
Opinion Desk, Taj News आलेख: बृज खंडेलवाल | Published: Friday, 13 Feb 2026
“राधा-कृष्ण की लीलाएं प्रकृति से अलग नहीं थीं। ब्रज को बचाना केवल पर्यावरण की हिफ़ाज़त नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत की रक्षा भी है। पढ़िए वरिष्ठ पत्रकार और पर्यावरण प्रेमी बृज खंडेलवाल का यह विशेष आलेख…”

बृज खंडेलवाल (Brij Khandelwal)
वरिष्ठ पत्रकार एवं पर्यावरणविद
🌿 आलेख के मुख्य बिंदु (Key Highlights)
- 🦚 द्वादश वन: कभी ब्रज में 12 विशाल वन और 24 उपवन हुआ करते थे।
- 🏢 कंक्रीट का जंगल: आध्यात्म की आड़ में खड़े हुए सीमेंट के आश्रम और रिसॉर्ट्स।
- 💧 सिसकती यमुना: कल-कल बहने वाली नदी आज सीवेज और औद्योगिक कचरे का नाला बन चुकी है।

पौराणिक काल का वह जीवंत स्वर्ग
टाइम मशीन में बैठकर लौटते हैं पौराणिक काल में। देखते हैं, गोकुल में यमुना किनारे फैला एक हरा-भरा वन। ऊंचे-ऊंचे वृक्षों की छांव में मोर पंख फैलाए नाच रहे हैं, रंग-बिरंगी तितलियां हवा में रेशमी नक़्श बनाती उड़ रही हैं, गाएं शांति से चर रही हैं, हिरण चौकड़ी भरते दौड़ रहे हैं। कदंब के पेड़ तले श्रीकृष्ण अपनी बांसुरी की मधुर तान छेड़ते हैं और गोपियां मानो किसी रूहानी जादू में डूबी झूम उठती हैं। पूरा ब्रज जैसे संगीत, प्रकृति और भक्ति का एक जीवंत स्वर्ग हो। ये थी कभी ब्रज मण्डल की हकीकत।
द्वादश वन और संतों की तपोभूमि
भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं की पावन धरती, जो कभी मथुरा के चारों ओर लगभग 100 कोस के दायरे में घने वनों से आच्छादित थी। पुराणों, विशेषकर पद्म पुराण में वर्णित द्वादश वन— वृंदावन, मधुवन, तालवन, कुमुदवन, काम्यवन, बहुलावन, खदिरवन, महावन, भांडीरवन, बेलवन, लोहवन और भद्रवन, इस क्षेत्र की शान थे। इनके अलावा 24 उपवन, असंख्य कुंड, सरोवर, बगीचे और छोटी-छोटी धाराएं मिलकर एक संतुलित और जीवंत पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) बनाते थे।
इन्हीं वनों में चीरहरण लीला, कालिय नाग दमन, और रास लीला साकार हुईं। पेड़ों की छांव, यमुना के तट, कुंज और हरियाली से भरे मैदान ही ब्रज की असली आत्मा थे। चैतन्य महाप्रभु, वल्लभाचार्य, स्वामी हरिदास, सूरदास, हित हरिवंश, रसखान और मीरा जैसे संतों-भक्तों ने यहीं भक्ति की गंगा बहाई। इतिहास गवाह है कि मुगल काल में भी प्रकृति और स्थापत्य (Architecture) के बीच एक खूबसूरत तालमेल था।
कंक्रीट के जंगल में तब्दील होता ब्रज
लेकिन आज हालात बदल चुके हैं। कभी हरा-भरा ब्रज अब कंक्रीट के जंगल में तब्दील हो चुका है। तेज़ी से बढ़ती आबादी, अंधाधुंध शहरीकरण, आलीशान टाउनशिप, रिसॉर्ट, बहुमंज़िला इमारतें और व्यावसायिक कॉम्प्लेक्स पवित्र स्थलों के इर्द-गिर्द उग आए हैं। गोवर्धन पर्वत के आसपास भी अतिक्रमण बढ़ा है। खनन और पत्थर तोड़ने की गतिविधियों ने पहाड़ियों की हरियाली छीन ली है, और पश्चिम से मरुस्थलीकरण (Desertification) की आहट साफ़ सुनाई दे रही है।
विडंबना यह है कि कुछ आध्यात्मिक संस्थाएं भी इस बदलाव में अनजाने ही सहभागी बन गईं, जहां हरियाली की जगह सीमेंट के आश्रम खड़े हो गए। भूमि के आसमान छूते दामों ने प्रकृति को मीलों पीछे धकेल दिया।
सफ़ेद झाग उगलती यमुना और सूखते कुंड
ब्रज की जीवनरेखा यमुना नदी भी गंभीर संकट में है। कभी निर्मल बहने वाली यमुना आज गंदे नाले में बदल चुकी है। सीवेज और औद्योगिक कचरे के कारण पानी में घुलित ऑक्सीजन (DO) शून्य तक पहुंच गई है, और फीकल कोलीफॉर्म का स्तर सुरक्षित सीमा से कई गुना ऊपर है। सफाई अभियानों के बावजूद हालात चिंताजनक हैं। कुंड और सरोवर सूख चुके हैं या गाद से भर गए हैं। ‘फ्रेंड्स ऑफ वृंदावन’ जैसे संगठनों का कहना है कि कभी यहां 50 से अधिक प्रजातियों की तितलियां थीं, जो आज गिनती की रह गई हैं। अनेक औषधीय पौधे लुप्तप्राय हैं।
उम्मीद की किरण और हमारा दायित्व
फिर भी उम्मीद की एक किरण बाकी है। प्राचीन वनों के पुनर्जीवन की योजनाएं शुरू की गई हैं, जिनमें देशी प्रजातियों के पौधारोपण का प्रयास शामिल है। यदि संत, महात्मा, समाजसेवी और स्थानीय लोग मिलकर व्यापक वृक्षारोपण अभियान चलाएं, पारंपरिक कुंडों का जीर्णोद्धार करें और टिकाऊ विकास (Sustainable Development) की राह अपनाएं, तो ब्रज की हरियाली लौट सकती है।
मुद्दा विकास का विरोध नहीं, बल्कि संतुलन का है। अगर वन नहीं बचेंगे, तो ब्रज केवल कथा और किंवदंती बनकर रह जाएगा; उसकी जीवंत रूह कंक्रीट के नीचे दफ़्न हो जाएगी।
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