Agra News Desk, tajnews.in | Friday, March 20, 2026, 11:05:10 AM IST
आगरा: ताजनगरी के सिकंदरा थाने में हुई राजू गुप्ता की कस्टोडियल डेथ (Custodial Death) की कहानी रूह कंपा देने वाली है। रिपोर्ट के अनुसार, मृतक की वृद्ध मां रेनूलता ने अपने इकलौते बेटे को न्याय दिलाने के लिए सात वर्षों तक व्यवस्था से लंबी लड़ाई लड़ी। ताज न्यूज़ की रपट के अनुसार, पुलिस की बर्बरता का आलम यह था कि राजू को उसकी मां की आंखों के सामने ही थर्ड डिग्री दी गई और करंट लगाकर तड़पाया गया। दुर्भाग्यवश, अदालत का ऐतिहासिक फैसला आने से पहले ही कोरोना काल के दौरान न्याय की आस में मां रेनूलता का निधन हो गया। परिणामस्वरूप, आज जब दोषी दरोगा अनुज सिरोही को 10 साल की सजा हुई है, तो उसे देखने के लिए वह मां इस दुनिया में मौजूद नहीं है।
- थर्ड डिग्री का कहर: राजू गुप्ता को थाने में डंडों से पीटा गया और करंट लगाकर मार डाला गया।
- मां का संघर्ष: बेटे की मौत के बाद रेनूलता ने प्रभावशाली लोगों और विधायक के दबाव के बावजूद पीछे हटने से इनकार किया।
- अधूरा रहा सपना: दरोगा अनुज सिरोही को सजा मिलने से पहले ही कोरोना काल में मां की सांसें थम गईं।
- पुलिसिया हठधर्मिता: विधायक के रिश्तेदार को बचाने के लिए पुलिस ने लंबे समय तक जांच में ढिलाई बरती थी।
सिस्टम बनाम ममता: बेकसूर बेटे की मौत और मां की बेबसी
ताज न्यूज़ की रपट के अनुसार, राजू गुप्ता को चोरी के झूठे आरोप में बिना किसी एफआईआर के थाने ले जाया गया था। तुलनात्मक रूप से देखें तो, पड़ोसी अंशुल प्रताप ने केवल शक के आधार पर राजू को बंधक बनाया और फिर पुलिस के हवाले कर दिया। संक्षेप में कहें तो, मां रेनूलता ने अधिकारियों को दिए बयानों में बताया था कि पुलिसकर्मियों ने उनके सामने ही राजू को डंडों से बेरहमी से पीटा था। इसके अतिरिक्त, प्रभावशाली लोगों के दबाव में पुलिस प्रशासन इस मामले को दबाने का प्रयास करता रहा। परिणामस्वरूप, इकलौते बेटे की मौत के गम और न्याय की अंतहीन प्रतीक्षा ने मां को शारीरिक और मानसिक रूप से तोड़ दिया था।
इसके अतिरिक्त, यह मामला तब और गंभीर हो गया जब पता चला कि मुख्य आरोपी अंशुल प्रताप एक विधायक का करीबी रिश्तेदार था। संक्षेप में कहें तो, पुलिस अधिकारी सत्ता के प्रभाव में आकर आरोपियों को बचाने का खेल खेलते रहे। तुलनात्मक रूप से देखें तो, आगरा में पुलिसिया थर्ड डिग्री के ऐसे कई मामले पहले भी सामने आ चुके हैं, जिनमें जगदीशपुरा और किरावली की घटनाएं प्रमुख हैं। परिणामस्वरूप, आगरा कमिश्नरेट में पुलिस की कार्यप्रणाली पर बार-बार सवाल उठते रहे हैं। संक्षेप में कहें तो, राजू गुप्ता के चाचा अशोक कुमार को भी फैसले की जानकारी काफी देर से मिली, जिससे परिवार की उपेक्षा साफ झलकती है।
न्याय की जीत, पर मां हार गई जिंदगी की जंग: कोरोना काल में थमीं सांसें
ताज न्यूज़ की रपट के अनुसार, मां रेनूलता को चुप कराने के लिए कई बार लालच और धमकियां दी गईं। संक्षेप में कहें तो, वह अपने सिद्धांतों पर अडिग रहीं और बेटे के हत्यारों को सलाखों के पीछे देखने के लिए हर संभव संघर्ष किया। तुलनात्मक रूप से देखें तो, पुलिस की जांच-जांच के खेल के बीच मां ने हिम्मत नहीं हारी, लेकिन समय और नियति को कुछ और ही मंजूर था। परिणामस्वरूप, कोरोना काल की दूसरी लहर के दौरान वह इस नश्वर संसार को त्याग गईं। संक्षेप में कहें तो, दरोगा अनुज सिरोही को मिली 10 साल की सजा ने यह तो साबित कर दिया कि कानून के हाथ लंबे होते हैं, लेकिन मां का अधूरा सपना हमेशा चुभता रहेगा।
इसके अतिरिक्त, पूर्व एडीजी राजीव कृष्ण के समय में हुई सख्त कार्रवाई को भी इस मामले में याद किया जा रहा है। संक्षेप में कहें तो, आगरा पुलिस की छवि सुधारने के लिए कस्टोडियल डेथ जैसे मामलों में त्वरित न्याय आवश्यक है। परिणामस्वरूप, किरावली और छत्ता जैसे हालिया मामलों ने प्रशासन की चिंताएं बढ़ा दी हैं। ताज न्यूज़ की रपट के अनुसार, पीड़ित परिवारों को न्याय मिलने में होने वाली देरी सिस्टम की सबसे बड़ी खामी है। संक्षेप में कहें तो, राजू गुप्ता हत्याकांड का यह फैसला उन सभी पुलिसकर्मियों के लिए एक कड़ा सबक है जो वर्दी का दुरुपयोग करते हैं। परिणामस्वरूप, ताजनगरी के लोगों ने इस फैसले का स्वागत किया है।
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Pawan Singh
Chief Editor, Taj News












