Brij Khandelwal opinion article on Middle East crisis, Iran Israel war and role of India as Vishwaguru

पश्चिम एशिया की आग: इंसानियत का कत्ल और ‘विश्वगुरु’ भारत की अग्निपरीक्षा… आखिर दुनिया चुप क्यों है?

आर्टिकल

Edited by: Pawan Singh | tajnews.in | Agra | 22 Mar 2026, 08:35 AM IST

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Taj News Global Desk

विशेष अंतरराष्ट्रीय विश्लेषण
Brij Khandelwal Writer
बृज खंडेलवाल
वरिष्ठ पत्रकार एवं अंतरराष्ट्रीय विश्लेषक
वरिष्ठ पत्रकार बृज खंडेलवाल ने अपने इस बेहद मारक विश्लेषण में पश्चिम एशिया के विनाशकारी युद्ध पर दुनिया की ‘चुप्पी’ पर कड़े सवाल उठाए हैं। उन्होंने बताया है कि कैसे अब भारत को अपनी ‘विश्वगुरु’ की छवि को सार्थक करते हुए दुनिया में शांति का रास्ता दिखाना होगा। पढ़िए यह विशेष आलेख:

मुख्य बिंदु

  • पश्चिम एशिया का खौफनाक युद्ध: इज़राइल, ईरान और अमेरिका के सीधे टकराव से बर्बाद होती बेबस इंसानियत।
  • रूस, चीन और यूरोप की चुप्पी: क्या बड़े देश डोनाल्ड ट्रंप की कूटनीतिक हुंकार से बुरी तरह डर गए हैं?
  • भारत की रणनीतिक स्वायत्तता (Strategic Autonomy) और कूटनीतिक संतुलन ही बन सकता है दुनिया में शांति का बड़ा सेतु।
  • नोबेल विजेताओं और गांधीवादी विचारकों की चुप्पी पर प्रहार; भारत को अब लेनी होगी ग्लोबल लीडरशिप।

अरे, खामोशी कभी-कभी सबसे बड़ा गुनाह बन जाती है। और आज बिल्कुल वही मुश्किल घड़ी है। दरअसल, सभ्य दुनिया की इस चुप्पी में कोई समझ नहीं है। इसके अलावा, इसमें कोई नैतिकता भी नहीं है। बल्कि, इसमें हमें सिर्फ एक ठंडी साजिश ही नज़र आती है। इसलिए, एक सवाल हमारी रातों की नींद रोज़ चुराता है। नतीजतन, एक अजीब सी बेचैनी हमारे गले में फँस गई है। हालांकि, यह लंबा इंतज़ार अब हम और नहीं सह सकते। दरअसल, पश्चिम एशिया अब सिर्फ जल नहीं रहा है। बल्कि, वह बुरी तरह धधक रहा है। क्योंकि, इज़राइल और ईरान बिल्कुल आमने-सामने खड़े हैं। इसके अलावा, अमेरिका ने भी इसमें अपना सीधा दखल दे दिया है। इसलिए, मिसाइलें लगातार आसमान को चीर रही हैं। नतीजतन, खतरनाक ड्रोन चारों तरफ मौत की तेज़ बारिश कर रहे हैं। इसके साथ ही, तेल के कुओं के पास बारूद की तेज़ गंध फैल रही है। इसलिए, समुद्र पूरी तरह जहरीला हो रहा है। और, हवा में भी मौत का जहर घुल रहा है। दरअसल, युद्ध पर्यावरण का बेरहमी से कत्ल कर रहा है। हालांकि, बेगुनाह इंसानों का कत्ल तो पहले ही शुरू हो चुका था।

अब पूरी दुनिया इस भयानक आग से बुरी तरह थक चुकी है। इसलिए, हर देश और हर इंसान सिर्फ एक ही सवाल चिल्ला रहा है। वह बेबसी से पूछता है कि यह आग आखिर कौन बुझाएगा? लेकिन, इसके जवाब में उसे सिर्फ सन्नाटा मिलता है। क्योंकि, शांति के लिए कोई भी बड़ा नाम उभरकर सामने नहीं आता है। क्या रूस और चीन इस तबाही पर कुछ बोलेंगे? या फिर वे भी ट्रंप की हुंकार से काँप गए हैं? दरअसल, क्या वैश्विक शक्ति का खेल अब इतना छोटा हो गया है? इसलिए, बड़े-बड़े और ताकतवर देश भी डरकर पीछे हट जाते हैं। हालांकि, भारत की कूटनीतिक स्थिति इन सबसे बिल्कुल अलग है। हम इस आग में कोई घी नहीं डाल रहे हैं। इसके अलावा, हम डरकर चुप्पी साधे भी नहीं बैठे हैं। जबकि, रूस और चीन ईरान को अपनी पूरी सामरिक मदद दे रहे हैं। वे उसे सैटेलाइट इंटेलिजेंस और ड्रोन टेक्नोलॉजी आसानी से दे रहे हैं। इसके साथ ही, वे ईरान को भारी हथियारों की सप्लाई भी लगातार कर रहे हैं।

लेकिन, भारत ने हमेशा एक बेहतरीन संतुलन बनाए रखा है। दरअसल, मुद्दा ये बिल्कुल नहीं है कि आज कौन गलत है। या फिर, किसने पहला वार किया था। बल्कि, असली चिंता कुछ और ही है। जिन देशों का इस खूनी विवाद से कोई सीधा लेना-देना नहीं है। वे देश आखिर क्यों बेवजह इस युद्ध के शिकार बन रहे हैं? इसलिए, उनके नागरिक और उनकी अर्थव्यवस्था क्यों बर्बाद हो रही है? इसके अलावा, उनका सुरक्षित भविष्य बिना वजह क्यों जल रहा है? दरअसल, मोदी काल में भारत ने इस इलाके में एक शानदार संतुलन साधा है। क्योंकि, यह कोई साधारण संयोग बिल्कुल नहीं था। भारत ने इज़राइल के साथ बहुत गहरी और भरोसेमंद दोस्ती बनाई है। इसके अलावा, उसने सऊदी अरब, यूएई और कतर के साथ आर्थिक रिश्ते मजबूत किए हैं। हालांकि, भारत ने ईरान के साथ भी बातचीत का दरवाज़ा हमेशा खुला रखा है। दरअसल, यही आज के भारत की बिल्कुल नई और सशक्त पहचान है। इसे हम ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ (Strategic Autonomy) कहते हैं।

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भारत न तो किसी खेमे में है, और न ही वह किसी के खिलाफ है। बल्कि, वह सिर्फ अपने राष्ट्रीय हितों और अपनी कूटनीतिक शर्तों पर काम करता है। लेकिन, कूटनीति सिर्फ मीठे रिश्ते बाँधने का कोई साधारण खेल नहीं है। दरअसल, असली परीक्षा तो तब आती है, जब आपके पक्के दोस्त ही आपस में लड़ रहे हों। उस समय बीच में आखिर कौन सी शक्ति खड़ी होती है? और, दुनिया की शांति के लिए कौन अपना हाथ आगे बढ़ाता है? इसलिए, आज भारत ठीक उसी मुश्किल चौराहे पर खड़ा है। भारत हमेशा खुद को “विश्वगुरु” कहलाता है। इसके अलावा, वह ‘ग्लोबल साउथ’ का सबसे बड़ा चेहरा बनने का दावा भी करता है। तो क्या वह अब सिर्फ बेबस होकर तमाशा देखेगा? क्योंकि, लीडरशिप का मतलब सिर्फ GDP के आंकड़े बढ़ाना नहीं होता है। इसके अलावा, इसका मतलब कोई विदेशी रैंकिंग या झूठी तालियाँ बटोरना भी नहीं है। बल्कि, लीडरशिप का असली मतलब इस भयानक आग के बीच कूदना है। इसके लिए, भारत को अपना हाथ बढ़ाना होगा। और, दुनिया को सही रास्ता दिखाना होगा।

दरअसल, पश्चिम एशिया हमारी कोई दूर की खबर बिल्कुल नहीं है। बल्कि, यह हमारे अपने घर का बहुत बड़ा और सीधा मामला है। क्योंकि, हमारे करीब 90 लाख भारतीय वहाँ अपना खून-पसीना बहा रहे हैं। इसलिए, उनकी मेहनत से ही हमारी अर्थव्यवस्था की नब्ज़ आज धड़कती है। इसके अलावा, हमारा तेल, गैस और ऊर्जा उसी इलाके से आती है। हमारे व्यापार, बंदरगाह और समुद्री सुरक्षा, सब कुछ सीधे उसी से जुड़े हैं। नतीजतन, वहाँ की एक छोटी सी चिंगारी यहाँ बहुत बड़ा तूफान बन जाती है। लेकिन, भारत की असली ताकत सिर्फ उसके स्वार्थी हित नहीं हैं। बल्कि, उसकी असली ताकत उसकी बेदाग और मजबूत साख है। क्योंकि, दुनिया हमें एक बहुत ही शांतिप्रिय और परिपक्व देश के रूप में देखती है। भारत कभी किसी पर अपना दबाव नहीं बनाता है। वह कभी किसी को कोई कड़ा आदेश नहीं देता है। बल्कि, वह सिर्फ सम्मान के साथ सीधा संवाद करता है। इसलिए, आज हमारी यही निष्पक्षता हमारी सबसे बड़ी पूंजी बन गई है।

इसलिए, अब यह सबसे बड़ा सवाल उठता है। अगर भारत यह महान काम नहीं करेगा, तो फिर कौन करेगा? नतीजतन, भारत को अब हर हाल में आगे आना ही होगा। उसे अपना कोई समाधान थोपने के लिए नहीं आना है। बल्कि, उसे देशों के बीच संवाद शुरू कराने के लिए आगे आना है। भारत को बैक-चैनल डिप्लोमेसी और ट्रस्ट बिल्डिंग पर तेजी से काम करना होगा। इसके लिए उसे छोटे-छोटे और जरूरी कूटनीतिक कदम उठाने होंगे। क्योंकि, इतिहास कभी-कभी सिर्फ बड़े फैसलों से नहीं बदलता है। बल्कि, वह एक फोन कॉल या एक शांति की अपील से भी बदल जाता है। एक शांति का मंच भी दुनिया की तस्वीर बदल सकता है। इसलिए, भारत आज वही शांति का मंच आसानी से बन सकता है। वह एक ऐसा मजबूत सेतु बन सकता है, जहाँ कट्टर दुश्मन भी बैठकर बात कर सकें। हालांकि, कुछ लोग कहेंगे कि “ये बहुत उलझा हुआ मसला है।” उनकी यह बात बिल्कुल सौ प्रतिशत सही है।

लेकिन, ठीक यही तो इस काम की सबसे बड़ी वजह है। इसलिए, आज दुनिया को भारत जैसी संतुलित और निष्पक्ष आवाज़ की सबसे ज़्यादा ज़रूरत है। क्योंकि, इतिहास कभी डरपोक तमाशबीनों को याद नहीं रखता है। बल्कि, इतिहास हमेशा सिर्फ उनको याद रखता है। जिन्होंने सही वक्त आने पर मजबूती से खड़े होने का पूरा साहस दिखाया था। दरअसल, भारत हमेशा से ही यह कहता आया है: ‘वसुधैव कुटुंबकम’। इसका सीधा मतलब है कि पूरी दुनिया हमारा एक ही परिवार है। तो आप ही ईमानदारी से बताइए। जब हमारे ही परिवार में भयानक आग लगी हो, तो मुखिया चुप कैसे रह सकता है? आज पूरी दुनिया इस खूनी और अंतहीन युद्ध से थक चुकी है। इसलिए, उसे अब सिर्फ संयम, संवाद और समझदारी की जरूरत है। वास्तव में, ये तीनों बेशकीमती चीजें आज सिर्फ भारत ही दे सकता है। क्योंकि, आज के हालात बेहद नाज़ुक हो चुके हैं।

दरअसल, ईरान, इज़राइल और अमेरिका का यह सीधा टकराव अब चौथे हफ्ते में घुस चुका है। इसके कारण, दुनिया भर में तेल की कीमतें आसमान छू रही हैं। इसके अलावा, हमारे लाखों नागरिक वहाँ बुरी तरह फँसे हैं। इसलिए, हमारी हर मिनट की देरी उनका भारी जोखिम तेजी से बढ़ा रही है। वास्तव में, वक्त आज हमारा दरवाज़ा ज़ोर से पीट रहा है। वह बहुत जोर से और लगातार ऐसा कर रहा है। फिर हार्वर्ड और कैम्ब्रिज के वे बड़े-बड़े बुद्धिजीवी कहाँ गुम हो गए? इसके अलावा, नोबेल शांति पुरस्कार विजेता आज डरकर कहाँ छुप गए हैं? दुनिया के बड़े-बड़े थिंक टैंक आज क्यों एकदम चुप हैं? गांधीवादी मुखौटे वाली वे मीठी आवाज़ें आज क्यों नहीं उठ रही हैं? आप ही सोचिए, अगर आज महात्मा गांधी ज़िंदा होते, तो वे क्या स्टैंड लेते? क्या वे भी डरकर अपनी चुप्पी साध लेते? या फिर वे अहिंसा और संवाद का एक बड़ा झंडा उठाते?

क्या जर्मनी, जापान, ऑस्ट्रेलिया और फ्रांस जैसे देश अब सिर्फ बुजदिल हो गए हैं? या फिर उनके आर्थिक स्वार्थ और आराम ने उन्हें मार दिया है? शायद, उनकी संपन्नता ने उनके सच्चे आदर्शवाद को ज़िंदा ही दफन कर दिया है। अब इस सभ्य दुनिया के पास बचने के लिए कोई भी बहाना नहीं बचा है। इसलिए, आज हमारी साख, हमारी ताकत और हमारी नैतिकता, सब इस वक्त की कड़ी परीक्षा दे रही हैं। अगर हम आज भी चुप रहे, तो आने वाला इतिहास हमें कभी माफ नहीं करेगा। दरअसल, अब बिल्कुल सही वक्त आ गया है। इसलिए, भारत को अपनी ग्लोबल लीडरशिप दिखानी ही होगी। उसे विश्व शांति और संवाद का एक नया मंच बनाना होगा। उसे हर हाल में मरती हुई इंसानियत को बचाना होगा। क्योंकि, अगर हम यह काम नहीं करेंगे, तो फिर दुनिया में कौन करेगा?

Pawan Singh

Pawan Singh

Chief Editor, Taj News
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