता है कि इस्राइल के माध्यम से इस पूरे इलाक़े पर उसका एकछत्र नियंत्रण हमेशा बना रहे। इस्राइल भी अपनी खूनी विस्तारवादी नीतियों के मार्ग में ईरान को ही अपना अकेला अवरोध महसूस करता है। इसीलिए इस्राइल लगातार अमरीका को ईरान के विरुद्ध भड़काता रहता है। ईरान के विरुद्ध अमरीका और इस्राइल का यह खतरनाक अभियान पिछले चार दशकों से लगातार चल रहा है। लेकिन पूरे मध्य-पूर्व में ईरान ही अकेला ऐसा मजबूत देश है जो अपने पूरे इतिहास में कभी भी किसी अन्य देश का गुलाम या उपनिवेश नहीं बना है। ईरान अपने विरुद्ध होने वाले सभी हमलों का लगातार साहसपूर्वक जवाब देता रहा है। इसके लिए उसे चाहे कितनी भी बड़ी और लंबे समय तक भारी क़ीमत क्यों न चुकानी पड़ी हो।

28 फरवरी 2026 की सुबह भारतीय समय के अनुसार 10 बजकर 40 मिनट पर एक बहुत बड़ी घटना घटी। पहले इस्राइल और उसके तत्काल बाद संयुक्त राज्य अमेरिका ने ईरान की राजधानी तेहरान और अन्य बड़े शहरों पर ज़बरदस्त हमला कर दिया। इस्राइल के राष्ट्रपति बेंजामिन नेतन्याहू और अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने इस हमले की एकतरफा घोषणा की। उन्होंने कहा कि उनके इस संयुक्त हमले का मक़सद ईरान की वर्तमान शासन व्यवस्था को पूरी तरह ख़त्म करना है। ईरान की इस्लामी शासन व्यवस्था उनके सबसे बड़े धार्मिक नेता अयातुल्ला खामनेई से ही पहचानी जाती है। अमरीका ने इस हमले के पहले दिन ही अयातुल्ला खामनेई की उनके पूरे परिवार सहित बेरहमी से हत्या कर दी। इसके साथ ही 40 से अधिक सेना और प्रशासन के उच्चतम अधिकारी भी इस हमले में मारे गये। ये सभी अधिकारी उस समय खामनेई के साथ एक अहम बैठक कर रहे थे। 86 वर्षीय खामनेई यह अच्छी तरह जानते थे कि अमरीका और इस्राइल उनको मारना चाहते हैं। लेकिन उन्होंने किसी सुरक्षित बंकर में जाकर छुपने की बजाय अपने लोगों के बीच काम करते हुए मरना पसंद किया। उनकी मौत वास्तव में एक शहीद की मौत थी।

इस्राइल और अमरीका 28 फरवरी से ईरान पर लगातार भयंकर हवाई हमले कर रहे हैं। ये हमले सिर्फ सैनिक ठिकानों पर ही नहीं हो रहे हैं। अमरीका और इस्राइल जानबूझकर नागरिक ठिकानों को भी अपना निशाना बना रहे हैं। ऐसे ही एक बर्बर हमले में पहले दिन ही अमरीका-इस्राइल ने लड़कियों के एक प्राथमिक स्कूल पर भारी बमबारी की। उस हमले में 7 वर्ष से 12 वर्ष की 165 मासूम लड़कियों और उनके अध्यापकों को मार डाला गया। ये क्रूर हमले कई अस्पतालों पर भी किए गए। इनमें से एक अस्पताल का नाम महात्मा गाँधी के नाम पर रखा गया था। इसी तरह ईरान की नौसेना के ‘आईआरआईएस देना’ नामक जहाज़ पर भी एक कायराना हमला किया गया। यह जहाज़ एक सैनिक अभ्यास के लिए भारत की शांतिपूर्ण यात्रा पर था और विशाखापट्टनम से वापस लौट रहा था। इस जहाज़ पर परमाणु हथियारों से लैस एक अमरीकन सबमरीन ने अचानक हमला कर दिया। इस हमले में जहाज़ पर सवार 148 ईरानी सैनिक मौके पर ही मारे गए। बाद में 32 सैनिकों को श्रीलंका की नौसेना ने बड़ी मुश्किल से बचा लिया।

यह सैनिक कार्रवाई करने से पहले अमरीका ने भारत सरकार को कोई सूचना देना भी आवश्यक नहीं समझा। सबसे बड़ी विडंबना यह है कि भारत सरकार ने भी अमरीका से इस गुंडागर्दी का कोई विरोध नहीं किया। भारत ने डूबते हुए ईरानी सैनिकों को बचाने की कोई कोशिश भी नहीं की। इस जहाज़ पर किसी तरह के खतरनाक अस्त्र-शस्त्र बिल्कुल नहीं थे। वह जहाज़ युद्ध में भाग भी नहीं ले रहा था। वह जहाज़ हिन्द महासागर के ऐसे सुरक्षित क्षेत्र में था जो भारत की समुद्री सीमा से ज़्यादा दूर नहीं है। अमरीका द्वारा उस जहाज़ पर जानबूझकर हमला किया जाना और डूबते हुए नौसैनिकों को न बचाना स्पष्ट रूप से अंतर्राष्ट्रीय क़ानूनों का एक बहुत बड़ा उल्लंघन था। यह पूरी घटना भारत की स्वतंत्र कूटनीति के लिए बहुत ही शर्मनाक है। लेकिन भारत सरकार अन्य मामलों की तरह इस गंभीर घटना पर भी पूरी तरह चुप्पी साधे हुए है। इस घटना ने खाड़ी युद्ध की आग को अब भारत की सीमाओं के बिल्कुल पास तक पहुँचा दिया है।

इस्राइल को पूरी दुनिया में समर्थन, सुरक्षा और संरक्षण सबसे ज़्यादा अमरीका से ही मिलता रहा है। लेकिन जब से भारत में नरेंद्र मोदी सत्ता में आए हैं, भारत की विदेश नीति भी इस्राइल और अमरीका की तरफ़ बहुत अधिक झुकी हुई साफ़ नज़र आती है। हाल ही में लीक हुई ‘एपस्टिन फ़ाइल’ से भी कई बातें स्पष्ट होती हैं। इन फाइलों से पता चलता है कि 2014 में सत्ता में आने के पहले से ही आरएसएस-भाजपा जेफ्री एपस्टिन के माध्यम से इस्राइल और अमरीका के सीधे संपर्क में थे। जेफ्री एपस्टिन एक यहूदी था और वह इस्राइल की खुफिया एजेंसी मोसाद के लिए काम करता था। नरेंद्र मोदी के मंत्रिमंडल मे शामिल होने से पहले हरदीप सिंह पुरी न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र संघ में भारतीय प्रतिनिधि के रूप में काम कर रहे थे। 2013 में सेवानिवृत्त होने के बाद 2014 में उन्होंने भाजपा की प्राथमिक सदस्यता ले ली थी। उसी समय वे एपस्टिन के संपर्क में भी आए थे। जबकि 2008 में ही एपस्टिन की सभी आपराधिक गतिविधियाँ दुनिया के सामने उजागर हो चुकी थीं। इन गतिविधियों में घृणित यौन अपराध भी प्रमुख रूप से शामिल थे। उसके निजी द्वीप पर छोटी-छोटी बच्चियों को यौन हिंसा का भयानक शिकार बनाया जाता था।

विपक्ष के नेता राहुल गाँधी का यह कहना बिल्कुल सही लगता है कि वर्तमान प्रधानमंत्री एक ‘कॉम्प्रोमाइज्ड’ (समझौतावादी) प्रधानमंत्री हैं। उन्होंने अमरीका के दबाव के आगे भारतीय हितों की पूरी तरह बलि दे दी है। हाल ही में ट्रेड डील के पूरे मामले को सरकार ने जिस तरह से हैन्डल किया है, वह भारत के लिए अत्यंत अपमानजनक है। जिस रूस से भारत को पहले बहुत सस्ता तेल मिलता था और जिसका भुगतान भारतीय रुपये में करना होता था, अमरीका के कहने से हमने रूस से वह तेल लेना तुरंत बंद कर दिया। और अब जब अमरीका-इस्राइल के ईरान पर हमले के कारण कच्चे तेल की आवाजाही पर बहुत बुरा असर पड़ा है। तब रूस से तेल ख़रीदने के लिए भारत सरकार को अमरीका के सामने गिड़गिड़ाना पड़ा। भारत को अमेरिका से अनुरोध करना पड़ा कि वह उसे रूस से तेल ख़रीदने की अनुमति दे। इसके बाद अमेरिका ने भारत पर दया करके सिर्फ एक महीने के लिए यह अनुमति प्रदान की है। जब से डोनाल्ड ट्रम्प दोबारा राष्ट्रपति बने हैं, वे लगातार भारत का खुलेआम अपमान कर रहे हैं। अमरीका के भारी दबाव में ही भारत अब ईरान के चाबहार बंदरगाह परियोजना से पूरी तरह बाहर आ चुका है।

आज हम सब औपनिवेशिक ग़ुलामी के एक बिल्कुल नये दौर में प्रवेश कर चुके हैं। यह ग़ुलामी केवल अमरीका की नहीं है, बल्कि यह यहूदीवादी इस्राइल की भी है। अपने को सबसे बड़ा राष्ट्रवादी कहने वाली सरकार ने सिर्फ़ राष्ट्रीय हितों की ही बलि नहीं दी है। उसने देश के सम्मान और वैश्विक गौरव की भी बलि दे दी है। यह जानते हुए कि अमरीका और इस्राइल कभी भी ईरान पर जानलेवा हमला कर सकते हैं, नेतन्याहू के बुलावे पर नरेंद्र मोदी तुरंत इस्राइल पहुँच गए। जबकि अमरीका और जर्मनी को छोड़कर दुनिया का कोई भी देश गाज़ा में किए गए निरपराध नागरिकों के भयंकर नरसंहार के कारण इस्राइल की यात्रा नहीं कर रहा है। नरेंद्र मोदी न केवल इस्राइल गए, बल्कि उन्होंने जिस तरह इस्राइल के प्रति अपना खुला और एकतरफा समर्थन व्यक्त किया, वह बहुत ही अपमानजनक था। भारत हमेशा से फिलिस्तीन की स्वतंत्रता और संप्रभुता का पुरजोर समर्थन करता रहा है। लेकिन अपनी इस इस्राइल यात्रा में प्रधानमंत्री के ज़बान से न तो फिलिस्तीन का नाम निकला और न ही इस्राइल द्वारा किए गए युद्ध अपराधों के लिए निंदा के दो शब्द निकले। अब यह पूरी तरह मान लिया गया है कि वर्तमान सरकार ने ग्लोबल साउथ का साथ छोड़कर अमरीका और इस्राइल के साथ अपना पक्का गठजोड़ कर लिया है। आज हमारा देश स्वतंत्रता के बाद के सबसे बुरे और खतरनाक दौर से गुज़र रहा है। आज हमारी आज़ादी, हमारी संप्रभुता और हमारा लोकतंत्र सभी भारी ख़तरे में हैं।

Thakur Pawan Singh

Thakur Pawan Singh

Chief Editor, Taj News

#GlobalSouth #USImperialism #IsraelIranConflict #JawarimallParakh #TajNews #Geopolitics #IndianForeignPolicy

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *