Edited by: Thakur Pawan Singh | tajnews.in | Agra | 08 Mar 2026, 03:30 pm IST
Taj News Opinion Desk
विशेष संपादकीय लेख
बृज खंडेलवाल
वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक
वरिष्ठ पत्रकार बृज खंडेलवाल ने अपने इस विशेष आलेख में भारत की विदेश नीति, रणनीतिक स्वायत्तता और उस पर हो रही घरेलू राजनीति का बेबाक विश्लेषण किया है। उन्होंने बताया है कि कैसे अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर विपक्षी दलों और सरकार को दलगत राजनीति से ऊपर उठकर एक सुर में बोलना चाहिए। पढ़िए उनका यह वैचारिक आलेख:
विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने हाल ही में एक बहुत बुनियादी सच्चाई को दोहराया है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि भारत की तक़दीर उसकी अपनी अंदरूनी ताक़त ही तय करेगी। यह तक़दीर दूसरों की मेहरबानी या गलतियों से बिल्कुल तय नहीं होगी। आज की इस तेजी से बदलती दुनिया में उन्होंने एक आत्मनिर्भर भारत पर बहुत ज़ोर दिया है। भारत अब हिंद महासागर को सिर्फ एक साधारण व्यापारिक रास्ता नहीं मानता है। बल्कि भारत इसे वैश्विक स्थिरता के लिए एक बेहद ज़रूरी हिस्सा मानता है। हाल ही में कोच्चि बंदरगाह पर एक ईरानी जहाज़ रुका था। यह कदम भी इसी स्वतंत्र विदेश नीति का एक अहम हिस्सा था। सरकार ने इस पूरे घटनाक्रम को क्षेत्रीय उथल-पुथल के बीच एक ‘मानवीय कदम’ बताया। यह भारत की परिपक्व कूटनीति का एक बहुत अच्छा उदाहरण था। हमने अपने पड़ोसियों के साथ मानवीय आधार पर अच्छे संबंध बनाए रखने का स्पष्ट संदेश दिया।
लेकिन हमारी घरेलू राजनीति की तस्वीर इससे बिल्कुल अलग दिखाई देती है। विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने इस गंभीर मुद्दे पर कुछ कड़े सवाल उठाए हैं। दरअसल अमेरिकी सेना ने हाल ही में ईरानी युद्धपोत ‘आईआरआईएस देना’ को डुबो दिया है। राहुल गांधी ने इस महत्वपूर्ण घटना पर भारत सरकार की “खामोशी” पर तीखा प्रहार किया है। उन्होंने इसे सीधे तौर पर भारत के बैक यार्ड में लगी आग करार दिया। इसके अलावा उन्होंने पूछा कि क्या हमने अपनी रणनीतिक संप्रभुता अमेरिका के पास गिरवी रख दी है? उन्होंने देश की तेल सप्लाई और ऊर्जा सुरक्षा को लेकर भी बहुत गहरी चिंता जताई। विपक्ष का यह रवैया वास्तव में एक बहस को जन्म देता है। लोकतंत्र में विपक्ष का काम सरकार से सवाल पूछना है। लेकिन यह सवाल पूछने का तरीका और समय बिल्कुल सही होना चाहिए।
रक्षा और अंतरराष्ट्रीय मामलों में हमेशा बहुत संजीदगी और संयम की ज़रूरत होती है। ये वास्तव में ऐसे गंभीर क्षेत्र हैं जहाँ सभी राजनीतिक दलों को एक साथ आना चाहिए। उन्हें अपनी रोज़ाना की तू-तू मैं-मैं और दलगत राजनीति से ऊपर उठना होगा। उन्हें अंतरराष्ट्रीय मंचों पर हमेशा एक सुर में अपनी बात बोलनी चाहिए। दुनिया किसी भी देश को सिर्फ उसकी सेना या उसकी जीडीपी से बिल्कुल नहीं आंकती है। बल्कि दुनिया उस देश को उसकी राजनीतिक बातचीत के ऊंचे तेवरों से आंकती है। अफ़सोस की बात है कि यह कड़ा राजनीतिक अनुशासन भारत की घरेलू बहस से गायब होता जा रहा है। आज टीवी डिबेट्स ने कूटनीति को एक सस्ता तमाशा बना दिया है। नेता और प्रवक्ता अक्सर बिना पूरी जानकारी के गंभीर विदेशी मामलों पर बयानबाज़ी करते हैं। यह प्रवृत्ति हमारे राष्ट्रीय हितों के लिए बेहद खतरनाक साबित हो सकती है।
विदेश नीति कोई टीवी की चिल्लाने वाली बहस बिल्कुल नहीं है। यह असल में एक बहुत बारीक और गहरी महारत है। यहाँ हर एक शब्द का अपना एक अलग कूटनीतिक वज़न होता है। जब नेता अंतरराष्ट्रीय मुद्दों को केवल राजनीतिक अंक बटोरने का ज़रिया बनाते हैं, तो भारी नुकसान होता है। इससे पूरी दुनिया भर में एक गलत और कमजोर संदेश जाता है। विदेशी ताकतें हमारी इस आपसी फूट का फायदा उठाती हैं। आज़ादी के बाद से भारत ने ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ की एक बहुत मज़बूत परंपरा निभाई है। जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी से लेकर अटल बिहारी वाजपेयी और नरेंद्र मोदी तक एक ही उसूल कायम रहा है। भारत हर बड़ी वैश्विक शक्ति के साथ जुड़ेगा। लेकिन भारत कभी किसी का ताबेदार या पिछलग्गू नहीं बनेगा। हमने हमेशा अपनी स्वतंत्र आवाज़ को पूरी मजबूती से बुलंद किया है।
आज दुनिया महाशक्तियों की आपसी खींचतान से बुरी तरह गुज़र रही है। इसके साथ ही दुनिया एक बड़े ऊर्जा संकट का भी सामना कर रही है। ऐसे में नई दिल्ली एक बेहद मुश्किल संतुलन बना रही है। हम वाशिंगटन से अपने कूटनीतिक रिश्ते लगातार गहरे कर रहे हैं। वहीं हम मॉस्को के साथ अपनी पुरानी दोस्ती भी पूरी तरह निभा रहे हैं। इसके अलावा हम ‘ग्लोबल साउथ’ की सबसे मुखर आवाज़ बन रहे हैं। विकासशील देशों को भारत से बहुत उम्मीदे हैं। लोकतंत्र में स्वस्थ बहस बहुत ज़रूरी होती है। लेकिन जब हमारे अंदरूनी झगड़े विदेशी मंचों पर साफ दिखने लगते हैं, तो दिक्कत होती है। इससे देश की अंतरराष्ट्रीय छवि को भारी खामियाजा भुगतना पड़ता है। विदेशी कूटनीतिज्ञ हमारे आंतरिक बयानों का बहुत बारीकी से अध्ययन करते हैं। वे हमारे इन बयानों से हमारी कमजोरियां ढूंढ निकालते हैं।
आप साल 2020 के चीन सीमा विवाद का सीधा उदाहरण लीजिए। लद्दाख में ज़मीन खोने के आरोपों और सरकार के कड़े जवाबों के बीच बहुत शोर मचता है। चीन इस घरेलू शोर का सीधा फायदा उठाता है। वह हमारी अंदरूनी एकता में कमी होने का झूठा दावा कर सकता है। हमारे बयानों को ही हमारे खिलाफ एक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। इसी तरह साल 2025 में पाकिस्तान के खिलाफ एक बड़ी सैन्य कार्रवाई हुई थी। इस अहम कार्रवाई को ‘ऑपरेशन सिंदूर’ नाम दिया गया था। लेकिन यह भी हमारी गंदी राजनीति की भेंट चढ़ गई। विपक्ष ने इसे विदेशी नीति की एक बड़ी नाकामी बताया। जबकि सरकार ने इसे सेना का मनोबल गिराने वाला गैर-जिम्मेदाराना बयान कहा। सच जो भी हो, संकट के समय ‘बंटा हुआ घर’ दिखना देश के हित में बिल्कुल नहीं होता है। देशवासियों को ऐसे समय में एकजुट दिखना चाहिए।
चाहे विदेशी दौरों पर विवादित नेताओं से मिलना हो या फिर रूस से सस्ता तेल खरीदने का मामला हो। हर चीज़ को सिर्फ सियासी चश्मे से देखना हमारी वैश्विक साख को बहुत कमज़ोर करता है। भारत की ऐतिहासिक सफलताएं हमेशा एक मजबूत आम सहमति पर आधारित रही हैं। शीत युद्ध के दौरान भी हमारे नेताओं ने दुनिया के सामने भारत के रुख को कभी कमज़ोर नहीं होने दिया। उस समय राजनेता राष्ट्रहित को अपनी पार्टी से हमेशा ऊपर रखते थे। आज हमें उसी पुरानी राजनीतिक परिपक्वता की सख्त जरूरत है। दुर्भाग्य से आज हम उस सुनहरी परंपरा को धीरे-धीरे भूल चुके हैं। आज हर छोटा नेता विदेश नीति पर अपना सतही ज्ञान बांटने लगता है। वे बिना सोचे-समझे सिर्फ मीडिया की सुर्खियां बटोरने के लिए बयानबाज़ी करते हैं। यह देश के लिए एक बहुत बुरा संकेत है।
आज हमारे सामने चुनौतियां और भी ज्यादा बड़ी हैं। दुनिया के समीकरण पल-पल बदल रहे हैं। मध्य पूर्व में तनाव लगातार अपने चरम पर है। लाल सागर में व्यापारिक जहाजों पर रोज़ हमले हो रहे हैं। इससे वैश्विक व्यापार बुरी तरह प्रभावित हो रहा है। भारत अपनी विशाल ऊर्जा जरूरतों के लिए इसी क्षेत्र पर बहुत अधिक निर्भर है। ऐसे में भारत की स्थिरता और कूटनीतिक स्पष्टता ही हमारी सबसे बड़ी ताक़त है। सरकार की कड़ी आलोचना करना लोकतंत्र का एक बुनियादी हक है। लेकिन विदेशी मंच पर यह आलोचना हमेशा रचनात्मक होनी चाहिए। इसे राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखकर ही किया जाना चाहिए। हमें विदेशी धरती पर जाकर अपने ही देश की सरकार को कभी नहीं कोसना चाहिए। इससे विदेशी ताकतें भारत को एक बहुत कमजोर देश मानती हैं। वे हमारे आपसी मतभेदों का पूरा फायदा उठाकर हम पर अनुचित दबाव बनाती हैं।
हमारे राजनयिक और हमारे वीर सैनिक बेहद कठिन परिस्थितियों में लगातार काम करते हैं। वे हिमालय की बर्फीली और खतरनाक चोटियों से लेकर संयुक्त राष्ट्र की कूटनीतिक मेजों तक देश की रक्षा करते हैं। वे रात-दिन सिर्फ देश सेवा में लगे रहते हैं। जब हमारी घरेलू राजनीति उन्हें अलग-अलग भ्रामक संकेत देती है, तो उनका काम बहुत मुश्किल हो जाता है। वे भ्रमित हो जाते हैं कि देश आखिर चाहता क्या है। हमें अपने जवानों और राजनयिकों का हमेशा पूरा साथ देना चाहिए। हमें उनकी मेहनत पर अपनी राजनीति के कारण कभी पानी नहीं फेरना चाहिए। विदेश नीति कोई ‘स्प्रिंट’ या 100 मीटर की तेज़ दौड़ बिल्कुल नहीं है। यह असल में एक बहुत लंबी ‘मैराथन’ दौड़ है। इस लंबी दौड़ में धैर्य और निरंतरता बहुत मायने रखती है। देश में सरकारें आएंगी और जाएंगी। चुनाव होंगे और नेता लगातार बदलेंगे। लेकिन भारत का राष्ट्रीय हित हमेशा शाश्वत और परमानेंट है। वह कभी नहीं बदलता है। भारत की राजनीतिक जमात को यह कड़वी सच्चाई हमेशा याद रखनी होगी। जब हमारा देश दुनिया से मुखातिब हो, तो हमारी आवाज़ में भारी गरिमा होनी चाहिए। उसमें पूरी स्पष्टता और अटूट एकता झलकनी चाहिए।
Thakur Pawan Singh
Chief Editor, Taj News
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