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फतेहपुर सीकरी में शूरवीर राणा सांगा की प्रतिमा स्थापना की मांग: सांसद राजकुमार चाहर ने उठाया ऐतिहासिक कदम

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आगरा, 24 मार्च 2025: फतेहपुर सीकरी लोकसभा क्षेत्र के सांसद राजकुमार चाहर ने एक ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहल की शुरुआत करते हुए आगरा के आयुक्त को पत्र लिखकर क्षेत्र में मेवाड़ के शूरवीर महाराणा सांगा की प्रतिमा स्थापित करने के लिए भूमि उपलब्ध कराने की मांग की है। यह प्रस्तावित प्रतिमा सांसद निधि और जन सहयोग के माध्यम से स्थापित की जाएगी, जिसका उद्देश्य न केवल इतिहास के एक गौरवशाली अध्याय को सम्मान देना है, बल्कि युवा पीढ़ी में राष्ट्रभक्ति की भावना को जागृत करना भी है। इस कदम ने न सिर्फ क्षेत्र में चर्चा को जन्म दिया है, बल्कि एक राजनीतिक विवाद को भी हवा दी है, जिसने इस पहल को और भी सुर्खियों में ला दिया है।

इतिहास की गौरवगाथा: खानवा का युद्ध और राणा सांगा का बलिदान

सांसद राजकुमार चाहर ने अपने पत्र में भारतीय इतिहास के एक महत्वपूर्ण और गौरवशाली अध्याय का उल्लेख किया है। उन्होंने लिखा कि 16 मार्च 1527 को फतेहपुर सीकरी और राजस्थान के भरतपुर रूपवास के बीच स्थित खानवा के मैदान में मेवाड़ के महाराणा सांगा और मुगल शासक बाबर के बीच एक ऐतिहासिक युद्ध लड़ा गया था। यह युद्ध भारतीय इतिहास में अपनी विशिष्ट पहचान रखता है, क्योंकि यह केवल दो सेनाओं का संघर्ष नहीं था, बल्कि भारत की स्वतंत्रता और स्वाभिमान की रक्षा के लिए एक निर्णायक लड़ाई थी।

महाराणा सांगा, जो मेवाड़ के शासक और राजपूताना की शान थे, ने इस युद्ध में अपने अदम्य साहस और वीरता का परिचय दिया। वे एक ऐसे योद्धा थे, जिन्होंने अपने जीवन में असंख्य युद्ध लड़े और अपने शरीर पर 80 से अधिक घावों को सहा। खानवा के युद्ध में उन्होंने बाबर की विशाल सेना के खिलाफ एकजुटता के साथ मुकाबला किया, लेकिन अंततः वे घायल हो गए और युद्ध के बाद उनकी मृत्यु हो गई। सांसद चाहर ने अपने पत्र में इस बात पर जोर दिया कि राणा सांगा का बलिदान भारत की संस्कृति, परंपरा और स्वतंत्रता की रक्षा के लिए एक अनमोल योगदान था, जिसे आज भी याद किया जाना चाहिए।

प्रतिमा स्थापना की मांग: एक सांस्कृतिक और राष्ट्रवादी पहल

सांसद राजकुमार चाहर ने आगरा के आयुक्त से अनुरोध किया है कि फतेहपुर सीकरी लोकसभा क्षेत्र में एक उपयुक्त स्थान पर राणा सांगा की प्रतिमा स्थापित करने के लिए भूमि आवंटित की जाए। उनका मानना है कि यह प्रतिमा न केवल एक स्मारक के रूप में कार्य करेगी, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए एक प्रेरणा का स्रोत भी बनेगी। उन्होंने कहा, “इस ऐतिहासिक प्रतिमा की स्थापना से युवा पीढ़ी को अपने गौरवशाली अतीत से परिचित होने का अवसर मिलेगा और राष्ट्रभक्ति की भावना को बल मिलेगा।”

यह प्रस्ताव सांसद निधि और जन सहयोग से पूरा किया जाएगा, जिससे यह स्पष्ट होता है कि यह न केवल एक सरकारी परियोजना होगी, बल्कि इसमें स्थानीय जनता की भागीदारी भी सुनिश्चित की जाएगी। सांसद चाहर ने इस पहल को एक सामूहिक प्रयास के रूप में प्रस्तुत किया है, जो इतिहास और संस्कृति के प्रति सम्मान को दर्शाता है।

राजनीतिक विवाद: सपा सांसद की टिप्पणी और भाजपा का विरोध

इस प्रस्ताव के साथ ही एक राजनीतिक विवाद भी सुर्खियों में आ गया है। हाल ही में समाजवादी पार्टी (सपा) के सांसद रामजीलाल सुमन ने राणा सांगा को लेकर एक विवादित टिप्पणी की थी, जिसे लेकर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और सांसद राजकुमार चाहर ने कड़ा विरोध दर्ज किया। हालांकि, सुमन की टिप्पणी का सटीक विवरण सार्वजनिक रूप से स्पष्ट नहीं किया गया है, लेकिन भाजपा नेताओं ने इसे इतिहास और राष्ट्रभक्ति का अपमान करार दिया है।

सांसद चाहर ने इस मुद्दे पर अपनी प्रतिक्रिया में कहा, “राणा सांगा का अपमान, देश के वीर योद्धाओं और उनके बलिदान का अपमान है, जिसे किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।” भाजपा नेताओं ने सपा सांसद से इस टिप्पणी के लिए माफी की मांग की है और इसे एक राजनीतिक मुद्दे के रूप में उभारा है। इस विवाद ने राणा सांगा की प्रतिमा स्थापना के प्रस्ताव को और भी महत्वपूर्ण बना दिया है, क्योंकि यह अब केवल एक सांस्कृतिक पहल नहीं, बल्कि एक राजनीतिक बयान के रूप में भी देखा जा रहा है।

राणा सांगा: एक ऐतिहासिक व्यक्तित्व की विरासत

महाराणा सांगा, जिनका पूरा नाम महाराणा संग्राम सिंह था, 16वीं शताब्दी के भारत के सबसे प्रतापी शासकों में से एक थे। मेवाड़ के सिसोदिया वंश के वे एक ऐसे योद्धा थे, जिन्होंने न केवल अपने राज्य की रक्षा की, बल्कि विदेशी आक्रांताओं के खिलाफ एकजुटता का परिचय दिया। खानवा का युद्ध उनकी वीरता का सबसे बड़ा उदाहरण माना जाता है, जहां उन्होंने बाबर की सेना के खिलाफ एक विशाल गठबंधन का नेतृत्व किया।

हालांकि, इस युद्ध में उनकी हार हुई, लेकिन उनकी वीरता और बलिदान ने उन्हें इतिहास में अमर कर दिया। इतिहासकारों के अनुसार, यदि राणा सांगा इस युद्ध में विजयी होते, तो भारत का इतिहास एक अलग दिशा में जा सकता था। उनकी मृत्यु के बाद भी उनकी विरासत मेवाड़ और राजपूताना में जीवित रही, और आज भी वे राष्ट्रभक्ति और साहस के प्रतीक के रूप में पूजे जाते हैं।

प्रतिमा का महत्व: इतिहास और राष्ट्रभक्ति का प्रतीक

सांसद राजकुमार चाहर ने अपने पत्र में इस बात पर बल दिया कि राणा सांगा की प्रतिमा स्थापना केवल एक स्मारक नहीं होगी, बल्कि यह इतिहास और राष्ट्रभक्ति का प्रतीक बनेगी। उन्होंने लिखा, “यह पहल देशभक्ति और इतिहास को सम्मान देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। पूरे देश को यह याद रखना चाहिए कि राणा सांगा जैसे वीर योद्धाओं ने भारत की संस्कृति और परंपरा की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति दी।”

यह प्रतिमा फतेहपुर सीकरी क्षेत्र में एक ऐतिहासिक स्थल के रूप में उभर सकती है, जो पर्यटकों और इतिहास प्रेमियों के लिए भी आकर्षण का केंद्र बन सकती है। इसके अलावा, यह स्थानीय लोगों के लिए गर्व का विषय होगी, क्योंकि यह उनके क्षेत्र से जुड़े एक गौरवशाली अतीत को सामने लाएगी।

प्रशासन की भूमिका और भविष्य की संभावनाएं

सांसद चाहर ने अपने पत्र में विश्वास जताया कि आगरा प्रशासन इस अनुरोध को गंभीरता से लेगा और शीघ्र ही भूमि आवंटन की प्रक्रिया शुरू करेगा। उन्होंने कहा, “मुझे पूरा भरोसा है कि प्रशासन इस प्रस्ताव को प्राथमिकता देगा और इसे जल्द से जल्द मूर्त रूप देने में सहयोग करेगा।”

यदि यह प्रस्ताव सफल होता है, तो यह फतेहपुर सीकरी में एक नया अध्याय जोड़ेगा। यह प्रतिमा न केवल इतिहास की स्मृति को जीवंत रखेगी, बल्कि युवाओं के लिए एक प्रेरणास्त्रोत के रूप में भी काम करेगी। इसके साथ ही, यह क्षेत्र की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पहचान को और मजबूत कर सकती है।

एक ऐतिहासिक कदम की शुरुआत

सांसद राजकुमार चाहर द्वारा उठाया गया यह कदम न केवल एक सांसद की पहल है, बल्कि यह भारत के गौरवशाली इतिहास को सम्मान देने का एक प्रयास भी है। राणा सांगा जैसे वीर योद्धा की प्रतिमा की स्थापना नई पीढ़ी को यह याद दिलाएगी कि आज की स्वतंत्रता और संस्कृति अतीत के बलिदानों का परिणाम है। हालांकि, इस प्रस्ताव के साथ जुड़ा राजनीतिक विवाद इसे एक जटिल आयाम देता है, लेकिन यह भी इसकी प्रासंगिकता को बढ़ाता है।

अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि प्रशासन इस मांग पर कितनी जल्दी और प्रभावी ढंग से कार्रवाई करता है। यदि यह परियोजना पूरी होती है, तो यह फतेहपुर सीकरी के लिए एक ऐतिहासिक उपलब्धि होगी, जो आने वाले वर्षों तक लोगों के दिलों में बसी रहेगी।

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