International Desk, tajnews.in | Wednesday, April 08, 2026, 05:45:30 AM IST

वाशिंगटन/तेहरान: तीसरे विश्व युद्ध के मुहाने पर खड़ी दुनिया ने बुधवार की सुबह राहत की एक बहुत बड़ी सांस ली है। अमेरिका और ईरान के बीच जिस खौफनाक महायुद्ध के बादल मंडरा रहे थे, वे अगले 14 दिनों के लिए छंट गए हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, जो कुछ घंटे पहले तक ईरान को ‘नर्क’ बनाने और पूरी तरह से तबाह करने की धमकियां दे रहे थे, उन्होंने अचानक सैन्य हमलों को दो सप्ताह के लिए स्थगित करने का बड़ा ऐलान कर दिया है। वैश्विक कूटनीति के इस हाई-वोल्टेज ड्रामे में सबसे चौंकाने वाली एंट्री पाकिस्तान की हुई है, जिसने अमेरिका और ईरान के बीच एक अहम मध्यस्थ की भूमिका निभाकर इस विनाशकारी युद्ध को फिलहाल टाल दिया है। ट्रंप ने इस बात की पुष्टि की है कि यह कूटनीतिक जीत हॉर्मुज जलडमरूमध्य को पूरी तरह से खोलने की सख्त शर्त पर हासिल हुई है। इसके साथ ही ईरान ने अमेरिका को एक 10-सूत्रीय प्रस्ताव भेजा है, जिसे खुद ट्रंप ने ‘व्यावहारिक’ कहकर दुनिया भर के रक्षा विशेषज्ञों को हैरत में डाल दिया है।
पाकिस्तान का कूटनीतिक मास्टरस्ट्रोक: पर्दे के पीछे कैसे रुकी मिसाइलें?
मध्य पूर्व की इस धधकती आग को शांत करने में पाकिस्तान का नाम सामने आना कूटनीतिक हलकों के लिए किसी बड़े झटके से कम नहीं है। जब ईरान ने अमेरिकी हेलिकॉप्टरों को मार गिराने का दावा किया और जवाब में वाशिंगटन के युद्धपोत मिसाइलें दागने के लिए बिल्कुल तैयार खड़े थे, तब इस्लामाबाद से एक खामोश कूटनीतिक चैनल खोला गया। पाकिस्तान, जिसकी सीमा ईरान से लगती है और जिसके अमेरिका के साथ पुराने सैन्य संबंध रहे हैं, उसने एक बहुत ही नाजुक और ऐतिहासिक जिम्मेदारी निभाई। सूत्रों के मुताबिक, पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय और उच्च सैन्य अधिकारियों ने तेहरान और वाशिंगटन के बीच कई गुप्त संदेशों का आदान-प्रदान करवाया।
पाकिस्तान ने ईरान को यह समझाने में कामयाबी हासिल की कि अमेरिका के साथ एक सीधा और पूर्णकालिक युद्ध न सिर्फ मध्य पूर्व बल्कि पूरे इस्लामी जगत के लिए कितना विनाशकारी साबित हो सकता है। वहीं दूसरी तरफ, वाशिंगटन को यह भरोसा दिलाया गया कि अगर बातचीत के लिए एक छोटी सी खिड़की छोड़ी जाए, तो ईरान अपने कड़े रुख से पीछे हट सकता है। पाकिस्तान की इस पर्दे के पीछे की मध्यस्थता ने उस वक्त काम किया जब दुनिया की तमाम बड़ी महाशक्तियां और संयुक्त राष्ट्र जैसे संगठन बिल्कुल बेबस नजर आ रहे थे। इस एक कदम ने वैश्विक कूटनीति के नक्शे पर रातों-रात इस्लामाबाद की अहमियत को फिर से साबित कर दिया है, और दुनिया भर के नेता पाकिस्तान के इस ‘शांति दूत’ वाले अवतार को बेहद हैरानी से देख रहे हैं।
ट्रंप का यू-टर्न और 10-सूत्रीय प्रस्ताव की वह पहेली
अमेरिकी राजनीति में डोनाल्ड ट्रंप अपने आक्रामक और अप्रत्याशित फैसलों के लिए जाने जाते हैं। जो ट्रंप कुछ दिन पहले ईरान के सुप्रीम लीडर को सीधे तौर पर मिटा देने की धमकियां दे रहे थे, उनका अचानक नरम पड़ना और ईरान के 10-सूत्रीय प्रस्ताव को “व्यावहारिक” (Practical) बताना एक बहुत बड़ा पैराडाइम शिफ्ट है। व्हाइट हाउस के सूत्रों का कहना है कि ईरान की सर्वोच्च राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद द्वारा भेजे गए इस प्रस्ताव ने ट्रंप प्रशासन को अपनी सैन्य रणनीति पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर कर दिया है। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर इस 10-सूत्रीय प्रस्ताव के पन्नों में ऐसा क्या लिखा है जिसने अमेरिका की गरजती हुई तोपों को शांत कर दिया?
कूटनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि इस प्रस्ताव में ईरान ने अमेरिका को इज्जत बचाने का एक सुरक्षित रास्ता दिया है। इसमें ईरान के यूरेनियम संवर्धन कार्यक्रम की अंतरराष्ट्रीय स्वीकृति की मांग तो शामिल है, लेकिन साथ ही ईरान ने यह भरोसा भी दिया होगा कि वह इसे हथियारों की ग्रेड तक नहीं ले जाएगा। इसके अलावा, प्रस्ताव में खाड़ी देशों की सुरक्षा की गारंटी, अमेरिकी बंदियों की रिहाई और क्षेत्र में ईरान समर्थित मिलिशिया गुटों (जैसे हिजबुल्लाह और हूती) के हमलों को रोकने का ब्लूप्रिंट भी हो सकता है। ट्रंप, जो खुद को इतिहास का सबसे बेहतरीन ‘डीलमार्कर’ मानते हैं, उन्हें इस प्रस्ताव में एक ऐसा सौदा नजर आ रहा है जो उन्हें युद्ध में जाने के भारी आर्थिक और राजनीतिक नुकसान से बचा सकता है। यह प्रस्ताव सिर्फ कागजों का पुलिंदा नहीं है, बल्कि यह वह कूटनीतिक संजीवनी है जिसने फिलहाल दुनिया को विनाश से बचा लिया है।
हॉर्मुज जलडमरूमध्य: वैश्विक अर्थव्यवस्था की लाइफलाइन को मिली सांस
इस पूरे समझौते का जो सबसे बड़ा और तात्कालिक प्रभाव दिखा है, वह वैश्विक बाजारों पर है। ट्रंप द्वारा हमलों को टालने की जो सबसे अहम शर्त थी—’हॉर्मुज जलडमरूमध्य का खोला जाना’—वह पूरी होती दिख रही है। दुनिया का 20 प्रतिशत कच्चा तेल इसी संकरे समुद्री रास्ते से गुजरता है। जब ईरान ने इसे सैन्य प्रबंधन में लेने की धमकी दी थी, तो कच्चे तेल की कीमतें आसमान छूने लगी थीं और दुनिया भर के शेयर बाजारों में भयंकर कोहराम मच गया था। भारत जैसे विकासशील देशों के लिए, जो अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए पूरी तरह खाड़ी देशों पर निर्भर हैं, यह किसी भयानक आर्थिक बुरे सपने जैसा था।
अब समझौते के तहत ईरान ने इस जलडमरूमध्य से व्यापारिक जहाजों और तेल टैंकरों की निर्बाध आवाजाही की गारंटी दी है। इस खबर के आते ही अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तुरंत बड़ी गिरावट दर्ज की गई और शेयर बाजारों ने राहत की सांस ली। हालांकि, शिपिंग कंपनियों के मन में अभी भी एक गहरा खौफ बैठा हुआ है। उन्हें पता है कि यह शांति सिर्फ 14 दिनों की है। अगर इन दो हफ्तों में अमेरिका और ईरान के बीच किसी ठोस और अंतिम समझौते पर हस्ताक्षर नहीं होते हैं, तो ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड्स किसी भी वक्त इस समुद्री रास्ते को ब्लॉक करके वैश्विक अर्थव्यवस्था की सांसें दोबारा रोक सकते हैं।
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इज़राइल में भारी बौखलाहट: क्या नेतन्याहू इस समझौते को पचने देंगे?
इस पूरे कूटनीतिक घटनाक्रम में अगर कोई एक देश सबसे ज्यादा बेचैन और गुस्से में है, तो वह इज़राइल है। तेल अवीव के सत्ता गलियारों में ट्रंप के इस फैसले को लेकर भारी नाराजगी साफ देखी जा सकती है। इज़राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने बार-बार यह स्पष्ट किया है कि ईरान का यूरेनियम संवर्धन कार्यक्रम किसी भी कीमत पर स्वीकार्य नहीं हो सकता। इज़राइल के लिए यह कोई कूटनीतिक खेल नहीं, बल्कि उसके राष्ट्र के अस्तित्व का सवाल है। जब वाशिंगटन ने ईरान के 10-सूत्रीय प्रस्ताव को व्यावहारिक कहा, तो मोसाद और इज़राइली रक्षा बलों (IDF) के भीतर खतरे की घंटियां बजने लगीं।
इज़राइल के कट्टरपंथी धड़े का मानना है कि अमेरिका इस कूटनीतिक चाल में फंस रहा है और ईरान सिर्फ अपना परमाणु बम तैयार करने के लिए दो हफ्ते का कीमती समय खरीद रहा है। कूटनीतिक जानकारों को इस बात का गहरा डर है कि अगर अमेरिका और ईरान किसी समझौते के करीब पहुंचते हैं, तो इज़राइल इस पूरी शांति प्रक्रिया को पटरी से उतारने के लिए ईरान के परमाणु ठिकानों पर एकतरफा एयरस्ट्राइक कर सकता है। अगर ऐसा हुआ, तो यह 14 दिनों की मोहलत किसी शांति समझौते की नहीं, बल्कि इतिहास के सबसे विनाशकारी युद्ध की उल्टी गिनती साबित होगी। इज़राइल के लड़ाकू विमान स्टैंडबाय पर हैं, और नेतन्याहू की नजरें वाशिंगटन के हर अगले कदम पर बहुत पैनी तरह से गड़ी हुई हैं।
टिक-टिक करती घड़ी: 14 दिन जो तय करेंगे दुनिया का भविष्य
पाकिस्तान की मध्यस्थता और ईरान के प्रस्ताव ने दुनिया को एक तात्कालिक विनाश से तो बचा लिया है, लेकिन यह शांति किसी ज्वालामुखी के मुहाने पर बने घर जैसी है। अगले 14 दिन आधुनिक भू-राजनीतिक इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण दिन होने वाले हैं। जिनेवा से लेकर वाशिंगटन और तेहरान से लेकर इस्लामाबाद तक, बंद कमरों में जो गुप्त बैठकें होंगी, वे तय करेंगी कि मध्य पूर्व में शांति का नया सवेरा होगा या फिर दुनिया तीसरे विश्व युद्ध की भयानक आग में झोंक दी जाएगी।
अमेरिका को यह तय करना है कि वह अपने सहयोगियों, विशेषकर इज़राइल की सुरक्षा की गारंटी कैसे सुनिश्चित करेगा, जबकि वह ईरान के प्रस्ताव पर भी विचार कर रहा है। वहीं ईरान को यह साबित करना होगा कि उसका 10-सूत्रीय प्रस्ताव कोई छलावा नहीं बल्कि शांति की एक वास्तविक चाहत है। ये दो हफ्ते सिर्फ एक कूटनीतिक मोहलत नहीं हैं, बल्कि यह मानवता के लिए एक लिटमस टेस्ट है। अगर ये बातचीत विफल होती है, तो अगली बार बमवर्षक विमानों को उड़ान भरने से रोकने के लिए न तो कोई मध्यस्थ काम आएगा और न ही कोई प्रस्ताव। दुनिया भर की नजरें अब इस बात पर टिकी हैं कि जब यह 14 दिन की मियाद खत्म होगी, तो दुनिया किस तरफ करवट लेगी।

Pawan Singh
Chief Editor, Taj News
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