Rajendra Sharma political satire article on Vande Mataram vs Jana Gana Mana debate

राजनैतिक व्यंग्य-समागम: राष्ट्रगीत बनाम राष्ट्रगान

आर्टिकल

Edited by: Thakur Pawan Singh | tajnews.in | Agra | 03 Mar 2026, 10:25 pm IST

Taj News Logo

Taj News Opinion Desk

विशेष संपादकीय लेख

Rajendra Sharma Writer

राजेंद्र शर्मा

वरिष्ठ पत्रकार एवं संपादक, ‘लोकलहर’

वरिष्ठ पत्रकार राजेंद्र शर्मा ने अपने इस प्रतीकात्मक और चुटीले व्यंग्य में राष्ट्रगीत (वंदे मातरम) और राष्ट्रगान (जन गण मन) के बीच एक कल्पित अदालती बहस के जरिए देश में चल रही ध्रुवीकरण की राजनीति पर करारा प्रहार किया है। पढ़िए उनका यह शानदार व्यंग्य-समागम:

अदालत ऊंची थी, सो नीचे सुर में आवाज लगने से भी मजे में काम चल गया। आवाज पड़ी — मुकद्दमा राष्ट्र गीत बनाम राष्ट्र गान, वंदे मातरम और जन गण मन हाजिर हों। वंदे मातरम ने लपकते-झपकते हुए उपस्थित श्रीमान से जवाब दिया, जबकि जन गण मन ने कुछ सकुचाते हुए हाजिरी भरी — हाजिर जनाब।

अदालत ने ऊंचे आसन से आगे की ओर कुछ झुक कर पूछा — भाई राष्ट्रगीत, अदालत तुमसे ही मुख्तसर में सुनना चाहती है कि तुम्हारी शिकायत क्या है? वंदे मातरम ने कुछ नाराजगी के साथ कहा कि संक्षेप में शिकायत यही है कि इस राष्ट्रगान ने मेरा हक मार लिया है, मेरा सम्मान चुरा लिया है। बस इतनी विनती है कि मेरा हक, मेरा सम्मान वापस दिलाया जाए। आगे मेरा पक्ष, एडवोकेट जनरल साहब रखेंगे।

अदालत ने राष्ट्रगान की तरफ मुखातिब होकर पूछा — और भाई राष्ट्रगान इनकी शिकायत के संंबंध में आपको कुछ कहना है? जन गण मन ने शांति से कहा, मुझे तो इस शिकायत का सिर-पैर ही समझ में नहीं आ रहा। राष्ट्रगीत का सम्मान अपनी जगह है। ज्यादातर शासकीय कार्यक्रमों में राष्ट्रगान से शुरूआत होती है, तो राष्ट्रगीत पर समापन। और इस भाई का सम्मान मैं क्यों चुराने लगा? विनती है कि यह दावा खारिज किया जाए। आगे मेरा पक्ष, टैगोर साहब रखेंगे।

अदालत ने कहा कि एक राष्ट्रगीत है और एक राष्ट्रगान, दोनों का अपना-अपना दर्जा है। छियत्तर साल से यह व्यवस्था बिना किसी विवाद के चलती आ ही रही थी। फिर दिक्कत क्या आ गयी? बस एडवोकेट जनरल शुरू हो गए। दोनों का अपना-अपना दर्जा में ही तो प्राब्लम है। यह धारणा भी गलत है कि छियत्तर साल से सब ठीक चल रहा था। हम तो कहेंगे कि कुछ भी ठीक नहीं चल रहा था। मेरे मुवक्किल, वंदे मातरम् को कभी न्याय मिला ही नहीं। पहले, आजादी से पहले नेहरू वगैरह ने षडयंत्र कर के, धार्मिक सद्भाव के नाम पर बेचारे गीत को काट-छांटकर अपनाया। फिर आजादी के बाद, उसी षडयंत्र के तहत, कटे-छंटे गीत को भी अपनाया, तो राष्ट्रगीत बनाकर, जबकि राष्ट्रगान के आसन पर जन गण मन को लाकर बैठा दिया गया। और इतना भी जैसे काफी नहीं हो, बेचारे वंदे मातरम के गाए-बजाए जाने को न तो सरकारी कार्यक्रमों में अनिवार्य किया गया और ना ही उसके संबंध में कोई नियम वगैरह बनाए गए। राष्ट्रगीत को लोगों के रहमो-करम पर छोड़ दिया गया! ये मेरे मुवक्किल की हकमारी नहीं, तो और क्या थी?

अदालत ने उसका पक्ष सही तरह से समझने के लिए पूछा — क्या राष्ट्र गीत को गाया/बजाया ही नहीं जा रहा था, सिर्फ राष्ट्रगान को ही गाया/बजाया जा रहा है? क्या राष्ट्र गीत के गाए/बजाए जाने पर किसी तरह की घोषित/अघोषित पाबंदी लगी हुई है? एडवोकेट जनरल ने कुछ खीझकर कहा — इससे क्या फर्क पड़ता है? राष्ट्र गीत के गाने/बजाने को अगर लोगों के रहमो-करम पर छोड़ दिया जाता है, तो इसमें उसका सम्मान कहां है? फिर ये कैसा सम्मान है, जिसमें राष्ट्रगीत को काट-छांटकर गाया जाए? हमारा तो पक्ष है कि वंदे मातरम् के साथ शासकीय अन्याय की शुरूआत तभी हो गयी थी, जब उसके दावे को अनदेखा कर, जन गण मन को राष्ट्रगान बनाया गया था। पचहत्तर साल बाद, कम से कम अब उस अन्यायपूर्ण निर्णय को पलटा जाना चाहिए और वंदे मातरम को पूर्ण न्याय दिलाया जाना चाहिए।

अदालत ने अब टैगोर की तरफ रुख किया। टैगोर ने धीरे-धीरे, समझाने के स्वर में अपनी बात शुरू की। वंदे मातरम और जन गण मन, मुझे दोनों गीत बहुत प्यारे हैं। जन गण मैंने लिखा है और वंदे मातरम् मैंने ही सबसे पहले आजादी की लड़ाई में लगी कांग्रेस के अधिवेशन में गाया था। बंकिम की इस कविता के पहले दो पद, अद्भुत हैं — मां के रूप में राष्ट्र की आराधना। पर बाद के पद, जो बंकिम बाबू ने अपने उपन्यास में इस कविता को शामिल करते हुए जोड़े थे, इस राष्ट्र माता को, पहले बंग माता और फिर काली, लक्ष्मी, सरस्वती आदि देवियों का रूप दे देते हैं और कविता के दायरे को एक प्रकार से सीमित कर देते हैं। पहले पदों की सर्व स्वीकार्यता के विपरीत, इन बाद के पदों की सर्व स्वीकार्यता नहीं थी, न जन साधारण में और न स्वतंत्रता आंदोलन में। इसीलिए, मेरे सुझाव पर कांग्रेस ने वंदे मातरम के पहले दो पदों को अपनाया था और बाद में इन्हीं पदों को राजेंद्र बाबू के प्रस्ताव पर, संविधान सभा ने राष्ट्रगीत के रूप में अपनाया गया था। इस निर्णय में वंदे मातरम के साथ कोई अन्याय नहीं, उसके राष्ट्रीय भावना के अनुरूप हिस्से का सम्मान ही था।

रही बात जन गण मन की तो, उसके संबंध में मेरा कुछ भी कहना अजीब सा लगेगा। हां! इतना जरूर याद दिला दूं कि काटकर तो जन गण मन को भी अपनाया गया था। मूल कविता में और भी कई पद हैं, जिन्हें निर्णयकर्ताओं ने छोड़ दिया। राष्ट्रगीत हो या गान, उसकी सहज गेयता, सघनता, सहज व्याप्ति, सभी का ध्यान रखा जाता है। एडवोकेट जनरल ने खीझ कर कहा, ये सब कहने-सुनने की बातें हैं। असली मुद्दा कविता को काटने, न काटने का है ही नहीं। मुद्दा काटने की वजह का है। काटकर ही सही, वंदे मातरम को राष्ट्रगान क्यों नहीं बनाया गया और जन गण मन को ही राष्ट्रगान क्यों बनाया गया? जन गण मन को काटा गया होगा, राष्ट्रगान के आदर्श आकार में लाने के लिए, पर वंदे मातरम को क्यों काटा गया था, यह किसी से छुपा हुआ नहीं है। उसे काटा गया था, अल्पसंख्यकों के तुष्टीकरण के लिए यानी मुसलमानों के लिए। इसी वजह से उसे राष्ट्रगान भी नहीं बनाया गया। मुसलमानों ने वंदे मातरम् का हक छीना था, हमारी मांग है कि उसे ही वापस दिलाया जाए।

टैगोर ने पूछा — तो आपको वंदे मातरम् को इसीलिए राष्ट्रगान बनवाना है कि वह मुसलमानों को चिढ़ाएगा? राष्ट्रीय आंदोलन में इस तरह तो कोई नहीं सोचता था! वर्ना राष्ट्रगीत और राष्ट्रगान, दो-दो गीतों को क्यों अपनाया जाता; और किसी देश ने तो नहीं अपनाया है। दूसरी ओर से एडवोकेट जनरल ने चिल्ला कर कहा, ये मेरे शब्द नहीं हैं। हां! जो भी भारत से प्रेम करता है, वह वंदे मातरम खुशी से गायगा। जो नहीं गायगा, वह भारत माता से प्रेम नहीं करता है — इति सिद्धम। देश प्रेम की परीक्षा से डरने वालों के लिए, हम अपना राष्ट्रगान नहीं बदल देंगे! टैगोर ने धीरे से कहा — पर ऐसे तो वंदे मातरम राष्ट्रगीत नहीं, विभाजन का गीत हो जाएगा। एडवोकेट जनरल ने चिल्लाकर कहा, राष्ट्र भले बंट जाए, हमें गीत पूरा चाहिए। जन गण मन ने दु:खी होकर कहा, इसी को बना दें राष्ट्रगीत, राष्ट्रगान सब, मुझे कोई सम्मान नहीं चाहिए!

अगली तारीख को एडवोकेट जनरल ने अदालत से प्रार्थना की कि उसके मुवक्किल की प्रार्थना सरकार ने पूरी कर दी है, इसलिए उसे अपनी याचिका वापस लेने की इजाजत दी जाए। राष्ट्रगीत का दर्जा, राष्ट्रगान से ऊपर कर दिया गया है और उसे पूरा गाना अनिवार्य कर दिया गया है। अदालत से निकलते-निकलते वंदे मातरम ने ताना मारा — राष्ट्रगान, और कब तक! टैगोर ने बुदबुदा कर कहा — महात्मा सही थे, इन्होंने तो राष्ट्रगीत और राष्ट्रगान को भी लड़ा दिया।

Thakur Pawan Singh

Thakur Pawan Singh

Chief Editor, Taj News

#VandeMataramVsJanaGanaMana #RajendraSharma #TajNewsOpinion #PoliticalSatire #AgraNews #NationalAnthemDebate

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *