Edited by: Pawan Singh | tajnews.in | Agra | 20 Mar 2026, 09:45 AM IST
Taj News Political Desk
मुख्य बिंदु
- 2014 से 2024 तक का सफर: पूर्ण बहुमत से लेकर ‘मोदी 3.0’ की गठबंधन सरकार तक का बदला हुआ सियासी मिजाज।
- आगामी 4 मई के चुनाव नतीजे तय करेंगे मोदी सरकार के भावी आर्थिक सुधारों और लेबर कोड की असली रफ्तार।
- दक्षिण भारत बनाम उत्तर भारत: 2026 के परिसीमन (Delimitation) मुद्दे पर बढ़ सकती है राजनीतिक तकरार।
- क्या टीडीपी (TDP) और जेडीयू (JDU) जैसे सहयोगी दल चुनाव नतीजों के बाद ‘कॉमन मिनिमम प्रोग्राम’ थोपेंगे?
भारत अब पूरी तरह बदल चुका है। देश का चेहरा, चाल और चरित्र भी बदल गया है। सरकार ने सत्ता की भाषा को पूरी तरह बदल दिया है। इसके अलावा, उसने शासन का व्याकरण भी बिल्कुल बदल दिया है। लेकिन, अब एक असली सवाल हमारे सामने खड़ा है। क्या बदलाव की यह तेज आंधी आगे भी इसी तरह चलेगी? या फिर अब इसकी सांस सचमुच फूलने लगी है? इसलिए, आगामी 4 मई को पांच राज्यों के चुनाव नतीजे इस पहेली का पक्का जवाब लिखेंगे। साल 2014 के बाद भारतीय राजनीति ने सिर्फ करवट नहीं ली है। बल्कि, उसने एक पूरा पलटा ही खा लिया है। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व ने समझौतों की पुरानी खिचड़ी राजनीति को बिल्कुल किनारे कर दिया है। नतीजतन, देश में एक केंद्रीकृत, निर्णायक और आक्रामक शासन मॉडल उभरा है। मोदी मॉडल ने पुरानी गठबंधन की बेड़ियां पूरी तरह तोड़ दी हैं। इसके कारण सरकारी फैसलों की रफ्तार बहुत ज्यादा बढ़ी है।
सरकार ने “जो कहा, वो किया” का एक बिल्कुल नया मंत्र चलाया है। इसके बाद 2019 में भाजपा को दूसरा पूर्ण बहुमत मिला। इसलिए, यह पूरी तरह साफ हो गया कि अब एक अकेला दल भी पूरे देश की गाड़ी खींच सकता है। सरकार ने कश्मीर से अनुच्छेद 370 का अंत कर दिया। इसके साथ ही, उसने अयोध्या में भव्य राम मंदिर का निर्माण भी कराया। दरअसल, ये सब सिर्फ साधारण राजनीतिक फैसले बिल्कुल नहीं थे। बल्कि, ये देश के करोड़ों लोगों की भावनाओं की धड़कन थे। मोदी सरकार ने राष्ट्रवाद और विकास का एक शानदार संगम बनाया है। जिसने सीधे तौर पर जनता के दिल में अपनी पक्की जगह बनाई है। इसलिए, आज की राजनीति अब सिर्फ सूखी नीतियों की राजनीति नहीं रह गई है। बल्कि, यह अब बड़े प्रतीकों की राजनीति भी हो गई है। लेकिन, सरकार ने असली खेल तो कहीं और ही खेला है। उसने तकनीक के मैदान में अपना सबसे बड़ा दांव चला है।
सरकार ने आधार, मोबाइल और बैंक खाते की एक मजबूत तिकड़ी बनाई है। इस तिकड़ी ने सभी सरकारी योजनाओं को सीधे जनता के दरवाजे तक पहुंचा दिया है। नतीजतन, देश में बिचौलियों की दुकानें पूरी तरह बंद होने लगी हैं। सरकार ने लोगों को गैस कनेक्शन, पक्के घर और सीधी नकद सहायता दी है। इसलिए, सरकार अब सिर्फ सरकारी फाइलों में नहीं दिखती है। बल्कि, वह अब सीधे आम लोगों के जीवन में दिखने लगी है। इन योजनाओं ने देश में एक नया ‘लाभार्थी वर्ग’ पैदा किया है। क्योंकि यह वर्ग अब दिल्ली को कोई दूर की सरकार बिल्कुल नहीं मानता है। बल्कि, वह उसे अपनी खुद की सरकार मानने लगा है। इसके अलावा, सरकार ने देश की अर्थव्यवस्था में भी कई बड़े प्रयोग किए हैं। सरकार ने जीएसटी (GST) लागू करके पूरी कर प्रणाली को एक धागे में पिरोया है। सरकार ने नया दिवाला कानून (IBC) बनाकर बैंकिंग में पारदर्शिता की बड़ी खिड़की खोली है।
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हालांकि, सरकार ने अनौपचारिक अर्थव्यवस्था को औपचारिक बनाने की भारी जिद भी पकड़ी। इस कड़े फैसले ने आम व्यापारियों को थोड़ा दर्द जरूर दिया है। लेकिन, सरकार की दिशा हमेशा बिल्कुल साफ रही है। उसने कड़े नियम, कड़ा नियंत्रण और बाजार में एकरूपता को ही चुना है। फिर साल 2024 का नया आम चुनाव आया। इस बार जनता के जनादेश ने पहली बार मोदी सरकार पर ब्रेक लगाया। भाजपा के पूर्ण बहुमत की रफ्तार काफी धीमी हुई। नतीजतन, देश में फिर से गठबंधन की पुरानी जरूरत लौट आई। आज की ‘मोदी 3.0’ सरकार में राजनीतिक ताकत तो जरूर है। लेकिन, उसके पास कड़े फैसले लेने की पूरी आजादी बिल्कुल नहीं है। यह स्थिति ठीक वैसी ही है जैसे किसी तेज दौड़ती कार को अब तीखे मोड़ों पर सावधानी से चलना पड़ रहा हो। लेकिन, सरकार ने तुरंत अपना गियर बदल लिया है।
उसने अपने आर्थिक सुधारों की रफ्तार को बिल्कुल कम नहीं होने दिया है। सरकार 2026 तक देश में चार नए ‘लेबर कोड’ लागू करने की तैयारी कर रही है। इसके अलावा, सरकार न्यूक्लियर सेक्टर में निजी निवेश के दरवाजे खोलने की चर्चा कर रही है। उसने बीमा क्षेत्र में 100 प्रतिशत एफडीआई (FDI) लाने की नई पहल की है। साथ ही, वह इनकम टैक्स को बहुत सरल बनाने की लगातार कोशिश कर रही है। इसलिए, सरकार का यह राजनीतिक संदेश बिल्कुल साफ है। सरकार में बेशक गठबंधन है, लेकिन आर्थिक सुधारों पर कोई ब्रेक नहीं लगेगा। फिर भी, सरकार के लिए आगे की राह बिल्कुल भी आसान नहीं है। क्योंकि देश की सियासत का पारा लगातार चढ़ रहा है। विपक्ष ने मुख्य चुनाव आयुक्त पर महाभियोग की तलवार लटका दी है। विपक्ष सरकार पर संवैधानिक संस्थाओं पर ‘कब्जे’ के गंभीर आरोप लगा रहा है।
इसके अलावा, विपक्ष ने जातीय जनगणना की भारी मांग करके एक नई राजनीतिक बहस छेड़ दी है। इसलिए, आज का विपक्ष अब सरकार से सिर्फ साधारण सवाल नहीं पूछ रहा है। बल्कि, वह अब सीधे तौर पर सरकार से भारी टकराव के मूड में आ गया है। इसके साथ ही, भाजपा का पुराना हिंदू सामाजिक गठजोड़ भी आज एक बड़ी चुनौती के दौर में है। हमारे समाज की पुरानी परतें अब तेजी से खिसक रही हैं। युवाओं के मन में लगातार नई-नई आकांक्षाएं जन्म ले रही हैं। उधर दूसरी तरफ, पश्चिम एशिया की भारी अस्थिरता भी भारत की चिंता बढ़ा रही है। वह अस्थिरता पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था को बहुत बुरी तरह झकझोर सकती है। नतीजतन, उस वैश्विक झटके का सीधा और बुरा असर भारत पर भी जरूर पड़ेगा। इसलिए, अब पूरे देश की नजरें आगामी 4 मई पर टिकी हैं।
क्योंकि उस दिन पश्चिम बंगाल, असम, केरल, तमिलनाडु और पुडुचेरी के चुनाव नतीजे आएंगे। वास्तव में, ये पांचों सिर्फ साधारण राज्य बिल्कुल नहीं हैं। बल्कि, ये देश की सबसे बड़ी राजनीतिक प्रयोगशालाएं हैं। असम में मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने हिंदुत्व और विकास का एक खास फॉर्मूला बनाया है। उनका यह आक्रामक फॉर्मूला फिलहाल वहां बहुत मजबूत दिखता है। लेकिन, दक्षिण भारत की राजनीति अपना एक बिल्कुल अलग मिजाज रखती है। वहां के लोगों ने अपनी क्षेत्रीय पहचानों की बहुत गहरी जड़ें जमा रखी हैं। इसलिए, वहां भाजपा की राष्ट्रीय अपील को सीधा सीटों में बदलना बिल्कुल भी आसान नहीं है। पश्चिम बंगाल में तो दोनों दलों के बीच बिल्कुल सीधी भिड़ंत हो रही है। वहां ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस (TMC) ने अपनी बहुत मजबूत जमीनी पकड़ बना रखी है। दूसरी ओर, भाजपा ने अपना संगठन वहां बहुत तेजी से बढ़ाया है।
इसलिए, वहां की लड़ाई सिर्फ साधारण वोट की लड़ाई बिल्कुल नहीं है। बल्कि, यह लड़ाई सीधे तौर पर ‘नैरेटिव’ (विमर्श) की सबसे बड़ी लड़ाई है। चुनाव में कौन नेता अपनी अच्छी कहानी गढ़ेगा? और कौन नेता जनता को अपने जादुई शब्दों में पूरी तरह बांधेगा? दरअसल, बंगाल में यही सबसे असली और आर-पार की जंग है। इन सभी राज्यों के चुनाव नतीजों की गूंज सीधी दिल्ली तक जाएगी। अगर दक्षिण भारत में भाजपा का प्रदर्शन काफी कमजोर रहा, तो क्या होगा? तब साल 2026 का नया परिसीमन (Delimitation) मुद्दा राजनीति में असली बारूद बन सकता है। दक्षिणी राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण में बहुत अच्छा काम किया है। इसलिए, वे राज्य संसद में अपना प्रतिनिधित्व घटने के भारी डर से बहुत बेचैन हैं। नतीजतन, इस वजह से उत्तर और दक्षिण भारत के बीच की राजनीतिक खाई और भी ज्यादा चौड़ी हो सकती है। इसके साथ ही, भाजपा में उत्तराधिकार का बड़ा सवाल भी धीरे-धीरे अपना सिर उठा रहा है।
सब नेता चुपचाप पूछते हैं कि आखिर मोदी के बाद कौन आएगा? अगर आगामी 4 मई के नतीजे भाजपा की उम्मीद से काफी कम रहे, तो क्या होगा? तब पार्टी के अंदर कई क्षेत्रीय नेताओं के नए पंख लग सकते हैं। इसके अलावा, टीडीपी (TDP) और जेडीयू (JDU) जैसे महत्वपूर्ण गठबंधन सहयोगी भी अपने कड़े तेवर दिखाएंगे। वे सरकार पर अपनी कड़ी शर्तों वाला ‘कॉमन मिनिमम प्रोग्राम’ जबरदस्ती थोप सकते हैं। नतीजतन, उनके इस भारी दबाव से सरकार के आर्थिक सुधारों की तेज रफ्तार पर सीधा ब्रेक लग सकता है। तो क्या मोदी युग अब अपनी ढलान पर आ गया है? इसका सीधा जवाब है, शायद नहीं। लेकिन, यह बात बिल्कुल पक्की है कि मोदी मॉडल अब एक बिल्कुल नए मोड़ पर खड़ा है। मोदी मॉडल ने भारतीय राज्य को पूरी तरह से दृश्यमान और बहुत प्रभावी बनाया है। इसके अलावा, उसने राज्य को एक बहुत मजबूत वैचारिक धार भी दी है।
लेकिन, अब सरकार के सामने एक बहुत बड़ी चुनौती खड़ी है। सरकार इस भारी केंद्रीकृत ताकत को एक बहुध्रुवीय भारत में कैसे संतुलित करेगी? आज देश को तेज गति भी चाहिए, और गठबंधन की आपसी सहमति भी चाहिए। सरकार को आर्थिक रफ्तार भी जरूरी है, और राजनीतिक रिश्ते बचाना भी बहुत जरूरी है। इसलिए, आगामी 4 मई सिर्फ कैलेंडर की कोई एक साधारण तारीख बिल्कुल नहीं है। बल्कि, यह देश की राजनीति के लिए एक बहुत बड़ा संकेत है। यह तारीख पूरी दुनिया को बताएगी कि मोदी लहर अब भी समंदर की कोई ऊंची ज्वार है। या फिर वह अब किनारों में सिमटती हुई एक कमजोर धारा बन रही है। दरअसल, आज हमारे देश की राजनीति की दिशा और दशा, दोनों ही इसी ऐतिहासिक मोड़ पर पूरी तरह टिके हुए हैं। 4 मई के बाद ही देश का नया राजनीतिक अध्याय लिखा जाएगा।
Pawan Singh
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