
Opinion Desk, Taj News आलेख: बृज खंडेलवाल | Reported by: Thakur Pawan Singh | Updated: Sun, 15 Feb 2026 09:30 AM IST
“आगरा कैंट स्टेशन हो या यमुना किनारा, छोटे बच्चों का केमिकल सूंघना अब आम हो गया है। नामी स्कूलों के बाहर ‘पुड़िया गैंग’ की फुसफुसाहट है। क्या 12 साल की उम्र क्रिकेट और कॉमिक्स की नहीं होनी चाहिए थी? पढ़िए वरिष्ठ पत्रकार बृज खंडेलवाल का यह चिंताजनक आलेख जो पूछता है— हम अपनी पीढ़ी को किस दिशा में ले जा रहे हैं?”

बृज खंडेलवाल (Brij Khandelwal)
वरिष्ठ पत्रकार एवं सामाजिक चिंतक
🛑 नशे की गिरफ्त में बचपन: कड़वे सच
- 👶 औसत उम्र: नशा शुरू करने की औसत उम्र गिरकर 12.9 वर्ष हो गई है।
- 🏫 पुड़िया गैंग: नामी स्कूलों और कॉलेजों के कैंपस अब ड्रग्स के केंद्र बन रहे हैं।
- 💊 नया खतरा: वेपिंग, हुक्का और फार्मास्यूटिकल ओपिओइड का बढ़ता चलन।

आगरा से गोवा तक: एक ही कहानी
आगरा कैंट रेलवे स्टेशन के आसपास या यमुना किनारा रोड पर आपने छोटे-छोटे बच्चों को कबाड़ा बीनते और कपड़े में भिगोया गया केमिकल सूंघते जरूर देखा होगा। जैसे वही उनकी भूख हो, वही उनका सुकून। शहर के नामी स्कूलों के इर्द-गिर्द “पुड़िया गैंग” की फुसफुसाहटें हैं। शादी हो या बर्थडे पार्टी, बीयर और दारू अब रिवाज़ बन चुके हैं। कोई खांसी का सीरप गटक रहा है, कोई जर्दा, टिंक्चर या सुलोचन की बोतल। तन-बदन बेहाल, आंखें सूनी, दिमाग खिसका हुआ— नालियों और कूड़े के ढेरों में भविष्य तलाशती यह पीढ़ी आखिर किस दिशा में जा रही है?
12 साल का बच्चा और पहला नशा
जब एक 12 साल का बच्चा पहली बार किसी नशीले पदार्थ को छूता है, तो वह महज़ जिज्ञासा नहीं होती; वह समाज की सामूहिक विफलता का पहला दस्तावेज़ होता है। 2025 के एक व्यापक सर्वेक्षण ने तस्वीर और साफ कर दी है। दस बड़े शहरों में लगभग 5900 स्कूली छात्रों पर हुए अध्ययन में 15 प्रतिशत से अधिक बच्चों ने नशीले पदार्थ का सेवन स्वीकार किया। शुरुआत की औसत उम्र 12.9 वर्ष है। यह उम्र क्रिकेट, कविताओं और कॉमिक्स की होनी चाहिए थी, लेकिन अब यह निकोटिन, शराब और ओपिओइड की गिरफ्त में फंस रही है।
लड़कियां और ‘चुपचाप’ वाला नशा
एक और बदलाव चुपचाप हो रहा है। नशे का चेहरा अब केवल लड़कों तक सीमित नहीं रहा। हालिया अध्ययनों में युवतियों में फार्मास्यूटिकल ओपिओइड और इनहेलेंट्स का उपयोग बढ़ता दिखा है। तनाव, अवसाद, रिश्तों का दबाव और आत्मछवि की उलझनें कई लड़कियों को गुपचुप दवाइयों की ओर धकेल रही हैं। सामाजिक बदनामी के डर से आंकड़े अधूरे हैं, लेकिन ज़मीनी हकीकत संगीन है।
वेपिंग और हुक्का: मौत का नया ‘ट्रेंड’
वेपिंग (Vaping) और हुक्का इस संकट के नए प्रवेश द्वार बन चुके हैं। आकर्षक डिजाइन और फ्लेवर के नाम पर वेपिंग को “सुरक्षित विकल्प” की तरह बेचा जाता है, जबकि किशोरों में इसका प्रयोग चिंताजनक स्तर पर है। प्रतिबंधों के बावजूद ई-सिगरेट स्कूलों और कॉलेजों तक पहुंच रही हैं। हुक्का बार सामाजिक मेलजोल की आड़ में निकोटिन से आगे के पदार्थों तक रास्ता खोल देते हैं।
डेमोग्राफिक डिविडेंड या नेशनल ट्रेजेडी?
सबसे खतरनाक पहलू है आपूर्ति तंत्र का औद्योगिक रूप लेना। जनवरी 2026 में मैसूर और उससे पहले महाराष्ट्र में गुप्त ड्रग निर्माण फैक्ट्रियां पकड़ी गईं। सांस्कृतिक और शैक्षणिक पहचान वाले शहर अब सिंथेटिक नशे के उत्पादन केंद्र बनते जा रहे हैं।
भारत अपनी युवा आबादी पर गर्व करता है। हम इसे “डेमोग्राफिक डिविडेंड” कहते हैं। लेकिन अगर यही युवा नशे के दलदल में धंसते गए, तो यह लाभांश एक राष्ट्रीय त्रासदी में बदल सकता है। समाधान केवल पुलिसिया कार्रवाई नहीं है। कैंपस में अनिवार्य काउंसलिंग, मानसिक स्वास्थ्य सहायता और माता-पिता के साथ खुला संवाद ही इस धुएं को छांट सकता है। सवाल अब भी वही है— क्या हम जागेंगे, या अगली पीढ़ी को भी यूं ही धुएं में उड़ता देखते रहेंगे?
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Thakur Pawan Singh
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