Sanjay Parate article on book bans, NCERT controversy and Supreme Court corruption

नागरिक परिक्रमा: किताबों पर बैन से सच नहीं छिपता, अब सुप्रीम कोर्ट भी चला सरकार की राह!

आर्टिकल

Edited by: Thakur Pawan Singh | tajnews.in | Agra | 09 Mar 2026, 03:55 pm IST

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Taj News Opinion Desk

विशेष संपादकीय लेख

Sanjay Parate Writer

संजय पराते

राजनीतिक विश्लेषक एवं टिप्पणीकार

राजनीतिक विश्लेषक संजय पराते ने अपनी इस विशेष ‘नागरिक परिक्रमा’ टिप्पणी में किताबों पर लगने वाले प्रतिबंधों और विचारों को कुचलने की सरकारी मानसिकता पर कड़ा प्रहार किया है। उन्होंने एनसीईआरटी की किताब में न्यायपालिका के भ्रष्टाचार का जिक्र होने पर सुप्रीम कोर्ट की नाराजगी को लेकर बेहद बेबाक और तीखी आलोचना की है। पढ़िए उनका यह आलेख:

मुख्य बिंदु

  • तानाशाह और फासीवादी सरकारें जनता की बढ़ती समझ और विश्लेषण क्षमता से घबराकर किताबों पर प्रतिबंध लगाती हैं।
  • जम्मू-कश्मीर में अरुंधति रॉय और सलमान रुश्दी सहित कई लेखकों की 25 किताबों पर लगे प्रतिबंध का जिक्र।
  • एनसीईआरटी की किताब में न्यायपालिका के भ्रष्टाचार का उल्लेख होने पर सुप्रीम कोर्ट की नाराजगी पर कड़े सवाल।
  • अदालतों में फैले भ्रष्टाचार, लेटलतीफी और न्याय प्रणाली की गिरती गरिमा की कड़वी जमीनी सच्चाई।

सरकारों का किताबों के पीछे पड़ना कोई नई बात बिल्कुल नहीं है। इतिहास हमेशा इस बात का गवाह रहा है। तानाशाह और फासीवादी सरकारें किताबों से बहुत डरती हैं। वे नहीं चाहतीं कि लोग पढ़े-लिखे बनें। वे नहीं चाहतीं कि सही तथ्य आम जनता तक पहुंचे। क्योंकि यदि ऐसा होता है, तो जनता के सोचने-समझने के स्तर में भारी बढ़ोतरी होती है। इसके अलावा लोगों की चीजों का विश्लेषण करने की क्षमता भी बढ़ती है। तब वे भेड़िया धसान की तरह किसी गोदी मीडिया के झूठे प्रचार का हिस्सा बनने से सीधा इंकार कर देते हैं। नतीजतन सत्ता में बैठे लोगों को इससे बड़ा खतरा पैदा होता है। वे अपनी कुर्सी छिन जाने से डरते हैं। इसलिए वे किताबों पर प्रतिबंध लगाकर सच्चाई को छिपाने का कड़ा प्रयास करते हैं। यह एक पुरानी और आजमाई हुई दमनकारी चाल है।

पिछले वर्ष जम्मू-कश्मीर प्रशासन ने एक बेहद चौंकाने वाला कदम उठाया था। प्रशासन ने वहां 25 किताबों पर सीधा प्रतिबंध लगा दिया। इन सब प्रतिबंधों के पीछे एक ही घिसा-पिटा तर्क दिया गया था। सरकार ने कहा कि देश की एकता और अखंडता के लिए इन किताबों से बड़ा खतरा है। इन प्रतिबंधित किताबों में मशहूर लेखिका अरुंधति रॉय की किताबें भी शामिल हैं। इसके साथ ही प्रतिबंधित किताबों की सूची में कई अन्य नाम मौजूद हैं। इनमें सलमान रुशदी की विवादित किताब ‘सेनेटिक वर्सेस’ शामिल है। वेंडी डोनीगर की ‘दि हिंदू : एन आल्टरनेटिव्ह हिस्ट्री’ को भी बैन किया गया। जेम्स डब्लू लेन की ‘शिवाजी : हिंदू किंग इन इस्लामिक इंडिया’ पर भी रोक लगी। इसके अलावा जसवंत सिंह की किताब ‘जिन्ना : इंडिया, पार्टीशन, इंडिपेंडेंस’ को भी इस सूची में डाला गया। हालांकि प्रतिबंधित क्षेत्रों के बाहर इन सभी किताबों को लोगों ने खूब पढ़ा। पाठकों ने इनकी विषयवस्तु को काफी सराहा भी।

लेकिन एक क्षेत्र विशेष की जनता को इन सरकारों ने किताबें पढ़ने से जबरन रोक दिया। इसके बावजूद किताबें पढ़ने की जनता की भूख बिल्कुल कम नहीं हुई। लोग हमेशा सच जानने के लिए उत्सुक रहते हैं। इन प्रतिबंधों के कारण सरकारें जरूर भारी आलोचनाओं के घेरे में रहीं। दरअसल सरकारें हमेशा चाहती हैं कि लोग सिर्फ वही किताब पढ़ें, जो वह चाहती है। वे आम जनता की स्वतंत्र सोच को अपने राजनीतिक एजेंडे के अनुरूप ढालना चाहती हैं। इससे उन्हें भविष्य में सत्तारूढ़ प्रतिकूलता या विरोध का सामना नहीं करना पड़ता। सरकारें चाहती हैं कि लोग वही खाएं और वहीं पहनें जो उन्हें बताया जाए। वे चाहती हैं कि लोग वैसी ही भाषा बोलें और वहीं चीजें देखें। इसके साथ ही वे चाहती हैं कि जनता सिर्फ उनके ही पक्ष में नारे लगाए। कुल मिलाकर सरकारें आम मनुष्य को एक रोबोट में ढालना चाहती हैं।

वे चाहती हैं कि नागरिक पहले से फिट प्रोग्रामिंग के दिशा-निर्देशों के अनुरूप ही अपना व्यवहार करें। लेकिन मनुष्य कोई निर्जीव रोबोट बिल्कुल नहीं है। उसे किसी मशीन या रोबोट में ढालने की कोशिश कभी भी सफल नहीं हो सकती है। वह जीता-जागता और हाड़-मांस-मज़्जा से बना एक संवेदनशील इंसान है। उसके मस्तिष्क में लगातार खून का संचार हो रहा है। उसके दिल में अनेक भावनाओं का उफान हमेशा रहता है। इसी मानव मस्तिष्क ने ही आधुनिक रोबोट का निर्माण किया है। इसलिए रोबोट को न तो कभी इंसान बनाया जा सकता है। और न ही इंसान को कभी रोबोट बनाया जा सकता है। लेकिन यही सामान्य बात समझने से हमारी सरकारें लगातार इंकार करती हैं। वे सत्ता के नशे में पूरी तरह अंधी हो चुकी हैं। वे सिर्फ अपनी तानाशाही चलाना चाहती हैं।

लेकिन अब हालात और भी ज्यादा खराब होते जा रहे हैं। ऐसा लगता है कि अब सुप्रीम कोर्ट भी इस बुनियादी बात को समझने से साफ इंकार कर रहा है। वह भूल गया है कि सच को छिपाने से वह कभी छिप नहीं सकता। इसके अलावा किसी भी तथ्य को दबाने से वह कभी दब नहीं सकता। बल्कि सत्य और तथ्य दोनों हमेशा समय आने पर सिर चढ़कर बोलते हैं। यह पूरा नया विवाद एनसीईआरटी की एक किताब से जुड़ा हुआ है। उस किताब में कथित रूप से भारतीय न्यायपालिका में मौजूद भ्रष्टाचार का उल्लेख किया गया है। इस बात पर सुप्रीम कोर्ट बुरी तरह से भड़क गया है। कोर्ट ने भड़ककर इस किताब को प्रतिबंधित करने का कड़ा आदेश दे दिया है। इसके साथ ही जिम्मेदारों को ‘अदालत में हाजिर हो’ का कड़ा हुक्म भी सुना दिया गया है। यह न्यायपालिका का एक अजीब और डराने वाला रवैया है।

लगता है कि मौजूदा सरकार का जिस तेजी से नैतिक पतन हो रहा है। उसी के साथ ही देश का सुप्रीम कोर्ट भी अपने उच्च स्तर से फिसल रहा है। देश की अदालतों में भ्रष्टाचार किस भयानक हद तक पसरा पड़ा है। यह इस देश की हर आम जनता का एक बेहद कड़वा अनुभव है। आज नीचे से लेकर ऊपर तक की सभी अदालतों में भ्रष्टाचार मौजूद है। जज की नाक के नीचे और उनकी आंख के सामने खुलेआम रिश्वतखोरी चलती है। पेशी की तारीखों को आगे बढ़वाने के लिए खूब पैसा चलता है। इसके अलावा मामलों को सुविधानुसार लेने के लिए भी मोटा चढ़ावा चढ़ाया जाता है। यह कोई रहस्य नहीं है। हर वकील और मुवक्किल इस कड़वी सच्चाई को अच्छी तरह जानता है। न्याय प्रणाली में यह सड़न बहुत गहरी हो चुकी है। फिर भी इस पर कोई खुलकर बात नहीं करना चाहता है。

हम आज देश के हालात देखकर आसानी से न्यायपालिका की स्थिति समझ सकते हैं। एक तरफ उमर खालिद जैसे लोग बिना किसी सजा के कई सालों से जेल में बंद हैं। उनकी जमानत याचिकाओं पर सुनवाई लगातार टलती रहती है। दूसरी तरफ राम रहीम जैसा गंभीर अपराधी पेरोल पर बाहर आकर खुलेआम मस्ती मार रहा है। यह कैसा न्याय है? इसके अलावा कई जज पीठों में बैठकर खुलेआम संविधान विरोधी टिप्पणी कर रहे हैं। कई उच्च जज भ्रष्ट आर्थिक लेन-देन के गंभीर आरोपी बन चुके हैं। एक जज पर तो खुद संसद में ही महाभियोग का मुकदमा चल चुका है। भारतीय अदालतों की इस भयंकर दयनीयता के बारे में कई लोग बोल चुके हैं। यहां तक कि कई पूर्व और वर्तमान जज खुद इस सच्चाई की स्वीकारोक्ति कर चुके हैं। वे खुद मान चुके हैं कि सिस्टम में बहुत खामियां हैं।

इसलिए यदि देश के प्रधान न्यायाधीश एनसीईआरटी की किताब पर भड़कते हैं, तो यह हैरान करता है। यदि वे उसमें उल्लेखित तथ्य को कोर्ट की गरिमा को गिराने वाला बताते हैं, तो यह हास्यास्पद है। महोदय, आपकी यह गरिमा तो बहुत पहले ही गिरकर पूरी तरह नंगी हो चुकी है। अब इस नग्नता को आंख मूंदकर बिल्कुल नहीं छिपाया जा सकता है। इसे सिर्फ ईमानदारी के नए कपड़े पहनाकर ही दूर किया जा सकता है। लेकिन आज सबसे बड़ी दिक्कत यही है कि सिस्टम के पास ऐसे ईमानदारी के कपड़े हैं ही नहीं। इसके बावजूद सुप्रीम कोर्ट पूरी जनता से आंख मूंदने का तानाशाही आदेश दे रहा है। वह चाहता है कि लोग इस नग्नता को बिल्कुल न देखें। ऐसे सुप्रीम कोर्ट का क्षय होना ही देश के लिए बेहतर है। जो अदालत अब जनता को सच्चा न्याय देने के काबिल भी नहीं रह गई है। वह अब केवल सूखे निर्णय सुना रही है। जिसकी आम जनता के लिए अब कोई खास अहमियत नहीं बची है।

Thakur Pawan Singh

Thakur Pawan Singh

Chief Editor, Taj News

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